Thursday, February 3, 2011

गायत्री परिवार

बाराबंकीः- पं0 श्री राम शर्मा आचार्य जन्म शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में स्थानीय गायत्री शक्ति पीठ बाराबंकी में तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किये जायेेगे।

गायत्री परिवार के वरिष्ठ कार्यकर्ता बराती लाल गुप्ता ने बताया कि आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की श्रंखला में छः फरवरी दिन रविवार को मंगल कलश शोभा यात्रा कैलाश आश्रम से चलकर शहर के प्रमुख मार्गो से होते हुए निकाली जाएगी। सात फरवरी सोमवार को प्रातः छः बजे से 24 घंटे का अखण्ड जप व सायम काल दीपदान किया जायेगा। आठ फरवरी दिन मंगलवाल को बंसन्त पर्व पर गायत्री महायज्ञ, पूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिन मनाया जायेगा। सायम काल दीपयज्ञ कार्यकर्ता गोष्ठी एव संकल्प श्रद्धाजलि का आयोजन किया जायेगा। इस मौके पर जनसामान्य से अपने-अपने घरों की छतों पर पांच, ग्यारह व इक्कीस दीपक जलाये जाने की अपील की गई है।

बाराबंकी डिपों

बाराबंकी:- बाराबंकी डिपों के अर्न्तगत फतहेपुर-सूरतगंज मार्ग पर चलने वाली बस से चालक द्वारा एक विकलांग को बस से बाहर ढकेल देने का मामला प्रकाश में आया है। पीडित द्वारा मामले की तहरीर पुलिस को दी जा चुकी है।

विगत एक फरवरी को गुलजारी लाल पुत्र रामटहलू निवासी ग्राम कछुवाहन पुरवा थाना मोम्मदपुर खाला तहसील फतहेपुर बस से बाराबंकी जाने के लिए चढकर विकलांग सीट पर बैठ गया। बस चालक एस0पी0 शर्मा द्वारा उससे पीछे बैठने के लिए कहा गया। विकलांग व्यक्ति द्वारा बार-बार बैठने-उठने में तकलीफ होने की बात कहे जाने से झल्लाए चालक ने उसको गालियां देते हुए धक्का देकर बाहर ढकेल दिया। मामले की जानकारी भुक्तभोगी द्वारा ए0आर0एम0 को मौखिक रूप से दी गई। ए0आर0एम0 द्वारा संतोष जनक उत्तर न मिलने पर भुक्तभोगी ने थाना कोतवाली बाराबंकी में प्रार्थनापत्र देकर बस चालक के खिलाफ कार्यवाही किये जाने कि मांग की है।

