Sunday, January 23, 2011

सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक-रास बिहारी बोस

सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक-रास बिहारी बोस

अरविन्द विद्रोही

भारत के स्वाधीनता संग्राम में सन् 1911 से लेकर 21 जनवरी 1945 तक,जब तक जीवन रहा,अपना योगदान अनवरत् देने वाले एकमात्र क्रान्तिकारी का नाम रास बिहारी बोस है।आपका जन्म 25मई,1885 को बंगाल में बर्द्धमान के सुबालदह गाॅंव में हुआ था।बंगाल में फैले क्रान्तिकारी आन्दोलन को सम्पूर्ण भारत में प्रसारित करने वाले आप ही हैं।अपने पिता विनोद बिहारी बोस को भारतीय स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने का अपना इरादा बताकर व आर्शीवाद लेकर रास बिहारी बोस ने शिमला पहुॅंच कर एक छापेखाने में नौकरी की। फिर देहरादून के वन विभाग के शोध संस्थान में रसायन विभाग के संशोधन सहायक के पद पर कार्य किया।फे्रंच आधिपत्य वाले चन्दन नगर में रहकर बम बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके रास बिहारी बोस,शोध संस्थान में नौकरी बम निर्माण के लिए आवश्यक रासायनिक पदार्थ को प्राप्त करने के लिए कर रहे थे।देहरादून में ही इनकी मुलाकात जितेन्द्र मोहन चटर्जी से हुई। जितेन्द्र मोहन चटर्जी का पंजाब के क्रंातिकारियों लालचन्द फलक,सूफी अम्बाप्रसाद,सरदार अजित सिंह,सरदार किसन सिंह-भगतसिंह के पिता तथा लाला हरदयाल से घनिष्ठ सम्बन्ध था।जितेन्द्र मोहन चटर्जी जब इंग्लैण्ड जाने लगे तब उन्होंने रास बिहारी बोस का सम्पर्क पंजाब के साथ-साथ संयुक्त प्रांत के क्रंातिकारियों से कराया।इस समय बनारस क्रंातिकारी गतिविधियों का केन्द्र था।

कलकत्ता में क्रंातिकारियों के बढ़ते दबाव के कारण अंग्रेजों ने राजधानी दिल्ली में स्थानांतरित कर दी।नई राजधानी दिल्ली में विश्व जगत को बताने के लिए कि इंग्लैण्ड का सम्राट ही भारत का वास्तविक सम्राट है,भारतीय राजाओं को सम्मानपूर्वक बुलाया था,और राजाओं ने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया था।रास बिहारी बोस ने तत्कालीन वायसराय हाॅर्डिंग पर फेंकने की योजना चन्दन नगर में आकर बनाई।योजना को क्रियान्वित करने के लिए 21सितम्बर,1912 को बसंत कुमार विश्वास दिल्ली के क्रंातिकारी अमीरचन्द के घर आ गये।दूसरे दिन 22सितम्बर को रास बिहारी बोस भी दिल्ली आ गये।23सितम्बर को शाही शोभायात्रा निकाली। हाथी पर सपत्नीक सवार वायसराय हार्डिंग्स का अंगरक्षक मैक्सवेल,महावत के पीछे और हौदे के बाहर छत्रधारी महावीर सिंह था।लोग सड़क किनारे खड़े होकर,घरों की छतों-खिड़कियों से इस विशाल शोभा यात्रा को देख रहे थे। शोभा यात्रा चांदनी चैक के बीच स्थित पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुॅंचा कि एकाएक भंयकर धमाका हुआ।इस बम विस्फोट में वायसराय को हल्की चोटें आई और छत्रधारी महावीर सिंह मारा गया।वायसराय को मारने में असफल रहने के बावजूद रास बिहारी बोस अंग्रेज सरकार के मन में भय उत्पन्न करने में कामयाब हो गये।बम विस्फोट के अपराधियों को पकड़वाने वालों को एक लाख रूपये पुरस्कार की घोषणा सरकार की तरफ से की गई। रास बिहारी बोस दिल्ली से वापस देहरादून आ गये।यहाॅं पहुॅंच कर रास बिहारी बोस ने सभा की तथा बम विस्फोट का निन्दा प्रस्ताव पारित कर वायसराय के स्वस्थ जीवन की कामना की।अनेक स्थानों पर रास बिहारी बोस ने ऐसी सभायें आयोजित कर के पुलिस की ओर से राजभक्त होने का सम्मान प्राप्त किया।कुछ दिनों बाद लाहौर के कमिष्नर गोर्डन के सम्मान में 17मई,1913 को मिंटगुमरी भवन में आयोजित सभा में भी बसंत कुमार विश्वास के हाथों रास बिहारी बोस ने बम फेंकवाया।गोर्डन बच गया परन्तु चपरासी मर गया।इसी समय क्रंातिकारियों ने सारे भारत में जनता के बीच सरकार के खिलाफ माहौल बनाने तथा स्वतंत्रता की भावना फैलाने के उद्देश्य से ‘‘लिबर्टी‘‘ नामक पर्चा वितरित किया।रास बिहारी बोस देहरादून से छुट्टी लेकर चन्दन नगर वापस आ गये।

