Thursday, March 3, 2011

महत्वाकांक्षी इंसान

नितेन्द्र विक्रम कौशिक
महत्वाकांक्षी होना इंसान के लिए बहुत अच्छी बात है , लेकिन ज्यादा महत्वाकांक्षी होना गलत है , क्योंकि वो फिर लोभ और स्वार्थ का धोतक है , कभी कभी हम अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के चकर में दुसरे लोगों की महत्वाकांक्षा और उनकी भावनाओं को गहरा ठेस पहुंचाते हैं ! हमें ये ख्याल रखना होगा की और लोग भी हैं , सभी लोगों का अलग अलग महत्व है , सभी लोगों का मान सामान , महत्व का ख्याल रखते हुए हमें अपना वक्तव्य देना चाहिए ! हम हमेश अपनी आदत से लचर हैं अपने आपको देखने और दिखाने के चकर में औरों को भूल जाते हैं , कभी कभी इन सबों के चकर में लोगों की गरिमा तो ठेस पहुंचाते हैं , हम हमेशा भूल जाते हैं की सामने वाला व्यक्ति क्या है , उनकी अहमियत क्या है , मैं जो बोलने या लिखने जा रहा हूँ वो सही है या नहीं है , इससे औरों को कैसा महसूस होगा ? ऐसा तो नहीं की हम लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं, और ऐसे भी हमारी जो सभ्यता और संस्कृति है उसके हिसाब से लोगों का ख्याल रखना पड़ता है , सामने वाले वरिष्ट हैं या गुनी हैं या फिर हम से ज्यादा जानते हों और करते हों , एक संगठन चलने के लिए इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ेगा तभी जाकर कोई संगठन सफल होगा , हम हमेशा लोगों को भूल कर आदेश जरी कर देते हैं , हमारे संस्कृति में व्यक्तियों की दो वजहों से आदर करते हैं एक उनके उम्र के हिसाब से दूसरा उनके काम और उनके नाम के हिसाब से , लेकिन ये बहुत ही दुःख की बात है की हमलोग या भूल गए हैं ! और अक्सर ही ऐसी गलतियाँ करते रहते हैं ! जब हम औरों को आदर करेंगे तभी हमें भी कोई आदर करेगा , जब हम औरों की भावनाओं का क़द्र करेंगे तभी हमारी भावनाओं की कोई क़द्र करेगा ! हमें अपने आप को भूलना नहीं चाहिए ! हम अपनी बात दो तरीके से किसी को कह सकते हैं एक तो आदेश दे सकते हैं और दूसरा हम निवेदन करते हुए ,ये हमें तय करना है की इन दोनों में कौन सा तरीका अच्छा रहेगा ! देखने में ये छोटी बात लगती है लेकिन ये बहुत ही बड़ी बातें हैं ! इन्ही छोटी छोटी बातों से रिश्तों के बिच बहुत बड़ी खायी आ जाती है , और बाद में उस खायी को पाटना बहुत मुश्किल हो जाता है !