Monday, January 31, 2011

अन्याय के खिलाफ हर सम्भव संघर्ष ही सत्याग्रह

अन्याय के खिलाफ हर सम्भव संघर्ष ही सत्याग्रह

अरविन्द विद्रोही
महात्मा गॉंधी ने सत्य क्या है,इसके उत्तर में कहा था-यह एक कठिन प्रश्न है,किन्तु स्वयं अपने लिए मैने इसे हल कर लिया है।तुम्हारी अन्तरात्मा जो कहती है,वही सत्य है।गॉंधी जी के ही शब्दों में -कायरता और अहिंसा,पानी और आग की भॉंति एक साथ नहीं रह सकते।सत्याग्रह को स्पष्ट करते हुए महात्मा गॉंधी ने कहा था-अपने विरोधियों को दुःखी बनाने के बजाए,स्वयं अपने पर दुःख डालकर सत्य की विजय प्राप्त करना ही सत्याग्रह है।सत्याग्रह तो सत्य की विजय हेतु किये जाने वाले आध्यात्मिक और नैतिक संघर्ष का नाम है।महात्मा गॉंधी यह मानते थे कि अहिंसा वीरों का धर्म है और अपनी कायरता को अहिंसा की ओट में छिपाना निन्दनीय तथा घृणित है।यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक का चुनाव करना हो तो गॉंधी जी हिंसा को स्वीकार करते थे।उन्होंने कहा था,-यदि आपके ह्दय में हिंसा भरी है तो हम अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए अहिंसा का आवरण पहनें,इससे हिंसक होना अधिक अच्छा है।महात्मा गॉंधी कायरता के पक्षधर नहीं थे।महात्मा गॉंधी अमेरिकन अराजकतावादी लेखक हेनरी डेबिट थोरो से बहुत प्रभावित थे।थोरो की पुस्तक वद जीम कनजल व िबपअपस कपेवइमकपमदबम ने गॉंधी जी पर प्रभाव डाला।महात्मा गॉंधी पर बाइबिल के पर्वत प्रवचन-ेमतउवद वद जीम उवनदज का बड़ा प्रभाव था।पर्वत प्रवचन से ही कि,‘‘अत्याचारी का प्रतिकार मत करो,वरन जो तुम्हारे दॉंये गाल पर चॉंटा मारे उसके सामने बॉंया गाल भी कर दो,अपने शत्रु से प्रेम करो।‘‘महात्मा गॉंधी ने ग्रहण किया था।लेकिन गॉंधी जी के ही शब्दों में,‘‘अहिंसा का तात्पर्य अत्याचारी के नम्रतापूर्ण समर्पण नहीं है,वरन् इसका तात्पर्य अत्याचारी की मनमानी इच्छा का आत्मिक बल के आधार पर प्रतिरोध करना है।
महात्मा गॉंधी ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक व्यक्ति सत्याग्रही नहीं हो सकता।उनके अनुसार सत्याग्रही के लिए यह आवश्यक है कि वह सत्य पर चले,अनुशासित रहे,मन से,वचन से,कर्म से अहिंसा में विश्वास रखे।सत्याग्रही को कभी भी अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए छल,कपट,झूठ,हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए।हिन्द स्वराज्य में सत्याग्रही के लिए 11व्रतों का पालन आवश्यक बताया है,ये व्रत क्रमशः अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह,शारीरिक श्रम,अस्वाद,निर्भयता,सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना,स्वदेशी तथा अस्पृश्यता निवारण हैं।
महात्मा गॉंधी के अनुसार किसी भी तरह से अपने विरोधियों को कष्ट नहीं देना चाहिए परन्तु जब सत्याग्रही अपनी मांगों को लेकर सत्याग्रह करता है,तब निश्चित रूप से विरोधी को मानसिक परेशानी तो होती ही है।इसी लिए आर्थर मूर ने सत्याग्रह के आत्मिक बल प्रयोग को मानसिक हिंसा उमदजंस अपवसमदबम कहा है।सत्याग्रह का एक रूप उपवास भी विरोधी पक्ष के मन में भय व आतंक ही भरता है,अतःयह आतंकवाद का ही एक रूप कहा जा सकता है,इसे राजनैतिक दबाव चवसपजपबंस इसंबाउंपसपदह भी कहा जा सकता है।गॉंधी जी के बताये सत्याग्रह से भी विपक्षी को कष्ट तो होता ही है,फिर किसी को दुःख न पहुॅंचाने का सिद्धान्त भी खण्डित ही होता है।तात्पर्य यह है कि जब अन्यायी के अन्याय का विरोध करना है,सत्य का पालन करना है,सत्य का आग्रह करना है तब सिर्फ आत्मिक बल का प्रयोग क्यों??क्या आजादी की जंग में सशस्त्र संघर्ष के राही गलत राह पर थे?क्या जनता को अपने हक के लिए,आजादी के लिए,अन्याय के खिलाफ संघर्ष के जो उदाहरण हमारे 1857 के शहीदों ने प्रदत्त किये,वो अनुकरणीय नहीं है? क्या हमें चाफेकर बन्धुओं से लेकर भगत सिंह और उनके साथियों के विचार,त्याग व बलिदानों से हमें कोई प्रेरणा नहीं लेनी चाहिए,यह तो सशस्त्र संघर्ष के ही राही थे।आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को कौन भूल सकता है?1929 लाहौर कांग्रेस में दुर्गा भाभी और अन्य क्रान्तिकारियों द्वारा वितरित भगत सिेह और भगवतीचरण वोहरा द्वारा लिखित हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के घोषणा पत्र में लिखा गया था,-‘‘आजकल यह फैशन हो गया है कि अहिंसा के बारे में अन्धाधुन्ध और निरर्थक बात की जाये।जब दुनिया का वातावरण हिंसा और गरीब की लूट से भरा हुआ है,तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने का क्या तुक है?हम अपने पूरे जोर के साथ कहते हैं कि कौम के नौजवान कच्ची नींद के एैसे सपनों से रिझाये नहीं जा सकते।‘‘
दरअसल समझने की बात यह है कि महात्मा गॉंधी के बताये सत्याग्रह के रूप से भी विरोधी को कष्ट तो होता ही है।विपक्षी को मानसिक तथा कभी कभी शारीरिक कष्ट भी होता है,इस तरह तो गॉंधी जी का आदर्श कि शत्रु को भी कष्ट नहीं पहुॅंचाना चाहिए,उनके ही एक आदर्श सत्याग्रह से खण्ड़ित हो जाता है।आत्मिक बल के प्रयोग से विरोधी को मानसिक कष्ट तो होता ही है।शत्रु को कष्ट न पहुॅंचे यह सिद्धान्त भी अस्तित्व हीन व निरर्थक है।महात्मा गॉंधी जी का मन्तव्य सिर्फ यह था कि सीधे लड़ाई न लड़ी जाये,शारीरिक बल प्रयोग न किया जाये और न ही सशस्त्र आन्दोलन किया जाये।सशस्त्र संघर्ष को गॉंधी जी हिंसा मानते थे।बडी दुविधापूर्ण स्थिति है कि क्या अन्यायी,अत्याचारी,शोषकों के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध न्याय संगत नहीं है?मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्राी राम द्वारा लंकेश रावण से युद्ध व संहार क्या राम को हिंसक की श्रेणी में लाता है?क्या राम को लंका में उपवास करना चाहिए था?राम को क्या आमरण अनशन करना चाहिए था?भगवान श्राी कृष्ण ने तो पाण्ड़वों के हक के लिए उनका सारथी बनना तक स्वीकार कर महाभारत में अर्जुन का रथ चलाया।अपना चक्र धारण कर अपनी प्रतिज्ञा तोडी।अपने अत्याचारी मामा कंस,फुफेरे भाई दुष्ट शिशुपाल तक का वध कृष्ण ने किया।क्या ये श्रद्धेय जन हिंसक प्रवृत्ति के थे?क्या समाज के लिए जो बलिदान सशस्त्र संघर्ष करते हुए नौजवानों ने दिया,वे गलत राह पर थे?आज भी देश की सीमाओं पर युद्ध में शस्त्रों का ही प्रयोग होता है।और यही वास्तविकता भी है कि आत्म रक्षा हेतु सिर्फ आत्मिक बल व नैतिक बल ही नहीं,शारीरिक बल का प्रयोग भी न्याय संगत और सत्याग्रह का ही रूप है।अन्याय करने के लिए किया गया बल प्रयोग ही हिंसा कहलाना चाहिए।आत्म गौरव,सम्मान,हक,आजादी के लिए संघर्ष करने वाले तो वीर होते हैं।आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सशस्त्र संग्राम के योद्धाओं ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए,सत्य की स्थापना के लिए,आत्मिक-नैतिक-शारीरिक बल का प्रयोग कर सत्याग्रह का वास्तविक रूप स्थापित किया है।विरोधी को कष्ट तो होता ही है चाहे शारीरिक बल का प्रयोग हो या न हो।अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ने वाले हिंसक नहीं कहे जा सकते,वे तो वीरोचित धर्म का पालन करने वाले,अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले अपनी महान बलिदानी परम्परा के पालनकर्ता मात्र व सच्चे जन सेवक होते हैं।ये कायर नहीं होते,निश्चित रूप से एैसे वीर जन सत्य-अहिंसा-सत्याग्रह के सही मायनों में सच्चे अनुयायी होते हैं।