चन्दन नगर में शचीन्द्रनाथ सान्याल एवं ज्योतिन्द्रनाथ मुखर्जी सन् सत्तावन की तरह एक बड़ा आन्दोलन करना चाहते थे।योजना के अनुसार मुखर्जी को बंगाल,शचीन्द्रनाथ सान्याल को संयुक्त प्रंात व रास बिहारी बोस को पंजाब में सेना तथा सामान्य जनता में विद्रोह की ज्वाला भड़काने की जिम्मेदारी मिली।मुखर्जी को जर्मनी से शस्त्र मंगाने की भी जिम्मेदारी दी गई।पंजाब में शस्त्रों के निरीक्षण के दौरान मुखर्जी के बांयें हाथ की उंगुलियाॅं जल गई।इसी बीच अंग्रेज सरकार ने दीनानाथ को पकड़ लिया। फिर पुलिस ने 19फरवरी,1914 को अवधबिहारी,अमीरचन्द,बालमुकुन्द,बसंत कुमार विश्वास को भी हिरासत में ले लिया।रास बिहारी बोस को भी पकड़ने के लिए इनाम घोषित किया गया।पिता को पत्र लिख कर रास बिहारी बोस ने अज्ञातवास स्वीकार लिया।अब रास बिहारी बोस के मन में 1857 के गदर की पुनरावृत्ति की योजनायें आकार लेने लगीं।तीन-तीन षड़यंत्रों के अभियुक्त रास बिहारी बोस को ब्रितानिया हुकूमत तेजी से तलाश रही थी।बोस एक वर्ष बनारस में रहे परन्तु पुलिस उनकी छाया तक भी न पहुॅंच पाई।बनारस में शचीन्द्रनाथ सान्याल थे ही,अमेरिका से गदर पार्टी के विष्णु गणेश पिंगले भी आ गये।पिंगले को गदर पार्टी ने रास बिहारी बोस को पंजाब में क्रंातिकारियों को संगठित करने के लिए तैयार करने हेतु भेजा था।पिंगले से मिलने के बाद बोस के साथी सान्याल पंजाब गये।31दिसम्बर,1914 को अमृतसर की पीरवाली धर्मशाला में क्रंातिकारियों की गुप्त बैठक हुई।पि।गले व सान्याल के साथ इस बैठक में कर्तार सिंह सराभा,पंडित परमानन्द,बलवन्त सिंह,हरनाम सिंह,विधान सिंह,भूला सिंह आदि प्रमुख लोग उपस्थित थे।रास बिहारी बोस जनवरी 1915 में पंजाब आये।कर्तार सिंह सराभा गज़ब के उत्साही और जोशीले थे।इन्होंने रास बिहारी बोस के साथ मिल कर सम्पूर्ण भारत में पुनः एक बार गदर करने की योजना बनाई।तारीख तय हुई-21फरवरी1915।देश के सभी क्रंातिकारियो। में जोश की लहर दौड़ पड़ी।सर्वत्र संगठन किया जाने लगा।लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।पंजाब पुलिस का जासूस सैनिक कृपाल सिंह क्रंातिकारियों की पार्टी में शामिल हो चुका था।पैसे के लिए उसने अपना जमीर बेच दिया,तैयारी की सूचना उसने अंग्रेजों को दे दी।परिणामस्वरूप समस्त भारत में धर पकड़,तलाशियां और गिरफतारियां हुईं।ऐसी स्थिति मे। गदर की योजना विफल हो जाने के बाद रास बिहारी बोस ने लाहौर छोड़ दिया।लाहौर से बनारस,फिर चन्दन नगर आ कर रहने लगे।रास बिहारी बोस ने पराधीन देशों का इतिहास पढ़ा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि बिना किसी अंतर्राष्टीय मदद के कोई भी पराधीन देश स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त कर सका है। इसी समय गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान जाने वाले थे,रास बिहारी बोस ने गुरूदेव के पहुॅंचने के पहले जापान पहुॅंच कर व्यवस्था देखने का इरादा बता कर,प्रियनाथ टैगोर के नाम से टिकट लिया।कलकत्ते में भारत छोड़ने के पहले क्रंातिकारियों की बैठक कर क्रंाति की ज्योति सतत् जलाये रखने का अनुरोध किया।रास बिहारी बोस भारत भूमि को ब्रितानिया हुकूमत की दासता से मुक्ति की दिशा में कार्य करने हेतु 12मई,1915 को भारत से जापान के लिए मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम कर चल दिये।रास बिहारी बोस ने 27नवम्बर, 1915 को जापान में आयोजित एक सभा में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में भाषण दिया।इस भाषण से जापान में यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई कि वे प्रियनाथ टैगोर न हो कर रास बिहारी बोस हैं।इस समय जापान व इंग्लैण्ड़ मित्र देश थे।जापान पुलिस ने गिरफतारी का वारण्ट जारी किया,रास बिहारी बोस भूमिगत हो गये।