Wednesday, March 2, 2011

महाशिवरात्रि पर लोधेश्वर महादेव-बाराबंकी पहुॅंचे शिवभक्त

महाशिवरात्रि पर लोधेश्वर महादेव-बाराबंकी पहुॅंचे शिवभक्त
आशुतोष कुमार श्रीवास्तव
बाराबंकी।महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर द्वापरकालीन भूतभावन भोलेनाथ बाबा लोधेश्वर महादेव को गंगाजल चढाने सुदूर क्षेत्रों से कांवरियों के आने का सिलसिला विगत् एक पखवारे से शुरू हो चुका था।दूर-दराज से आने वाले शिवभक्तों के विश्राम,जलपान व भोजन की व्यवस्था बाराबंकी जनपद के तमाम नागरिक संगठन बडे ही श्रद्धाभाव व मनोयोग से करते आ रहे हैं।इस वर्ष भी महादेवा जाने वाले मार्ग पर जगह-जगह शिवभक्त कांवरियों के लिए शिविर लगाया गया।महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर लगने वाले फागुनी मेले में प्रति वर्ष कानपुर से गंगाजल लेकर सुदूर क्षेतंों से शिवभक्त कांवरिये पैदल बाराबंकी जनपद स्थित लोधेश्वर महादेव की पूजा अर्चना व जलाभिषेक करने भगवान भोलेनाथ का जयकारा लगाते हुए आते हैं।अपनी धुन व शिवभक्ति के पक्के कांवरियों की सकुशल सुरक्षित यात्रा,पूजा-अर्चना,जलाभिषेक सम्पन्न कराना प्रशासन के लिए एक चुनौती ही होता है।प्रशासन पूरी यात्रा के दौरान मुस्तैद व चौकना रहता है।श्री लोधेश्वर महादेव मंदिर जाते हुए जब बाराबंकी क्षेत्र में कांवरिये प्रवेश करते हैं तो जगह-जगह लगे उनके व्श्रिाम व जलपान शिविर उनका उत्साह बढा देते हैं।हाथ जोडकर सविनय कांवरियों को शिविर में बाराबंकी के नागरिक आमंत्रित करते हैं।कांवरियों की सेवा करके बाराबंकी जनपद के शिवभक्त नागरिक अपने को संतुष्ट व प्रसन्न महसूस करते हैं।बाराबंकी विकास मंच ने बाराबंकी जिलाधिकारी आवास के बगल में सोमवार व मंगलवार दो दिन शिविर लगाकर कांवरियों की सेवा की।विश्राम व जलपान शिविर का उद्घाटन बाराबंकी की आदर्श कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक जितेन्द्र गिरि द्वारा भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना तथा उपस्थित दर्जनों कांवरियों को अपने हाथों से प्रसाद रूपी मिष्ठान,फल भेंट करके किया गया।इस अवसर पर बाराबंकी जनपद के वयोवृद्ध समाजसेवी गोपाल सिंह सेवक,अरविन्द विद्रोही,आशुतोष श्रीवास्तव,भानुप्रताप सिंह वर्मा,शिव कुमार श्रीवास्तव,अनुतोष श्रीवास्तव,संतोष शुक्ला,राजेश भारती-बाबा,औवैश किदवाई,संजय वर्मा-पत्रकार,रमेश चन्द्र रावत,धर्मेन्द्र विद्यार्थी,विश्राम धनगर,सत्यदेव कुमार श्रीवास्तव-वाणिज्य कर विभाग आदि शिवभक्त मौजूद रहे।दूसरे दिन शिविर में अधिवक्ता कमलेश चन्द्र शर्मा,सुरेन्द्र नाथ शर्मा,पुष्पेन्द्र,सचिन वर्मा,आशीष शरण गुप्ता,बसन्त गुप्ता,बहादुर आदि शिवभक्तों ने आकर कांवरियों के जलपान वितरण में अपना योगदान दिया।

Tuesday, March 1, 2011

अजब मठाधीश की गजब कहानी

अजब मठाधीश की गजब कहानी
Rashmi Singh
Disclaimer: इस कहानी के सारे पात्र और स्थान काल्पनिक हैं. लेकिन इसका सम्बन्ध कुछ जीवित व्यक्तियों से है और यह कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित है.



एक मठ था. बहुत बड़ा मठ था. लोग मिलजुल कर रहते थे उसमे. मठाधिशो की भी बहुत इज्जत थी उसमे. गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वहन बड़े अच्छे ढंग से होता था.

उस मठ के शिष्यों में से एक थे श्री पल्टू राम. गजब के पल्टू थे वे. जिधर पलड़ा भारी होता था पलट जाते थे. उनका सारा समय मठाधिशो के पीछे ही जाता था. मठाधिशो के बहुत सारे काम वो खुद ही कर दिया करते थे. उनकी एक और खासियत थी वो जो भी काम करते थे चद्दर ओढ़ के. खैर, मठाधिशो के काम करते-करते उनके मन में एक दिन भावना जगी की काश मैं भी किसी मठ का मठाधीश होता. भावना क्या जगी, उन्होंने तो बस ठान लिया की मुझे भी मठाधीश बनना है. लेकिन, उनको ये पता था की इस मठ में तो कोई संभावना नहीं है. तो उन्होंने एक नया मठ बनाने का निर्णय किया और लग गए मठ बनाने में.