तिरंगा कार्यक्रम

तिरंगा कार्यक्रम में भाग न लेने वालों को जिम्मेदार पदों से हटाये भाजपा
अरविन्द विद्रोही
भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा के द्वारा लाल चौक में गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर देश के सम्मान के प्रतीक राष्टीय ध्वज तिरंगे को फहराने के कार्यक्रम ने पूरे देश के देशभक्त आम जन को उद्वेलित कर दिया है।यह शर्म और दुर्भाग्य की बात है कि आज आजाद भारत में भी सरकारें ब्रितानिया हुकूमत की तर्ज पर तिरंगे को फहराने पर पाबन्दी लगा रही हैं।भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लाल चौक जाने से रोकना,उनको हिरासत में लेना अलगाववादियों के आगे सरकारों का समर्पण ही है।अपने ही देश में अपना ध्वज फहराये जाने से जिस व्यक्ति,समुदाय या संगठन को आपत्ति हो उसको देशद्रोही के अतिरिक्त क्या समझा जाये?भारतीय गणराज्य के किसी भी हिस्से में तिरंगे को फहराने पर आपत्ति करने वालों को क्या अंग्रेजों की संतान कहना उचित नही है?
अभी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन पर पूरे भारत में नेताजी के चित्र,प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।गोष्ठियों,सभाओं का आयोजन विभिन्न राजनैतिक-सामाजिक संगठनों द्वारा किया गया।एक जाति विशेष के संगठन ने देश के गौरव,सशस्त्र क्रान्ति के सेनापति,आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को जातीय सीमा में बांधने का निन्दनीय किन्तु नाकामयाब प्रयास किया।दरअसल अपनी राजनीति चमकाने के फेर में लगे कई तथाकथित नेताओं को जनससमयाओं से तो कोई वास्ता रहता नहीं है,लेकिन अपने प्रभाव में वृद्धि व जनप्रतिनिधि बनने के फिराक में इस प्रवृत्ति के लोग देश के महापुरूषों को जातीय परिधि में बांधने का घृणित कार्य करते रहते हैं।आजादी के इन मतवालों ने न तो सिर्फ अपनी जाति की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी और न ही अपनी जाति के लोगों का संगठन खड़ा किया था।आजाद हिन्द फौज के संस्थापक सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक रास बिहारी बोस ने करतार सिंह सराभा के साथ मिल प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत में गदर की योजना को क्रियान्वित किया था।ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की लड़ाई लड रहे इन मतवालों ने कभी भी जातीय आधार पर संगठन नही तैयार किया।इसके भी पूर्व 1857 में भी गदर के दौरान कही भी जाति विशेष की लड़ाई की अवधारणा क्रान्तिकारियों में नहीं थी।एक जुनून था अपने वतन की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने व आतताई अंग्रेजों के प्राणों को हर लेने का।एक देश एक संकल्प की भावना को आत्मसात् किये मॉं भारती के सपूत क्रान्ति की ज्वाला में जलते हुए अपने देश की आम जनता को ब्रितानिया हुकूमत के अत्याचार से निजात दिलाने के लिए क्रान्ति पथ पर मर मिटने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नही देते थे।राजगुरू तो इसी बात से क्रान्तिकारी संगठन से नाराज हो गये थे कि असेम्बली में बम फेंकने के लिए उनको अवसर नहीं मिला।
बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हालात आज भारत में उत्पन्न हो चुके हैं।आजाद भारत में देश के सम्मान के प्रतीक घ्वज को अपनी ही सरजमीं पर फहराने से रोकने से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या हो सकती है।इसी तिरंगे को हाथ में लेकर वन्देमातरम् व भारत माता की जय बोलते हुए मॉं भारती के सपूतों ने छाती पर ब्रितानिया हुकूमत की गोली खाई थी लेकिन तिरंगे को अपने बलिदान व समर्पण से लाल किले पर फहराने का अवसर दिलाने वाले अमर बलिदानियों की आत्मा भारत सरकार के रवैये पर दुःखी ही होती होगी।इस देशभक्ति-पूर्ण कार्यक्रम को सिर्फ इस कारण से नकारना कि यह कार्यक्रम भारतीय जनता युवा मोर्चा ने तैयार किया,लाल चौक में तिरंगा फहराने से अशांति फैलेगाी,एक नाकाम सरकार का अलगाववादियों के सम्मुख समर्पण ही है।केन्द्र सरकार को और जम्मू-कश्मीर सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लाल चौक पर तिरंगा कब और कौन फहरायेगा?सरकारों को यह भी जवाब देना होगा कि क्या अपनी ही सरजमीं पर तिरंगा फहराने से रोकना किस श्रेणी का अपराध है?
लाल चौक पर तिरंगा फहराने के कार्यक्रम को तैयार करके युवा मोर्चा ने एक साहसिक कार्य किया है।भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को अब अपने संगठन को इस कार्यक्रम में सहभागिता की कसौटी पर कसना चाहिए।इस तिरंगा यात्रा में अपनी सहभागिता न करने वाले नेताओं को संगठन में जिम्मदार पदों से हटा कर उर्जावान व सांगठनिक कार्यों में सहभागिता करने वाले कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपने से कार्यकर्ता और उत्साहित होंगे।