बोस ने जापान पहुंॅच कर मात्र चार माह में ही जापानी भाषा व शैली आत्मसात कर ली थी।‘‘हयाशी इचिरो’’ नाम रख कर बोस पूरे जापानी बन गये।बोस जापान की ब्लैक डैगन सोसायटी के अध्यक्ष तोयामा से मिले,तोयामा ने भरपूर मदद की।बोस ने जापान सरकार से बचने के लिए सत्रह बार अपना निवास बदला।1918 में तोशिको नामक युवती से शादी की।1923 में बोस जापान के नागरिक बन गये।इन वर्षों में रास बिहारी बोस ने भारत में हथियार भेजवाने,क्रंातिकारियों से सम्पर्क साधने तथा अंग्रेजी व जापानी भाषा में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन पर किताबें लिखने का कार्य किया।रास बिहारी बोस की लिखी 15 पुस्तकें अभी भी उपलब्ध हैं।1923 में जापानी नागरिकता प्राप्त होने के पश्चात् रास बिहारी बोस खुल कर भारतीय स्वतंत्रता की दिशा में कार्य करने लगे।1924 में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की तथा दक्षिण-पूर्व के कई देशों में इसकी शाखायें स्थापित की।28अक्तूबर,1937 को बोस ने ‘एशिया एशिया के लिए’ नारा देते हुए ‘‘एशिया युवक संघ’’ की स्थापना की।8दिसम्बर,1941 को जापान ने इंग्लैण्ड व अमेरिका के विरूद्ध युद्ध प्रारम्भ कर दिया।रास बिहारी बोस ने जापान के प्रधानमंत्री जनरल तोजो को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने के लिए तैयार कर लिया और जनरल तोजो ने जापानी संसद में घोषणा की कि यदि जापान विजयी हुआ तो वे भारत को स्वतंत्र कर देंगें। सिंगापुर जीतकर जापान ने भारतीय सेना के लगभग 1लाख लोगों को बन्दी बना लिया।रास बिहारी बोस के ही कहने पर जापान के सम्पर्क अधिकारी मेजर फुजिवारा ने भारतीय स्वाधीनता परिषद के साथ आजाद हिन्द फौज का गठन किया।इसके कमाण्डर मोहन सिंह तथा युद्ध परिषद के अध्यक्ष रास बिहारी बोस थे।रास बिहारी बोस द्वारा भारत की आजादी के लिए टोकियो सम्मेलन,बीदादरी सम्मेलन,बैंकाक सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। टोकियो सम्मेलन में सम्पूर्ण व सार्वभौमिक स्वराज्य प्राप्ति का उद्देश्य का प्रस्ताव हुआ तथा बीदादरी सम्मेलन में आजाद हिन्द फौज के विस्तार की योजना बनी।15जून,1942 को बैंकाक सम्मेलन में सुभाष चन्द्र बोस को जापान बुलाकर दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्टीय आन्दोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया।सुभाष चन्द्र बोस पनडुब्बी की लम्बी व जोखिम भरी यात्रा करके 13जून,1943 को टोकियो पहुंॅचे।रास बिहारी बोस इस समय आन्दोलन के केन्द्र सिंगापुर में थे।सिंगापुर से रास बिहारी बोस टोकियो सुभाष चन्द्र बोस से मिलने आये,मुलाकात के बाद रास बिहारी बोस ने कर्नल यामामोही से कहा,‘‘मेरे कंधों का बोझ अब कम हो गया है।’’ 4जुलाई,1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की कमान सुभाष चन्द्र बोस को सौंपी।सुभाष चन्द्र बोस ने सर्वोच्च सलाहकार के पद पर रास बिहारी बोस को रखा।आजीवन संघर्ष व जीवन सहचरी तोशिको तथा पुत्र माशेहीदे के निधन से रास बिहारी बोस का मन व शरीर दोनो टूट चुके थे।नवम्बर1944 में सुभाष चन्द्र बोस जब रास बिहारी बोस के पास आये तो इनकी हालत खराब थी।स्थिति बिगडने पर जनवरी1945 में सरकारी अस्पताल टोकियो में उपचार हेतु भर्ती कराया गया। जापान के सम्राट ने उगते सूर्य के देश का दो किरणों वाला द्वितीय सर्वोच्च राष्टीय सम्मान से रास बिहारी बोस को विभूषित किया।रास बिहारी बोस 21जनवरी,1945 को परलोक सिधार गये।रास बिहारी बोस का निश्चित मत था कि विश्व में नवयुग,सत्य और षान्ति की स्थापना का दायित्व भारत का है और उसे सिद्ध करने का साधन भारत की स्वतंत्रता है।रास बिहारी बोस के कार्य,सुभाष चन्द्र बोस के कार्यों के लिए नींव के पत्थर व प्रेरक बने।प्रवासी क्रंातिकारियों में रास बिहारी बोस का नाम अग्रणी,चिर-स्मरणीय व वन्दनीय है।