उन्हें ये भी अच्छी तरह पता था की नया मठ बनाना इतना आसान नहीं है और इस मठ से भी लोग उनके मठ में ऐसे नहीं जायेंगे. इस काम को बखूबी अंजाम देने के लिए उन्होंने पहले तो लोगो की बुराई दुसरे के सामने करनी शुरू की और बहुत सारे फर्जी शिष्यों को इकठ्ठा करना शुरू किया. इसके लिए उन्होंने खूब मेहनत की. वो मठ बनाने के लिए दिन में १८ घंटे काम करने लगे. उन्होंने कुछ फर्जी शिष्याएं भी बना ली ताकि पुराने मठ के शिष्यों को ये शिष्याएं लुभा के उनके मठ में ले आये. खैर उनकी मेहनत रंग लायी और उनका एक मठ तैयार हो गया. उस मठ में उन्होंने फर्जी शिष्य-शिष्याओं को भर दिया ताकि लोगो को लगे की ये मठ चल निकला है. चुकी उनके मठ में बहुत सारी फर्जी शिष्याएं थी, तो शिष्य भी आकर्षित हो के आने लगे.

ऐसे करते-करते पल्टू राम की मेहनत रंग लाने लगी. लेकिन पल्टू राम को संतोष कहाँ ? उन्हें तो ज्यादा से ज्यादा शिष्य चाहिए थे. इसके लिए उन्होंने नया तरीका निकला. उन्होंने अपने फर्जी शिष्य-शिष्याओं को अलग-अलग मठों जो की अन्य क्षेत्रो के भी थे ,में शिष्य बनवा दिया. हालाँकि उनके मठ का क्षेत्र कुछ और था लेकिन उनको इससे क्या लेना-देना था, उन्हें तो ज्यादा से ज्यादा शिष्य चहिये थे जो उनका गुणगान कर सके.

वो सारे लोग अलग अलग क्षेत्रो से शिष्यों को इकठ्ठा कर उनके मठों में भेजने लगे. अब उनके शिष्यों की संख्या और भी ज्यादा हो गयी. वो शिष्यों के गुणगान करते, बदले में शिष्य भी उनका गुणगान करने लगे. अब पल्टू राम की दूकान अच्छी चलने लगी. वो रोज नयी तरह की बातें करते; कभी हंसी-मजाक तो कभी कुछ और.

लेकिन कहानी में नया मोड़ आने लगा. वो शिष्य जो दुसरे मठों से भगाकर लाये गए थे उन्हें लगने लगा की मठाधीश तो कुछ करते नहीं, खाली बातें करते हैं. अब ये पल्टू राम के लिए चिंता का विषय बन गया. खैर, हमारे पल्टू राम भी कहाँ ऐसे हार मानने वाले थे. उन्होंने नयी स्कीम निकाली. उन्होंने शिष्यों को बोला की चलो समाज सेवा करते हैं. अब जो गंभीर शिष्य थे वो फटाक से तैयार हो गए और साथ में पल्टू राम की गुणगान फिर से होने लगी. ऐसे करते करते उन्होंने ४ साल निकाल दिए. लोग भी सोचते रहे की पल्टू राम जी अब कुछ करेंगे की तब कुछ करेंगे, लेकिन , पल्टू राम तो कहाँ कुछ करने वाले थे. अब जब ४ साल तक कुछ नहीं हुआ तो आवाजें फिर से उठने लगी. लेकिन पल्टू राम के पास इसका भी जवाब था. जो आवाज़ उठती थी, उसको वो रातों रात मठ से गायब कर देते थे और अपने किसी फर्जी शिष्य से अपनी बड़ाई करवाने लगते थे. इस तरह से उनकी गाड़ी बढ़ने लगी.