Tuesday, January 25, 2011

बिहार के युवाओं का सकारात्मक प्रयास है बिहार उदय

बिहार के युवाओं का सकारात्मक प्रयास है बिहार उदय

अरविन्द विद्रोही
बिहार के नालन्दा जनपद के बरौती गॉंव में युवाओं के एक नये संगठन बिहार उदय ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म-दिवस 23जनवरी के अवसर निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण शिविर व समता सह भोज का आयोजन किया।बरौती गॉंव में बिहार उदय के द्वारा आयोजित इस स्वास्थ्य शिविर में 400ग्रामीणों ने स्वास्थ्य परीक्षण कराया व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।बिहार उदय संस्था के संचालक रणवीर बहादुर सिंह के अनुसार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म-दिन के पावन अवसर पर बिहार उदय संस्था ने जनपद नालन्दा के गॉंव प्रयागपुर,विजयनगर,लल्लूनगर में रहने वाले दलित-निर्धन वर्ग के निरक्षरों को शिक्षित करने व स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए एक शिक्षक गोपाल कुमार जी को नियुक्त किया गया है।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन पर बरौती में आयोजित इस शिविर में संस्था के सदस्य चिकित्सकों के दल ने ग्रामीण जनता का स्वास्थ्य परीक्षण किया।चिकित्सक दल में डॉ0श्याम नारायण प्रसाद,डॉ0दयानन्द प्रसाद,डॉ0श्रीकांत प्रसाद,डॉ0ललित प्रभाकर,डॉ0विभास प्रियदर्शी शामिल रहे।बहुत ही प्रेम-भाव,लगन व सेवा भाव से इनके द्वारा ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण करने से क्षेतीय ग्रामीणों ने इनकी प्रशंसा करने में कोई कोताही नही बरती।स्वास्थ्य परीक्षण शिविर में परीक्षण के उपरान्त जो औषधियों का वितरण गॉंववासियों को निःशुल्क किया गया वह औषधियां बिहार उदय संस्था को रंजीत कुमार,मधूसूदन रॉय तथा डॉ0फैसल अरशद के द्वारा उपलब्ध कराइ्र गई थी।इस स्वास्थ्य शिविर के आयोजन से सम्बन्धित सारी स्थानीय व्यवस्था बिहार उदय संस्था के स्थानीय सदस्यों आचार्य श्री रामप्रवेश जी महाराज,जयराम सिंह,गोपाल कुमार,राकेश कुमार टनटन,गजेन्द्र प्रसाद सिंह,कुमार राहुल,जनार्दन सिंह,मुकेश कुमार,संजीव कुमार,मनोज कुमार तथा मो0तनवीर खान ने संभाल रखी थी।
दिलचस्प पहलू यह है कि सोशल नेटवर्किंग साइट आर्कुट में एक समुदाय में आपसी बातचीत करते-करते व्यावहारिक व जमीनी स्तर अपनी बातों को अमल में लाने का जो सराहनीय कार्य बिहार के मूल निवासी किन्तु देश-विदेश में रह रहे इन युवाओं ने कर दिखाया है वह काबिले-तारीफ है।बिहार उदय संस्था एक समुदाय के रूप में विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तो मौजूद है ही,बिहार व भारत की तरक्की के संदर्भ में आपसी विचार-विमर्श कर के उन बातों का अनुपालन भी यह युवाओं का संगठन कर रहा है।बिहार उदय संस्था के प्रमुख सदस्यों में रणवीर बहादुर सिंह,मुन्ना कुमार आर्या,नीतेन्द्र कुमार कौशिक,मो0अमजद,परमेश्वर महतो व हर्षवर्द्धन शामिल हैं।इस स्वास्थ्य शिविर के आयोजन के पूर्व बिहार उदय के इन कर्मयोगियों के द्वारा अति निर्धन ग्रामीणों को शिविर लगाकर कम्बल भी वितरित किया जा चुका है।