भारत के नेताओं के प्रतिमा स्थल की बदहाली

भारत के नेताओं के प्रतिमा स्थल की बदहाली
अरविन्द विद्रोही
आज 23जनवरी है,भारत की ब्रितानिया हुकूमत से गुलामी से मुक्ति की लड़ाई में सशस्त्र सेना यानि की आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म दिन।आज से मात्र दो दिन बाद ही 26जनवरी अर्थात भारत का गणतंत्र है।भारत को ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाने की लड़ाई में अपना सम्पूर्ण जीपन होम करने वाले,समाज-देश व आम जनों के हितों के लिए ही राजनीति करने वाले मॉं भारती के सपूतों की प्रतिमा तथा उनके नाम से बने उद्यानों की सुधि लेने वाला बाराबंकी जनपद में कोई नही है।प्रशासन की नजरों की कौन कहे,इन महापुरूषों का नाम लेकर राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों,सामाजिक संगठनों को भी मानों कोई फिक्र नहीं है।
बाराबंकी शहर के अम्बेड़कर चौराहा पर डा0 भीमराव अम्बेड़कर,नेताजी सुभाष चन्द्र बोस,रामसेवक यादव,रफी अहमद किदवाई की प्रतिमायें बीचों-बीच स्थापित है।ज्ञात हो कि यह प्रतिमायें शहर के ही मूर्तिकार स्व0 रामगुलाम ने स्वेच्छा से बनाकर निःशुल्क प्रशासन को दी थी।नगर पालिका प्रशासन के द्वारा यहॉं पर सौन्दर्यीकरण कराया गया।अभी गुजरे वर्ष में इस स्थल पर सौन्दर्यीकरण के दौरान लगाया गया फौव्वारा पूरे जनपद के आर्कषण का केन्द्र बना।मगर यह फौव्वारा चन्द माह ही अपने मूल स्वरूप में रहा।लाखों रूपया खर्च होने के बावजूद यह स्थल आज राजनैतिज्ञों की मनमानी,अधिकारियों की लापरवाही तथा जनता की उदासीनता तथा खामोशी की सजा भुगत रहा है।इसी चौराहे पर चन्द कदम दूर स्थित राजा बलभद्र सिंह चहलारी की स्मृति में बने उद्यान के सामने मुख्य मार्ग पर इसी जगह पर स्थित एक नामी रेस्तरां द्वारा अपना निःप्रयोज्य खाद्यय सामग्री प्रतिदिन फेंकवाया जाता है।इस खाद्यय सामग्री को खाने के लिए दर्जनों गाय,सांड़ व कुत्ते यहां घूमा करते हैं।कोई भी एैसा दिन नही व्यतीत होता जब यहां पर इस कारण से दुर्घटना न होती हो।कई बार इस समस्या के विषय में प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराये जाने के बावजूद रेस्तरां के कर्मचारी यहीं पर निःप्रयोज्य साम्रगी फेंकते हैं।नगर पालिका के सफाई कर्मी भी कई बार यहां सड़क पर सामग्री फेंकने से इन कर्मचारियों को मना कर चुके हैं लेकिन इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।भगवान न करे कि कभी एैसा घटित हो लेकिन अगर कभी इस स्थल पर दुर्घटना में किसी की मृत्यु हो गई तो इसकी जवाबदेही प्रशासन,रेस्तरां मालिक,वाहन चालक,भुक्त-भोगी में से किस कि होगी,यह अनुत्तरित किन्तु विचारणीय प्रश्न है।
आज सामाजिक-राजनैतिक सोच व विचारों में गिरावट का ही परिणाम है कि आम नागरिकों की कौन कहे अधिकतर जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी व जनप्रतिनिधि अपने कर्त्तव्यों का निर्वाहन न करके सिर्फ स्वयं स्वार्थ सिद्धि में और अपनी अपनी मलाईदार कुर्सी बचाने के फेर में पडे रहते है।अभी नव-वर्ष के स्वागत व शुभकामनाओं की होर्ड़िग्स,पोस्टर से पूरा शहर पटा पड़ा है।उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती के जन्म दिन के अवसर पर भव्य माहौल में कार्यक्रम आयोजित हुए।भारत रत्न से सम्मानित संविधान रचयिता डा0 भीमराव अम्बेड़कर के नाम के इस चौराहे तथा प्रतिमा स्थल को देखकर इन महापुरूषों के नाम पर राजनीति करने वाले दिल से इन चारों महान नेताओं की कितनी इज्जत करते हैं यह इस स्थल की बदहाली से साफ दिखता है।