लेकिन कहानी में बड़ा मोड़ तब आया जब कुछ उनके शिष्य जो उनकी समाज सेवा की बातें सुन सुन के गंभीर हो गए थे, सही में कुछ करने का सोचने लगे. अब जा के पल्टू राम की चिंता बढ़ी. उन्होंने सोचा की अब तो कुछ करना ही पड़ेगा ऐसा लगता है. तो उन्होंने शिष्यों की बैठक बुलाई और बाते की हम लोग समाज सेवा अब बहुत जल्दी ही शुरू करेंगे, आप लोग अब पैसे की व्यवस्था करना शुरू करें. ऐसा सुनना था की सारे शिष्य खुश हो गए. पैसा इकठ्ठा होने लगा. पल्टू राम के दिन अच्छे निकलने लगे और उनकी वाहवाही फिर से होने लगी. लेकिन, जब पैसे इकट्ठे होने लगे तो लोग सवाल भी पूछने कगे की पैसे तो इकट्ठे हो गए अब समाज सेवा कब करना है. पल्टू राम को तो कहाँ कुछ करना था. ज्यादा असंतोष देख उन्होंने शिष्यों को ही बांटना शुरू कर दिया. उन्होंने एक नयी स्कीम निकाली. अब वो शिष्यों में इनाम बांटने लगे. अलग अलग वर्गो के इनाम बना दिए जैसे सबसे अच्छा शिष्य, सबसे ज्यादा बोलने वाला शिष्य, सबसे ज्यादा घुमने वाला शिष्य आदि आदि. अब शिष्य भी इन सब चीजों के पीछे व्यस्त होने लगे. और पल्टू राम जी ने भी अपने एक दो फर्जी शिष्यों से कहवा कर अपने आपको को भी महान घोषित करवा लिया.

उनकी मठ में नए नए लोग आने लगे. वो भी पल्टू राम का गुणगान करने लगे ये जान कर की पल्टू राम जी समाज सेवक हैं. इस बीच पल्टू राम जी अलग अलग मठों से लोगो को भगाकर लाते रहे और अपने मठ में शिष्यों की संख्या अच्छी खासी कर ली.

लेकिन कुछ कुछ शिष्य भी कहाँ मानने वाले थे. उन्होंने फिर सवाल पूछने शुरू कर दिए. अब तो पल्टू राम जी को लगा की कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा. अब तो पैसे भी इकट्ठे हो गए हैं. लोगो को पैसा तो वापस कर नहीं सकते ये बोलकर की मैं समाज सेवा नहीं कर सकता. खैर, अब उन्होंने अपनी बुद्धि लगायी और फिर एक उपाय निकाल लिया. ये उपाय अपने आप में अनूठा था. ये उपाय था "ठेके पर समाज सेवा" का. उन्होंने ये पैसे किसी और समाज सेवी को भेज, ठेके पर समाज सेवा करने की ठान ली. लोगो को बता भी दिया. लोग भी अलग अलग माध्यमो से प्रचार करने लगे पल्टू राम जी के महानता की. लेकिन पल्टू राम जी तो अपनी हरकतों से कहाँ बाज आने वाले थे. उन्हें लगा की इस चीज को जितना चला सकूँ चलाना चाहिए. एक बार ठेके पर समाज सेवा करा दिया तो फिर कौन पूछेगा. इसके लिए वो ठेके पर समाज सेवा की रोज-रोज नयी -नयी तारीखे रखने लगे. हालत ये है की पल्टू राम जी अभी भी तारीखें ही रख रहे हैं. और लोग अभी भी उनकी महानता का गुण ही गा रहे हैं.

खैर, छोडिये पल्टू राम जी को अभी तक ये कहानी यही तक है. जब कहानी आगे बढ़ेगी, तो मैं फिर बताउंगी. तब तक के लिए आप भी पल्टू राम जी की बातों का आनंद लीजिये.

Saturday, February 26, 2011

चन्द्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस पर

साहस-शौर्य-संकल्प के प्रतीक हैं -आजाद
अरविन्द विद्रोही
दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजाद ही रहें हैं,आजाद ही रहेंगे ।