Sunday, January 23, 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर हुए विभिन्न कार्यक्रम

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर हुए विभिन्न कार्यक्रम

बाराबंकी।आजाद हिन्द फौज के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन पर विभिन्न संगठनों के द्वारा कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।सर्वप्रथम शिवसेना के जिला अध्यक्ष किशन लाल रावत के नेतृत्व में अमित सैनी,रूद्र प्रताप,अनिरूद्ध प्रसाद आदि दर्जनों शिवसैनिकों ने अम्बेड़कर छाया चौराहे पर स्थित नेताजी की प्रतिमा पर मार्ल्यापण किया।्राष्टीय जनता दल के जिलाध्यक्ष रामकैलाश यादव,लालजी वर्मा,मनोज कुमार वर्मा,राजकमल भाष्कर,हरिश्चन्द्र यादव,अनिल श्रीवास्तव,दिनेश चन्द्र यादव,फिरोज वारसी,रामप्रसाद रावत,राजकिशोर वर्मा एवं रामप्रसाद गौतम ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया।इसी क्रम में शहर के तमाम युवा रामनगर-बेगमगंज में एकत्र हुए।नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन संघर्ष पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन युवा समाजसेवी अमित सिंह वर्मा के निवास पर किया गया।गोष्ठी में मुस्तैहसन जुबैर उर्फ जिम्मी,बृजेन्द्र सिंह,फैसल नसीम,अमित सिंह वर्मा,अब्दुल्ला नवेद,नितिन श्रीवास्तव,राजा बाली,फैज अहमद,मो0 राशिद,सुफियान गाजी,सईद अहमद खॉं,सैययद मो0हारिस,अतुल बाजपेई आदि युवाओं ने अपने सम्बोधन में नेताजी जैसे शख्सियत की भारत में पुनः आवश्यकता की बात कही।गोष्ठी के बाद यह सभी नौजवान भारत माता की जय व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए अम्बेड़कर छाया चौराहे पर पहॅंुचे तथा नेताजी की प्रतिमा पर मार्ल्यापण किया।
शहर के ही नगर-पालिका प्रांगण में चित्राश महोत्सव का आयोजन किया गया जिसमें स्थानीय विधायक व उ0प्र0 सरकार के मंत्री संग्राम सिंह वर्मा ने हिस्सा लिया।

आजाद हिन्द फौज के नायक-नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर विश्ेाष