Friday, January 7, 2011

9अगस्त-अगस्त प्रस्ताव,कांग्रेस व जनान्दोलन

9अगस्त-अगस्त प्रस्ताव,कांग्रेस व जनान्दोलन
अरविन्द विद्रोही
5जुलाई,1942 को कंाग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के समय गॉंधी जी ने इस बात पर जोर दिया कि अब वह समय आ गया है जब कंाग्रेस को ‘‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘‘ की आवाज जोर शोर से उठानी चाहिए।भारत में ब्रितानिया हुकूमत की समाप्ति करके भारत में भारत के लोगों की राष्टीय सरकार की स्थापना करने के उद्देश्य से गॉंधी जी अंग्रेजों भारत छोड़ो‘‘ आंदोलन तथा अहिंसक क्रान्ति प्रारम्भ करने के लिए जोर दे रहे थे।दरअसल यह वही समय था जब आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोष अपनी सेना तथा जापानी सेना की टुकड़ियों के साथ भारत माता की गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए भारत की सीमा पर आ चुके थे।गॉंधी जी को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने समझाया था कि अगर इस समय हम कांग्रेस के बड़े आन्दोलन की बात करें और आन्दोलन प्रारम्भ भी कर दे ंतो ब्र्रितानिया हुकूमत दबाव में आ जायेगी और समझौता करने तथा राष्टीय सरकार बनाने के लिए तैयार हो जायेगी।और अगर भारत में भारत के लोगों की राष्टीय सरकार बन गई एवं अंग्रेज यहां से चले गये तो फिर आजाद हिन्द फौज तथा जापानी सेना भारत पर आक्रमण नहीं करेगी।और युद्ध के नुकसानों से बचा जा सकेगा।यह योजना गॉंधी जी ने स्वीकार ली,लेकिन यह योजना मौलाना आजाद और पं0नेहरू को अव्यवहारिक लगी।इन लोगों का मानना था कि आन्दोलन प्रारम्भ करने से ब्रितानिया हुकूमत दमन पर उतारू हो जायेगी,फिर आन्दोलन अहिंसक नहीं रहेगा।कांग्रेस अध्यक्ष आजाद ने कहा भी कि,‘‘मैं इस निष्कर्ष पर पहुॅंचा हूॅं कि जनता का जोश बनाये रखने के लिए कुछ करना ही होगा।अगर गॉंधी जी को अपने रास्ते आन्दोलन चलाने दिया गया,तो वह स्वभावतःअहिंसक दिशा में होगा,लेकिन अगर हम सब गिरफतार कर लिए गये तो लोगों की निष्क्रियता की हालत में पहुंचने न देना होगा बल्कि हिंसा-अहिंसा के बारे में बहुत ज्यादा सिर न खपाकर लोगों को भरसक पुरजोर आन्दोलन चलाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।‘‘
कंागेस वर्किंग कमेटी में 5जुलाई,1942 से इस विषय पर चर्चा शुरू हुई।7जुलाई,1942 को गंॉधी जी ने एक पत्र आजाद को भेजा,जिससे आजाद और नेहरू से उनके मतभेद उजागर हुए।गॉंधी जी ने आजाद को पत्र में लिखा,‘‘अगर कांग्रेस चाहती है कि मैं उसका नेतृत्व करूं तो आपको कांग्रेस के अध्यक्ष पद से और वर्किंग कमेटी के पद से तथा जवाहर लाल नेहरू को वर्किंग कमेटी से इस्तीफा देना होगा।‘‘पत्र प्राप्त होते ही आजाद ने नेहरू को बुलवाया,संयोगवश सरदार पटेल भी आ गये।पटेल भी इस अप्रत्याशित घटनाचक्र व पत्र में गॉंधी जी की मांग से भौचक रह गये।पटेल तत्काल गॉंधी जी के पास गये और उन्होंने गॉंधी जी से कहा कि अगर आजाद अध्यक्ष पद से और नेहरू वर्किंग कमेटी से हट गये तो देश में इसकी भंयकर प्रतिक्रिया होगी।पटेल के समझाने पर गॉंधी जी ने अपना मांग पत्र वापस ले लिया।तत्पश्चात् वर्किंग कमेटी ने विस्तार के साथ अहिंसा पर आधारित इस भारत छोड़ो आन्दोलन के कार्यक्रम व स्वरूप पर विचार किया।गॉंधी जी ने इस कार्यक्रम को अहिंसक विद्रोह की संज्ञा दी तथा 14जुलाई,1942 को राष्टीय मांग पर सर्वसम्मति से आन्दोलन का प्रस्ताव पास किया गया। 15जुलाई,1942 को वर्धा में एक बड़े पत्रकार सम्मेलन में गॉंधी जी ने कहा कि,‘‘अगर आन्दोलन शुरू होगा तो वह ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ अहिंसक विद्रोह होगा।‘‘ कांगेस नेताओं ने 14जुलाई,1942 के प्रस्ताव पर वार्ता हेतु वाइसराय से मिलने मीरा बेन अर्थात मिस स्लेड को भेजा परन्तु वाइसराय ने मिलने से इंकार कर दिया तथा कहा कि युद्ध के दौरान ब्रितानिया सरकार बगावत की कोई भी बात,अहिंसक अथवा हिंसक बर्दाश्त नहीं करेगी।