चन्द्रशेखर आजाद नाम नहीं,प्रतीक बन गया है-साहस,शौर्य,संकल्प,देशभक्ति,मिलन सारिता एवं सूझ-बूझ का।ऩि़र्धनता में पले-बढ़े चन्द्रशेखर तिवारी के पिता पं0सीताराम तिवारी मूलतः ग्राम बदरका,जनपद उन्नाव,उ0प्र0 के रहने वाले थे।
संवत्1956 के देशव्यापी अकाल के समय जीविकोपार्जन के लिए पं0सीताराम तिवारी बदरका छोड़ कर भावश,तत्कालीन अली राजपुर जिला-वर्तमान में झाबुआ जिला में सरकारी बाग की रखवाली का काम करने लगे थे।आजाद के पिता अत्यन्त निर्धन,सदाचारी,ईमानदार किन्तु क्रोधी स्वभाव के थे।माता जगरानी देवी जी निरक्षर थी।परिवार कट्टर सनातनी ब्राह्मण।बालक चन्द्रशेखर तेजस्वी,कर्मशील और नटखट।अपने नटखटपने के कारण वे अपने पिता के कोप-भाजन का शिकार बनते रहते थे।चन्द्रशेखर के
चार भाई मौत के शिकार हो चुके थे,माता अपने इकलौते पुत्र पर स्नेह-ममत्व लुटाती रहती।सनातनी ब्राह्मण का तेजस्वी बालक संस्कृत पढ़ने काशी आ पहुॅंचा।सन्1921,चन्द्रशेखर तिवारी की उम्र चौदह वर्ष मात्र।सर्वत्र असहयोग आन्दोलन का वातावरण।भारत-भर में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और होली मनाई जा रही थी।परिवार की स्थितिजन्य परिस्थितियों ने बालक चन्द्रशेखर को कष्ट सहने वाला,कठोर परिश्रमी,विकट परिस्थितियों में संघर्ष करने वाला बना दिया था।इसी दौरान ब्रिटेन के युवराज डयूक ऑफ विण्डसर का भारत आगमन हो गया।भारत को एक क्रान्तिपुत्र मिलने की,उस क्रान्ति के हीरे की जौहरियों के नजर में आने की घड़ी आ गई।
कंाग्रेस ने ब्रिटेन के युवराज की भारत यात्रा का विरोध किया।सर्वत्र हड़ताल रखी गई।तनाव पैदा हो गया।दंगे भी हुए।सरकार ने सख्ती बरती।महात्मा गॉंधी को छः महीने का कारावास मिला।चन्द्रशेखर ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया।पकड़े गये।इसी अपराध में मुकदमा चला।बालक चन्द्रशेखर ने मुकदमें के दौरान जो उत्तर दिये,वो आज तक ह्दय को झकझोरने के लिए पर्याप्त है।प्रत्येक उत्तर में देश भक्ति व निर्भीकता।
नाम-आजाद
पिता-स्वतन्त्र
निवास-जेलखाना