आजाद हिन्द फौज के नायक-नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस पर विश्ेाष
अरविन्द विद्रोही
कटक के वकील जानकीनाथ बोस के घर 23जनवरी, 1897 को एक पुत्र का जन्म हुआ।श्रीमती प्रभावती बोस व जानकीनाथ बोस का यह पुत्र मॉं भारती की बेड़ियां काटने के लिए ही मानो जन्मा था।यह बालक ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम से विश्व विख्यात हुआ।मेधावी प्रतिभा के धनी सुभाष ने बी0ए0आनर्स प्रथम श्रेणी में द्वितीए स्थान प्राप्त करने के पश्चात् पिता की इच्छा पूर्ति के लिए आई0सी0एस की परीक्षा 1921 में लन्दन जाकर उत्तीर्ण की।सिविल सर्विसेज की नौकरी न करके सुभाष ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में लगाया।
सुभाष चन्द्र बोस पर स्वामी विवेकानन्द,अरविन्द घोष का बड़ा गहरा प्रभाव था।किशोरावस्था में सुभाष ने देश में यात्रायें की।आजाद हिन्द फौज के इस सेनापति का स्वभाव आध्यात्मिक ही था।सन्यासियों के प्रति आर्कषण रखने वाले सुभाष चन्द्र बोस एक सच्चे समाजसेवी तथा स्वाभिमानी योद्धा थे।क्रान्तिकारियो। के बौद्धिक नेता सरदार भगत सिंह के अनुसार,-‘‘सुभाष चन्द्र बोस हिन्दुस्तान के युवाओं के रूप में स्थापित हो चुके हैं।’’सुभाष को हिन्दुस्तान की आजादी का पक्का समर्थक बताते हुए भगत सिंह ने जुलाई 1928 के किरती में लिखा था कि सुभाष को प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है।सुभाष चन्द्र बोस को ब्रितानिया हुकूमत तख्ता पलट गिरोह का सदस्य मानती थी।बंगाल अध्यादेश के तहत् सुभाष को कैद भी किया गया था।मद्रास सम्मेलन में सुभाश चन्द्र बोस,पंडित जवाहर लाल नेहरू आदि के प्रयासों से ही पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकृत हो सका था।आध्यात्मिक प्रवृत्ति के सुभाष चन्द्र बोस ने बम्बई में आयोजित एक जनसभा में,जिसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू कर रहे थे,में कहा कि,-‘‘हिन्दुस्तान का दुनिया के नाम एक विशेष सन्देश है।वह दुनिया को आध्यात्मिक शिक्षा देगा।.........चॉंदनी रात में ताजमहल को देखो और जिस दिल की यह समझ
का परिणाम था,उसकी महानता की कल्पना करो।सोचो,एक बंगाली उपन्यास कार ने लिखा है कि हममें यह हमारे आंसू ही जम-जम कर पत्थर बन गये हैं।राष्टीयता के सवाल पर सुभाष चन्द्र बोस ने कहा,-‘‘अन्तर राष्टीयता वादी, राष्टीयता वाद को एक संकीर्ण दायरे वाली विचार धारा बताते हैं,लेकिन यह भूल है।हिन्दुस्तानी राष्टीयता का विचार ऐसा नही है।वह न संकीर्ण है,न निजी स्वार्थ से प्रेरित है और न उत्पीड़नकारी है,क्योंकि इसकी जड़ या मूल तो यह ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ है,अर्थात‘सच,कल्याणकारी और सुन्दर’सुभाष चन्द्र बोस के नजरिए मे। पंचायती राज और जनता का राज की अवधारणा भारत के लिए नई चीज नहीं है,यह भारत की पुरातन व्यवस्था है।भावुक सुभाष चन्द्र बोस अपनी पुरातन मर्यादाओं और सिद्धान्तों के मानने वाले एक राजपरिवर्तन कारी व्यक्तित्व के थे।पूर्ण स्वराज्य के समर्थक सुभाष चन्द्र बोस,पश्चिम वासी अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ मजदूरों के प्रति सहानुभूति रखने वाले तथा उनकी स्थिति में सुधार चाहने वाले थे।सुभाष चन्द्र बोस के फैसले दिल के फैसले होते थे।सुभाष चन्द्र बोस राष्टीय राजनीति में तब तक ध्यान देना आवश्यक समझते थे,जब तक दुनिया की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल हो।देशबन्धु चित्तरंजन दास के राजनैतिक शिष्य सुभाष चन्द्र बोस,उनके निर्देश पर कलकत्ता की राष्टीय विद्यापीठ में प्रचार विभाग में कार्य करने लगे।सुभाष चन्द्र बोस को ‘‘बांग्लारकथा’’नामक अखबार का सम्पादन कार्य की जिम्मेदारी भी दी गई।1924 में चित्तरंजन दास के कलकत्ता के महापौर बनने पर सुभाष चन्द्र बोस को उन्होंने अपना कार्यकारी अधिकारी बनाया।समाजसेवी सुभाश चन्द्र बोस अपनी तनख्वाह गरीब छात्रों पर खर्च करने लगे।स्वंयसेवकों के संगठन का अपराधी होने के आरोप में सुभाष को छः माह की जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी।जेल से रिहायी के बाद देशबंधु चित्तरंजन दास के ‘फारवर्ड’ नामक पत्र का सम्पादन कार्य सुभाष चन्द्र बोस ने संभाला।25अक्तूबर,1924 को बगैर कारण पुनःहिरासत में ले लिए गये सुभाष को अस्वस्थ हो जाने पर ही 15मई,1927 को रिहा किया गया।बंगाल प्रांतीय समिति के अध्यक्ष के पद और उसके बाद अखिल भारतीय राष्टीय कांग्रेस के महामंत्री के पद पर कार्य करके सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिभा और व्यक्तित्व में निखार आया।