इन सभी हालातों में कांगेस का बम्बई अधिवेशन प्रारम्भ हुआ जिसमें 7अगस्त,1942 को कांगेस वर्किंग कमेटी द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव पेश किया गया।यही प्रस्ताव कांग्रेस का इतिहास प्रसिद्ध ‘‘अगस्त प्रस्ताव‘‘था।यह पूरा आन्दोलन वास्तव में कांग्रेस का न होकर गॉंधी जी का था।इस आन्दोलन के सर्वे-सर्वा गॉंधी जी ही थे।गॉंधी जी तत्काल कोई आन्दोलन नहीं करना चाहते थे,न कोई कार्यक्रम बनाया था।गॉंधी सर्वप्रथम रूजवेल्ट,च्यांग आदि को पत्र लिखना चाहते थे।सरकार को कम से कम तीन महीने का समय गॉंधी जी देने वाले थे।कांग्रेस की कमेटियों को भेजने के लिए तैयार पत्रक में लिखा गया था,‘‘जब तक गॉंधी जी तय न करें तब तक कोई भी आन्दोलन शुरू नहीं किया जाना चाहिए और न कोई अन्य काम किया जाना चाहिए।हो सकता है कि वह कुछ दूसरी ही बात तय करें,तब आप बड़ी अनावश्यक गलती के लिए जिम्मेदार होंगें।तैयार हो जाओ,फौरन संगठित हो जाओ,होशियार हो जाओ लेकिन कोई भी काम मत करो।‘‘यह पत्रक सम्पूर्ण तैयार होकर वितरित हो पाता इसके पहले ही 8अगस्त,1942 को प्रस्ताव पास किये जाने के बाद 9अगस्त को ही सबेरे कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सारे सदस्यों तथा कई नेताओं को ब्रितानिया हुकूमत ने हिरासत में ले कर कांग्रेस को एक गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया।गॉंधी जी,सरोजनी नायडू पूना के आगा खॉं पैलेस,कांगेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्य अहमदनगर दुर्ग तथा राजेन्द्र प्रसाद पटना में गिरफतार कर नजरबन्द कर दिये गये।जनता ने राष्ट के नेताओं के इस दमन पर वीरोचित आचरण का प्रदर्शन किया और ब्रितानिया हुकूमत ने पूरी बर्बरता तथा दमन का परिचय दिया।इस आन्दोलन में 250रेलवे स्टेशन,550पोस्ट ऑफिस,70थाने,85अन्य सरकारी इमारतें तथा 3500 टेलीग्राफ और टेलीफोन की तार लाइने भारत के वीरों ने तहस-नहस करके अपना विरोध प्रदर्शन किया।इस आन्दोलन में 940लोग पुलिस की गोली से मारे गये,1630लोग घायल हो गये।भारत रक्षा कानून में 18000लोगों को नजरबन्द किया गया तथा 60229लोगों को गिरफतार किया गया।इस भयंकर ब्रितानिया दमन के कारण जनान्दोलन छब गया।9नवम्बर,1942 को जय प्रकाश नारायण पॉंच साथियों के साथ हजारीबाग जेल से भाग निकले थे।जे0पी0 ने केन्द्रीय संग्राम समिति बनाकर अंग्रेजों से सशस्त्र संग्राम का आह्वान किया था।नेपाल में सदर दफतर बनाकर जन-क्रांति की कोशिश की।इस जनान्दोलन में जय प्रकाश नारायण,अरूणा आसफ अली,राम मनोहर लोहिया,अच्युत पटवर्धन आदि ने भरपूर काम किया तथा इनका नाम भी खूब हुआ।
गॉंधी जी ने 23दिसम्बर,1942को वाइसरॉय को पत्र लिखा,-‘‘लगता है कि कांगेस नेताओं की एक तरफ से गिरफतारी ने लोगों को गुस्से में इतना पागल बना दिया कि वे आत्मनियंत्रण खो बैठे।मुझे लगता है कि जो भी तोड़फोड़ हुई है उसके लिए सरकार जिम्मेदार है कांग्रेस नही।‘‘गॉंधी जी की यह बात अक्षरशः सत्य है,यदि सरकार ने दमन न किया होता तो कम से कम तीन माह तक कहीं भी अहिंसक सत्याग्रह भी न होता।गॉंधी जी ने ब्रितानिया हुकूमत के गृह विभाग को भी 15जुलाई,1943 को पत्र लिख कर बताया कि कांग्रेस ने कोई भी आंदोलन शुरू नहीं किया था।कांग्रेस के नेताओं पण्ड़ित जवाहर लाल नेहरू,वल्लभ भाई पटेल एवं गोविन्द वल्लभ पंत ने 21दिसम्बर,1945 को संयुक्त प्रेस बयान में कहा,-‘‘कोई भी आन्दोलन आल इण्ड़िया कांग्रेस कमेटी या गॉंधी जी द्वारा आरम्भ नहीं किया गया।‘‘सबसे अफसोस की बात यह है कि तीन वर्ष तक लगातार जिन लोगों ने लिखित बयान दिया कि यह कांग्रेस का आन्दोलन नहीं था,उन्हीं कांग्रेसी नेताओं ने बाद में सन्1942 के इस जन आन्दोलन को कांग्रेस का आन्दोलन कहा और अगस्त क्रांति कहा।गॉंधी जी और कांग्रेस के अहिंसा के सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत चले इस जनान्दोलन को आज जो भी कांग्रेसी अपने दल द्वारा चलाया गया आन्दोलन करार देते हैं,उनको कम से कम उन सभी कांग्रेसी नेताओं की सार्वजनिक रूप से निन्दा करनी चाहिए,जिन्होंने इस आन्दोलन को कांग्रेस का आन्दोलन न होने का लिखित बयान लगातार 3वर्षों तक दिया।
वस्तुतः यह आन्दोलन भारत की जनता द्वारा आजादी के लिए छेड़ा गया जनान्दोलन था,जो अपने राष्टीय नेताओं के दमन व ब्रितानिया हुकूमत की बर्बरता की उपज था।