यैसे उत्तरों को सुनकर न्यायाधीश खारेघाट क्रोधित हो उठा,पन्द्रह कोड़ों की सजा सुनाई।प्रत्येक कोड़े के लगने पर वन्देमातरम् व महात्मा गॉ।धी की जय बोलते-बोलते वीर बालक मुर्छित होकर धरती मॉं की गोद में विश्राम करने लगा।
सारे बनारस में मानों हवा के माध्यम से यह घटना फैल गई।शहर कांग्रेस समिति ने उनके अभिनन्दन समारोह का आयोजन किया।श्री मन्मथनथ गुप्त ने लिखा है कि काशी के इतिहास में सभा एक अविस्मरणीय घटना है।सभा में चन्द्रशेखर का अभिनन्दन उनकी वीरता के अनुरूप ही हुआ। आततायी ब्रितानिया हुकुमत से टक्कर लेने वाले किशोर के दर्शन करने व आर्शीवाद देने मानों समूचा काशी आ उमड़ा।छोटे से बालक को देखने पहुॅंची अपार भीड़।मंच पर मेज लगाकर साहसी बालक को खड़ा किया गया।महात्मा गॉंधी की जय से सारा वातावरण गुंजायमान हो उठा।चन्द्रशेखर ने अपना वक्तव्य दिया।सारा शरीर फूलों से लाद दिया गया।ऑंखे सिंह की भॉंति चमक रही थी।सिंह की गर्जना अंग्रेजों के कानों तक पहुॅंच ही चुकी थी।बस वो घड़ी,चन्द्रशेखर तिवारी को श्री प्रकाश जी ने आजाद नाम से अलंकृत किया।
बनारस के सुप्रसिद्ध देशभक्त शिव प्रसाद गुप्त ने आजाद को अपने संरक्षण में लिया।काशी विद्यापीठ में दाखिला कराया।पहले ही दिन उनके दर्शन के लिए विद्याार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी।आजाद का लक्ष्य शिक्षा तो था नहीं,लिहाजा थोड़े ही दिनों में उन्होंने शिव प्रसाद गुप्त का घर छोड़ दिया।आजाद ने आजादी प्राप्त करने की दिशा में स्वयं को समर्पित कर लिया था।
चौरी चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन स्थगित हो गया और महात्मा गॉंधी के अहिंसक मार्ग से क्रान्तिकारियों का विश्वास हिलने लगा था।प्रख्यात क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल संयुक्त प्रान्त में संगठन कर रहे थे।श्री सान्याल अण्डमान जेल से छूटकर आये थे।श्री सान्याल की पुस्तक ‘‘बन्दीरक्षक‘‘ अपनी प्रसिद्धी की ओर अग्रसर थी।पुस्तक युवाओं को क्रान्ति के मार्ग पर चलाने के लिए एक बड़ी प्रेरणा श्रोत बन गई।श्री सान्याल ने राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के नेतृत्व में ‘‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन‘‘ नामक दल को तैयार किया।प्रणवेश चटर्जी इस दल के सदस्य थे।श्री चटर्जी ने मन्मथनाथ गुप्त को आजाद का मन टटोलने की जिम्मेदारी सौंपी।आजाद तो पैदा ही भारत की आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए हुए थे।शीघ्र ही आजाद अंतरंग समिति के सदस्य बन गये।दल का उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्त करने के साथ-साथ शोषण रहित प्रजातन्त्र की स्थापना करना था।अमर शहीद पं0 रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी रेल काण्ड में हिस्सा लिया और 1925 में काकोरी षड़यंत्र केस में फरार होकर झा।सी पहुॅंचे।झॉंसी और ओरछे के बीच सातार नदी के किनारे पर एक कुटिया में हरिशंकर ब्रह्मचारी बन कर रहे।आजाद ने कुशल संगठनकर्ता होने का परिचय देते हुए छिन्न-भिन्न हो चुके सूत्रों को फिर से जोड़ लिया।क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर आजाद ने प्रमुख कार्य किये उनमें- लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज करने वाले ए0एस0पी0 साण्डर्स का वध,देहली की धारा सभा में बम विस्फोट तथा वायसराय की गाड़ी के नीचे बम विस्फोट कराना शामिल है।27 फरवरी,1931 को अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में पुलिस से युद्ध करते हुए,बलिदान देते समय तक चन्द्रषेखर आजाद ने अपने एक-एक शब्द को जीया।उन्होंने साथियों से जो कहा वही किया।जिस वृक्ष के नीचे आजाद ने अपने प्राण त्यागे थे,दूसरे दिन वह फूलों से लदा था।जनता ने वृक्ष पर आजाद का नाम लिखा,पेड़ के नीचे की माटी विद्यार्थी माथे पर लगाकर साथ ले गये।जनता का आदर और उत्साह देखकर ब्रितानिया हुकुमत ने शहीद स्थल के उस वृक्ष को काट डाला।स्वतन्त्रता के पश्चात् बाबा राघव दास ने उसी जगह पुनः वृक्षारोपण किया।वर्तमान में पार्क में चन्द्रशेखर आजाद का जो स्मारक बना है,वह श्रद्धेय पं0 बनारसी दास चतुर्वेदी पूर्व राज्य सभा सदस्य के अथक प्रयासों का परिणाम है।
यह स्मारक अशिक्षित,कुसंस्कार ग्रस्त,गरीबी में पड़ी हुई जनता का क्रान्ति के मार्ग पर उत्तरोतर बढ़ते जाने का स्मारक है,अदम्य साहस,व्यवहारिक सूझ-बूझ और साथियों के लिए हार्दिक स्नेह,त्याग और बलिदान के लिए सतत् तत्परता के द्वारा प्राप्त नेतृत्व का स्मारक है,और है साम्राज्यवाद के विरूद्ध आमरण दृढ़ निश्चयी युद्ध और समाजवाद की स्थापना के लिए निर्भयता से बढ़ते जाने का स्मारक।