बहुमुखी प्रतिभावान सुभाष चन्द्र बोस एक लेखक,सैनिक,दार्षनिक,राजनीतिज्ञ,कुशल प्रशासक,वक्ता,सेनानायक व भविष्य दृष्टा के रूप में युगों-युगों तक भारतीय जनमानस के,राष्टवादी विचारधारा के वाहको। के ह्दय सम्राट व आदर्श रहेंगें।सन्1930 में कलकत्ता के महापौर चुने जाने पर सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के अभिनन्दन की प्रथा को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य किया।साथ ही साथ कलकत्ता को स्वच्छ करवाया,आरोग्य सेवा के प्रचार प्रसार को प्रारम्भ कराया,‘‘महाजती सदन’’ का शिलान्यास गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के हाथों करवाया,सांस्कृतिक पारम्परिक कार्यक्रमों को पुनः आयोजित करवाना प्रारम्भ किया,प्रषासनिक दक्षता बढ़ायी,कल्याण कोषों की स्थापना तथा उद्योगों को प्रोत्साहन दिया।
सुभाष चन्द्र बोस के प्रभाव से परेशान ब्रितानिया हुकूमत,बार-बार सुभाष चन्द्र बोस को कैद करके इघर उधर के जेलों में रखती थी।सुभाष को अंग्रेज सरकार ने निर्वासित करके यूरोप भेज दिया।पिता की बीमारी की खबर सुनकर सुभाष चन्द्र बोस,भारत में निषेधाज्ञा की परवाह किये बगैर लौट आये।कराची में सुभाष चन्द्र बोस को रोक कर,उनकी पुस्तक ‘‘इंडियन स्टगल’’ को जब्त कर लिया गया।पिता की मृत्यु के पश्चात्,सुभाष चन्द्र बोस को अंत्येष्टि हेतु जाने मिला।अंत्येष्टि के पश्चात् सुभाश चन्द्र बोस ने भूमिगत होकर,यूरोपीय देशों का प्रवास कर वहॉं पर भारतीयों की आजादी के लिए समर्थन जुटाया।लन्दन में प्रवेश प्रतिबन्धित होने के कारण 10जून, 1933 को लन्दन में आयोजित तृतीय भारतीय राजनीतिक सभा के अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस का अध्यक्षीय भाषण पढ़कर सुनाया गया।हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण,सुभाष चन्द्र बोस के इतिहास की गहरी जानकारी तथा अन्तर राष्टीय राजनीति के असाधारण ज्ञान का दस्तावेज है। सत्याग्रह को क्रियात्मक बनाने पर जोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस 1939 में पुनः त्रिपुरा कंाग्रेस के अध्यक्ष चुने गये।महात्मा गॉंधी से राजनैतिक मतभेद के कारण सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस छोड़ दी तथा 3मई,1939 को कलकत्ता में ‘‘फारवर्ड ब्लाक’’ की स्थापना कर बिखरी वाम शक्ति के एकीकरण तथा स्वतंत्रता आन्दोलन को तेज करने का प्रयास किया।द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारम्भ में ही ब्रितानिया हुकूमत ने सुभाष चन्द्र बोस को ‘‘हॉलवैल स्मारक हआओ’’ मुहिम के कारण कैद कर लिया।सुभाष चन्द्र बोस की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए यह ग्यारहवीं तथा अन्तिम जेल यात्रा साबित हुई। सुभाष चन्द्र बोस ने इस अन्याय व दमन के खिलाफ अंग्रेज सरकार को पत्र लिखा कि या तो उन्हें जेल से मुक्त किया जाये नहीं तो वे अनशन कर प्राण त्याग देगें।अंग्रेजों को लिखा यह पत्र सुभाष चन्द्र बोस की राजनैतिक वसीयत है।सप्ताह भर के अनशन के बाद अंग्रेजों ने 5दिसम्बर,1940 को सुभाष चन्द्र बोस को जेल से रिहा कर दिया।धूर्त अंग्रेजों ने सुभाष चन्द्र बोस को घर में नजरबन्द कर दिया।आखिरकार 18जनवरी,1941 को सुभाष चन्द्र बोस,मौलवी का वेष धर कर घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर,अपने भतीजे डॉ0 शिशिर बोस के द्वारा लाई गई कार में बैठ कर धनबाद पहुॅंचे।इस समय भारत की आजादी के लिए जापान में रह रहे,सशस्त्र क्रान्ति के संयोजक रासबिहारी बोस ने जापान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मदद के लिए तैयार कर,आजाद हिन्द फौज का गठन कर लिया था।15जून,1942 के बैंकाक सम्मेलन में सुभाष चन्द्र बोस को जापान आकर इस फौज का नेतृत्व संभालने का निमंत्रण भेजा गया।सुभाष चन्द्र बोस 16मई,1943 को टोकियो-जापान पहुॅंचे।सुभाष चन्द्र बोस ने टोकियो रेडियो पर बोलते हुए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संग्राम के दृढ़ निश्चय और पूर्वी सरहद से आक्रमण आरम्भ करने की घोषणा की।4जुलाई,1943 को रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस को सौंपा।सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाने तथा आजाद हिन्द फौज को लेकर हिन्दुस्तान जाने की घोषणा की।5जुलाई,1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का निरीक्षण कर ‘‘दिल्ली चलो’’ का उद्घोष किया।