मेरी हसरत

तुम्हे पाने की हसरत में...... खुद को खो बैठा... सुकुं की चाह में अब.... दर्द भी पी बैठा.... यु ही राह में... ठिठकना तुम्हारा... दिल को रोके था... मुड़ना तुम्हारा.. पलकों को उठा कर यूँ जो देखा तुमने... लगी है आग कलेजे में मेरे... इस तपिश से खुद को बचाए रखना... अब मेरी हसरत से खुद को बचाए रखना.... तेरी आँखों में देखू ये लगता है कि...मेरे इंतज़ार में तू...पलके बिछाये बैठी है...ये खुले गेशु तेरे ...घटा से छाए हैं...कर तो बरसात अब...हम अब तुम्हारे हैं....

Tuesday, December 28, 2010

धान क्रय केन्द्रों, बिचैलियों, मुनाफाखोरों व भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्यवाही हो

धान क्रय केन्द्रों, बिचैलियों, मुनाफाखोरों व भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्यवाही हो

अरविन्द विद्रोही

उ0प्र0 की मुखिया मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने कृषि विभाग की समीक्षा करते हुए कहा था कि खरीफ के दौरान उर्वरक की उपलब्धता हर हालत में बनायी रखी जाये।नेपाल से लगी सीमा में खाद की तस्करी की चर्चा करते हुए सुश्री मायावती ने इस तस्करी को कठोरता से रोकने का निर्देश दिया तथा नेपाल की सीमा से लगे जनपदों में मांग से अधिक उर्वरक उपलब्ध न कराने का आदेश दिया था।सुश्री मायावती के किसान हित के इन निर्देशों का पालन ईमानदारी व दृढ़तापूर्वक करने में नौकरशाही की नाकामयाबी किसी से छुपी नही है।विभिन्न किसान संगठन उर्वरकों की कमी और खाद की कालाबाजारी,जमाखोरी,मिलावटी खाद की समस्या को लेकर आंदोलित रहे।फिर भी अन्य वर्षों की अपेक्षा इस बार खरीफ की फसल में किसान राहत में रहे।

उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने धान खरीद की प्रभावी व्यवस्था के निर्देश अगस्त माह में ही दे दिए थे।किसानों को उनकी उपज का पर्याप्त एवं लाभकारी मूल्य दिये जाने की पुरजोर वकालत करते हुए सुश्री मायावती ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि धान क्रय के समय किसानों का उत्पीड़न बर्दाश्त नही किया जायेगा।मुख्यमंत्री के निर्देश व चेतावनी के बावजूद उ0प्र0 में किसानों को धान क्रय केन्दों पर उत्पीड़न व शोषण का शिकार होना पड़ रहा है।बेबस किसानों ने अपना धान 700रूपये प्रति कुन्तल की दर से ही बेचा तथा बिचैलियों तथा प्रभावी किसानों की पौ बारह है।तमाम किसान अपने धान के बोरों के साथ प्रशासन के सामने जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं।

काश.....उ0प्र0 की मुखिया मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की निगाहें किसानों के दुःख पर पुनः पड़ती तथा कार्यवाही का चाबुक भ्रष्ट धान क्रय केन्द्रों व मुनाफाखोरों,बिचैलियों,दलालों व गैर-जिम्मेदार अधिकारियों पर पड़ता।