Tuesday, February 15, 2011

मौसम

बाराबंकी मौसम के बदले रूख ने लोगो को गर्म कपडे फिर से पहने के लिए मजबूर कर दिया। फरवरी माह के लगते ही आसमान में चमकते हुए सूरज ने लोगो को गर्मी का अहसास कराया था। लेकिन आकाश में छायी बदली चलने वाली हवाओ ने मौसम में भारी परिवर्तन कर दिया। कुछ किसानो के चेहरो पर रौनक तो कुछ किसानो के चेहरो पर बदली को लेकर मायूसी देखी गई। किसानो का कहना है कि यदि बरसात होती है तो गेहूॅ,आलू जैसी फसलो को फायदा हो सकता है। वही दलहन व तिलहन को नुकसान हो सकता है। साथ ही साथ इस परिवर्तन शील मौसम में जो लोग लाहपरवाही करेगे। वो निश्चित रूप से बीमार हो सकते है। योभी अभी माध पूर्णिमा का स्नान शेष है। जब तक सारे महत्वपूर्ण स्नान नही हो जाते तब तक ठण्ड मे कमी के आसार नही है।

तहसील दिवस

बाराबंकी:- तहसील नवाबगंज में जिलाधिकारी विकास गोठलवाल की अध्यक्षता में आयोजित तहसील दिवस में कुल 128 प्रार्थनापत्र आये। मौके पर मात्र 3 प्रार्थनापत्रों का ही निस्तारण किया जा सका।

प्राप्त प्रार्थनापत्रों में सर्वाधिक राजस्व विभाग के 53, पुलिस विभाग के 25 आपूर्ति विभाग के 6 विकास विभाग के साथ विद्युत विभाग के 4 समस्त कल्याण विभाग के 9 चकंबन्दी विभाग के 2 विजली विभाग के 4 व अन्य 17 शामिल है। इस मौके पर मुख्य विकास अधिकारी अभय कुमार अपर पुलिस अधीक्षक श्री पर्णा गागुली, उप जिलाधिकारी अनिल सिह, तहसीलदार अरूण मिश्रा, उपस्थित थे।

Sunday, February 13, 2011

’एनुवल एजुकेशनल, एविसीवेशन कम कल्चरल एक्टीविटीज

बाराबंकी:- पायनियर माण्टेसरी इण्टर कालेज, में दो दिवेसीय ’’एनुवल एजुकेशनल, एविसीवेशन कम कल्चरल एक्टीविटीज’’ का शुभारम्भ अपर जिला सत्र न्यायधीश राजेन्द्र चन्द ने दीप प्रज्जवलित कर किया।

इस मौके पर उपस्थित वीरबल साहनी संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा0 सी0 एम0 नौटियाल ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों को समय-समय पर दोहराते रहना चाहिए क्योकि इससे छात्रो को करके सीखने का मौका मिलता है।

प्रदर्शनी में मैजिक बाक्स, इको-फ्रिज, हाइड्रेपानिक्स, कैथेड्रल चर्च, लंका दहन, श्रृष्ट, प्रलय, (कामायनी) भौमिक समय सारणी, रोबोट, आदि का प्रदर्शन किया गया। उधर सांस्कृतिक कायक्रमो में गुजराती गरबा नृत्य (धीमडो-धीमडों) आकर्षण का प्रमुख केन्द्र बना रहा। इन कार्यक्रमों के साथ-साथ फैंसी डेªस कम्पटीशन का भी आयोजन किया गया जिसमें प्रेप-गुप में अमन-प्रथम, शिवांगी द्वितीय तथा निष्ठा पटेल तृतीय स्थान पर रही। द्वितीय गुप में (कक्षा1,2) में प्रियंाशी बाजपेयी प्रियांशी तिवारी को प्रथम आस्था द्विवेदी को द्वितीय व शहरीस फातिमा को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। मुख्य अतिंिथ द्वारा इन छात्र-छात्रों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के (पूर्व होनहार) छात्र सत्येन्द्र कुमार को नव नियुक्त नायब तहसील दार सत्येन्द्र कुमार को सम्बोन्धित किया गया। इस कार्यक्रम में प्रमुख रूप से जिला विद्यालय निरीक्षक अरूण कुमार दुबें, विद्यालय प्रबन्धक पूरन सिंह, प्रधानाचार्य श्रीमती रेखा मिश्रा ने भी सभा को सम्बोधित किया। कार्यक्रम में डा0 बी0 के0 तिवारी, श्रीमती सोमप्रभा मिश्रा, जितेन्द्र कुमार गिरी (नगर कोतवाल) श्रीमती मंजू श्रीवास्तव उपस्थित थी कार्यक्रम का संचालन बी0एन0मिश्रा ने किया।