25अगस्त, 1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का सिपहसालार पद ग्रहण कर,सेना में भारतीय युवतियों को लेकर ‘‘झॉंसी की रानी रेजीमेण्ट’’ बनाई। आजाद हिन्द फौज में गॉंधी,आजाद और नेहरू बिग्रेड़ बनाई गई।23अक्तूबर, 1943 को आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार की तरफ से सुभाष चन्द्र बोस ने ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।जापान,जर्मनी,इटली,बर्मा,चीन,थाईलैण्ड़,फिलीपीन्स,मंचूरिया की सरकारों ने आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार को मान्यता दी तथा 6नवम्बर,1943 को तोजो ने बृहत्तर पूर्व एशिया सम्मेलन में घोषणा की कि जापान ने अंडमान और निकोबार के टापुओं को आजाद हिन्द की अस्थायी सरकार के हाथों में सौंपने का फैसला किया है।31दिसम्बर,1943 को सुभाष चन्द्र बोस ने अंडमान पहुॅंच कर दोनो टापुओं का प्रशासन अपने हाथों में लेकर दोनों टापुओं का नाम क्रमश्ःः‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ द्वीप रखा।गॉंधी,आजाद व नेहरू बिग्रेड़ के चुनिन्दा सैनिकों को लेकर सितम्बर1943 में मलाया के ताइपिंग में पहली छापामार रेजीमेण्ट ‘सुभाष बिग्रेड’ के नाम से बनायी गयी थी।इसके सेनापति शाहनवाज खॉं बनाये गये।4जनवरी,1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने रंगून पहुॅंच कर,मुख्य कार्यालय स्थापित किया।3फरवरी,1944 को रंगून से सुभाश चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को जीत या शहादत के लिए रवाना किया। आजाद हिन्द फौज के सैनिकों और भारतवासियों से सुभाष चन्द्र बोस ने कहा,-‘‘तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आजादी दूॅंगा।’’शहनवाज खॉं,कप्तान सूरजमल,कमांडर अजब सिंह,मनसुख लाल,मेजर आबिद हुसैन,मेजर रतूरी आदि आजाद हिन्द के सेना नायकों ने अपनी सरजमीं की आजादी के लिए हरसम्भव प्रयास किये।इन रणबांकुरों ने अपने अदम्य शौर्य व साहस का प्रदर्शन करते हुए टेटमा,प्लेटवा,डलेटमा,मोडक चौकी,अल्वा चौकी,क्लंग-क्लंग चौकी,क्लालखुआ,कोहिमा पर तिरंगा फहरा कर नेताजी की जय और जय हिन्द के नारे लगाये।इम्फाल के निर्णायक युद्ध में हार चुकी अंग्रेज फौज भागने का मार्ग न मिलने के कारण लडती रही,प्रकृति ने अंग्रेजों का साथ दे दिया,भीषण बरसात ने आजाद हिन्द फौज को तितर-बितर कर दिया।नेताजी सुभाष चन्द्र बोस मन व शरीर दोनो से युद्ध,प्रशासन व संगठन तीनों मोर्चों पर एक साथ काम करते हुए फौजों का मनोबल व उत्साह बढ़ा रहे थे। इम्फाल में शिकस्त खाकर फौज रंगून लौटी।अमेरिका के द्वारा जापान पर अणु बम के हमले के बाद जापान ने हार स्वीकार कर ली परन्तु नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने हार न स्वीकारी।आपात कालीन फैसले लेते हुए गोपनीय दस्तावेज नष्ट करके,झंासी की रानी रेजीमेण्ट को भंग करके,युवतियों को घर भेजा गया।सारे साथियों को बर्मा से सकुशल बाहर निकाल कर,16अगस्त 1946 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर से बैंकाक होते हुए सैगोन,सैगोन से इण्डोचायना व फारमोसा द्वीप पहुॅंचे।फारमोसा के ताईहोकू हवाई अड्डे पर 18अगस्त,1945 को भोजन करने के पश्चात्,दो इंजन वाले जापानी बमबाज हवाई जहाज में बैठकर जैसे ही रवाना हुए,जहाज में आग लग गई।बुरी तरह जले हुए सुभाष चन्द्र बोस को अस्पताल ले जाया गया,जहॉं पर रात 8 से 9 बजे के बीच उनका देहान्त हो गया।इस दुर्घटना की बात को सुभाष चन्द्र बोस के परिजनों व प्रशंसकों ने सत्य नहीं माना।आजादी के बाद भारत सरकार की जांच में यह दुर्घटना सत्य साबित हुई।नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का अंतिम संदेश था,-’’मेरा अन्त समीप है,हबीब।देशवासियों से कहना कि आजादी की लड़ाई चालू रखें।भारत शीघ्र ही आजाद होने वाला है।’’ साहस,सह्दयता व नैतिकता की साक्षात् मूर्ति सुभाष चन्द्र बोस के दिल में महात्मा गॉंधी के एवं अहिंसा के प्रति गहन आस्था थी।परन्तु आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को वे वीरोचित आचरण मानते थे।यह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही थे,जिन्होंने सर्वप्रथम रेडियो रंगून से महात्मा गॉंधी को ‘‘राष्टपिता’’ कह कर सम्बोधित किया था।सुभाष चन्द्र बोस ने एक बार कहा था,-‘‘एक बार भारत स्वतंत्र हो जाये,तो इसे मैं गॉंधी जी को सौंप दूॅंगा और कहूॅंगा कि अब इसे आपकी अहिंसा की सबसे ज्यादा जरूरत है।’’सुभाष चन्द्र बोस के संघर्ष,उनकी सोच व कर्मठता आज हमारे बीच प्रेरक बनकर,उनके सदैव हमारे साथ होने का अहसास कराने के साथ-साथ देशहित में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने का पाठ पढ़ाती रहती है।