Monday, December 27, 2010

बिहार उदय

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Sunday, December 26, 2010

पंचायती चुनावों से सबक लें राजनेता व प्रत्याशी

पंचायती चुनावों से सबक लें राजनेता व प्रत्याशी
अरविन्द विद्रोही
उ0प्र0 में पंचायती चुनाव क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के निर्वाचन के साथ ही सम्पन्न हो चुके हैं।ग्राम्य प्रधान,ग्राम्य पंचायत सदस्य,क्षेत्र पंचायत सदस्य तथा जिला पंचायत सदस्य के पद पर चुनाव प्रचार के दौरान आम मतदाताओं की चांदी रही।सामाजिक,राजनैतिक,विकास के मुद्दों के स्थान पर व्यक्तिगत स्वार्थ,लाभ,दबाव,धन का अंधाधुंध वितरण,शराब का वितरण,दावतों का आयोजन आदि प्रभावी व निर्णायक साबित हुए थे।पंचायती चुनावों में पद प्राप्ति के फेर में अधिकांश प्रत्याशियों ने अपनी पूॅंजी,क्षमता व ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया।ग्राम्य पंचायत सदस्य पद का चुनाव फीका रहा लेकिन ग्राम्य प्रधान पद पर निर्वाचित होने की लालसा में अधिकतर प्रत्याशियों ने लाखों रूपये पानी की तरह बहाये।ग्राम्य प्रधान पद पर निर्वाचित होने के लिए लाखों रूपया खर्च करने का कारण ग्राम्य पंचायतों में आने वाले ग्राम्य विकास के धन की लूट व बन्दर-बॉंट करना ही है।ग्रामीण जनता एक तरफ भ्रष्टाचार का रोना रोती रहती है,वहीं चुनावों में प्रत्याशियों का भरपूर आर्थिक दोहन करने में भी कोई कोताही नहीं बरतती है।साफ-सुथरी छवि के अधिकतर प्रत्याशी ग्राम्य प्रधान पद पर निर्वाचित होने की कौन कहे,चुनावी संघर्ष में ही नहीं गिने गये।प्रधान पद की योग्यता जानकारी,कर्मठता,ईमानदारी ना मानकर जनता ने कुछ और ही मानी।
क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य पद के निर्वाचन में भी काफी जोर-आजमाइश हुई।कई दिग्गजों का समीकरण चक्रानुक्रम आरक्षण के चलते बिगड़ गया।क्षेत्र प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में खरीद-फरोख्त के सुअवसर के फेर में सदस्य पद के चुनाव में लाखों रूपये लगाकर दावेदारी की गई।औसत अनुमान के अनुसार क्षेत्र पंचायत सदस्य पद हेतु लगभग 50हजार रूपया तथा जिला पंचायत सदस्य पद हेतु लगभग 12लाख रूपया खर्च करने के पश्चात् ही प्रत्याशी गण सदस्य निर्वाचित हुए।ग्राम्य प्रधान,क्षेत्र पंचायत सदस्य व जिला पंचायत सदस्य पद के प्रत्याशियों के द्वारा आदर्श चुनाव संहिता का जमकर माखौल उडाया गया।जिससे जो बन पड़ा उसने वो किया।कहीं भी आदर्श चुनाव संहिता के पालन व लोकतांत्रिक मूल्यों की चर्चा नहीं की गई।सभी प्रत्याशी व राजनैतिक दल अपनी व अपने समर्थकों की ऐन केन प्रकारेण विजय श्री सुनिश्चित करने की लालसा में अनैतिक कृत्य करते रहे।
जिला पंचायत अध्यक्ष पद हेतु निर्वाचन की प्रक्रिया में जीते जिला पंचायत सदस्यों को अपने-अपने पाले में करने के लिए जमकर घमासान मचा।सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी पर सत्ता के बेजा इस्तेमाल का आरोप समाजवादी पार्टी,कांग्रेस,भाजपा ने जमकर लगाया।बसपा पर दबाव,खरीद-फरोख्त के जरिए जिला पंचायत सदस्यों को अपने पाले में करने का आरोप लगा रहे विपक्षी दलों के अपने ही नव-निर्वाचित सदस्यों ने विभिन्न जनपदों में बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी को मत व समर्थन दिया।समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अनुशासनहीनता के खिलाफ ठोस निर्णय लेते हुए दर्जनों नेताओं को समाजवादी पार्टी से बाहर कर दिया।उ0प्र0 में कांग्रेस का नेतृत्व कोई निर्णय नही ले सकता यह सर्व विदित है।शायद भाजपा के उ0प्र0 के नेतृत्व को कमजोर व लाचार मानकर ही विकास के नाम पर राजधानी से सटे जनपद बाराबंकी में भारतीय जनता पार्टी के जिला पंचायत सदस्यों व जिले के नेतृत्व ने बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष पद की प्रत्याशी को घोषित समर्थन व मत दिया।भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश नेतृत्व बसपा पर आज तक खरीद-फरोख्त का आरोप पानी पी पी कर लगा रही है और सरेआम बसपा की मदद कर चुके अपने दल के लोगों पर कोई कार्यवाही नहीं कर रही है,यह बात गले नही उतरती है।क्या भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का नेतृत्व बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों की मदद को,उनको मत व समर्थन देने को अनुशासनहीनता व मतदाताओं के प्रति विश्वासघात नही मानता?
जिला पंचायत अध्यक्ष पद के निर्वाचन के तत्काल बाद क्षेत्र पंचायत चुनावों में भी यही मंजर दिखा।अब इसे कानून व्यवस्था बनाये रखने की कोशिश कहिए या सरकार के द्वारा प्रशासन से विपक्षी प्रत्याशियों पर दबाव बनवाना,लेकिन यह सत्य है कि पुलिस के छापों व सख्ती से बड़े-बड़े सूरमा जो अपने को दबंग,प्रभावी व बाहुबली समझते थे,चुनाव मैदान में ही नही आये।जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत दोनों के प्रमुखों के निर्वाचन में बसपा का दबदबा रहा सिर्फ समाजवादी पार्टी ही बसपा के मुकाबिल रही।
आने वाले नगर निकायों के चुनावों के संदर्भ में अभी से सभी राजनैतिक दलों और प्रत्याशियों को सचेत हो जाना चाहिए।नगर निकायों के चुनाव प्रक्रिया में बदलाव करके नगर अध्यक्षों का चुनाव जनता के मतों से ना करा के निर्वाचित सभासदों के द्वारा करवाये जाने के प्रस्ताव की चर्चा जोरों पर है।अगर यह बदलाव हो गया तो यह भी निश्चित है कि पंचायती चुनावों की तरह नगर निकायों के निर्वाचन में बहुजन समाज पार्टी का परचम लहरायेगा।