बसपा के मुकाबिल समाजवादी पार्टी का जनान्दोलन
अरविन्द विद्रोही
और आखिरकार मुलायम सिंह यादव ने उ0प्र0 में बसपा सरकार के खिलाफ पुनः संघर्ष की तारीख 17मार्च घोषित कर ही दी।समाजवादी पार्टी के द्वारा 7,8,9मार्च को छेड़ा गया जनान्दोलन समाप्त हो चुका है।समाजवादी पार्टी का जनान्दोलन उ0प्र0 की वर्तमान बहुजन समाज पार्टी की सरकार की नीतियों और कार्यों के विरोध में आयोजित हुआ।समाजवादी पार्टी के अनुसार यह जनान्दोलन सफल रहा जिसमें बसपा सरकार के खिलाफ समाजवादी पार्टी के लााखों कार्यकर्ता सड़क पर उतरे तथा जेल गये।दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी ने सपा के इस आन्दोलन को फलॉप शो तथा जनविरोधी बताया।पूरे प्रदेश में आन्दोलनकारी समाजवादी कार्यकर्ताओं को कानून व्यवस्था कायम रखने के उद्देश्य का हवाला देते हुए सरकार ने हिरासत में ले लिया।समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव की नजरबंदी का मामला देश के सर्वोच्च सदन संसद में भी उठाया गया।बहुजन समाज पार्टी के अनुसार 7,8,9मार्च को सरकार द्वारा किये गये प्रशासनिक इंतजामों,चप्पे-चप्पे पर तैनात पुलिस बल ने किसी भी उपद्रव,तोड़-फोड़,आगजनी जैसी घटनाओं के घटित होने व उससे आम जनता को होने वाले नुकसान,सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान से प्रदेश को बचाया।मुख्यमंत्री मायावती ने साफ तौर पर चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि कानून व्यवस्था को तोड़ना कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।लेकिन जनता के हितों की अनदेखी होने पर आवाज उठाना व सत्याग्रह करना कानून तोड़ना नही होता यह बात सबको समझना चाहिए।वहीं यह भी सत्य है कि जनान्दोलन के नाम पर तोड़-फोड़,आगजनी,अराजकता फैलाना अनुचित है।अब आने वाली 17तारीख को यही चुनौती पुनःसरकार व समाजवादी नेतृत्व के सामने रहेगी।जनान्दोलन जनता के हित के लिए आयोजित किया जाता है,आन्दोलन के दौरान एक ही घटना सम्पूर्ण सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य बदल सकती है इसका विशेष ध्यान आन्दोलनकारियों व सरकार दोनों को रखना चाहिए।अभी समाजवादी पार्टी के नेताओं के साथ पुलिस का अमानवीय व क्रूर चेहरा सामने आया है।पुलिस का जनविरोधी रवैया किसी से छुपा नही है लेकिन आम जन पर होने वाले अनवरत् अत्याचार पर राजनैतिक कार्यकर्ताओं की खामोशी ने,उस अत्याचार का,तात्कालिक अन्याय का प्रतिकार न करने का ही यह परिणाम है कि पुलिस का रवैया ब्रितानिया हुकूमत की दरिंदगी की याद ताजा करा गया।
डा0राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि सच को कैसे मजबूत बनाया जाये?मेरी समझ में यह केवल सत्याग्रह है।इसमें केवल एक और शब्द इस्तेमाल करता हूॅं-तर्क।लेकिन केवल तर्क कमजोर रह जाता है।केवल तर्क अच्छा भी हो और उसमें आप जीत भी जाओं तो जो शक्तिशाली है वह और अपने अणुबम,तलवार या पिस्तौल के बल पर तर्क को खत्म कर देता है।इसलिए तर्क को कोई एैसी ताकत मिलनी चाहिए जो पशुबल न हो,हिंसा न हो,लेकिन एक हिंसक के मुकाबले में उस तर्क को खड़ा कर सकें और वह वही ताकत है कि हम तुमको मारेंगें भी नहीं मगर तुम्हारी बात मानेंगें भी नहीं।यह था किसी जुल्मी,अत्याचारी,निरंकुश,तानाशाह व्यक्ति या व्यवस्था से संघर्ष करने का लोहिया का रास्ता।समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को समीक्षा करनी चाहिए कि क्या डा0लोहिया की इन बातों का व्यवहार में अमल हो रहा है?शासन सत्ता के खिलाफ सत्याग्रह में दमनात्मक कार्यवाही का एक नाजुक मोड़ आता है और यही मोड़ निर्णायक भी होता है।शासन की दमनात्मक कार्यवाही से झुक जाने से,भाग जाने से या उत्तेजित होकर शारीरिक प्रतिकार करने से शासन ही विजयी होता है अन्यथा जनता के हित के लिए लडने वालों के कदमों में विजय श्री होती है।बहरहाल आजाद भारत में भी आम जनों का दुर्भाग्य ही है कि जिन पुलिस बलों या सरकारी कर्मियों की तनख्वाह आम जनता के द्वारा दिये गये विभिन्न राजस्व करों से बने राजकीय कोष से निकलती है,वही वेतनभोगी पुलिस-प्रशासन के लोग आम जन को व उनके अधिकारों को बूटों तले रौंद रहे हैं।इस तरह के अमानवीय प्रवृत्ति के कर्मियों को अब कौन सजा देगा?
जो भी हो समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की अगुवाई में वर्तमान बसपा सरकार को चुनौती देने का काम सड़क पर उतर कर समाजवादी पार्टी के जुझारू कार्यकर्ताओं ने दिया।आन्दोलन अपने मकसद में सफल रहा,समाजवादी पार्टी का नेतृत्व यह मान कर चल रहा है।समाजवादी पार्टी के कई स्वनाम धन्य,गणेश परिक्रमा करने में सिद्धहस्त नेताओं ने जनान्दोलन में क्या भूमिका निभाई,किन-किन क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं व जनता को आन्दोलन की रूपरेखा बताई,इसकी गहन समीक्षा समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को स्वयं ही करनी चाहिए।मैने अपने पूर्व के लेखों में एक बात लिखा है और पुनःलिख रहा हूॅं कि संगठन में जिम्मेदारी व विधान सभा के टिकट वितरण में आन्दोलन के साथियों और संक्रमण काल में समाजवादी पार्टी में बने रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को ही तवज्जों देना चाहिए।उ0प्र0 में बसपा के मुकाबिल आज सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी ही लड़ती नजर आ रही है।बसपा सरकार से नाखुश मतदाताओं की पहली पसन्द समाजवादी पार्टी बन चुकी है,इस स्थिति को भांपते हुए जनप्रतिनिधि बनने के फेर में तमाम दलों के लोग समाजवादी पार्टी में शामिल हो चुके हैं,और बहुत अभी करेंगें।एैसे लोगों को चुनावों में प्रत्याशी बनाने से कोई भी सामाजिक-राजनैतिक फायदा समाजवादी पार्टी को नहीं होगा उल्टा नुकसान अवश्यंभावी है।इस विषय में भी दशकों पहले डा0लोहिया ने लिखा है कि-‘‘यह सही है कि सत्याग्रह में कई तरह की मिलावट रहेगी।न जाने उसमें कितनी जलन,कितनी ईर्ष्या और कितना द्वेष रहेगा,न जाने कितने ही लोग उसे गद्दी हासिल करने के लिए करेंगे,न जाने कितने ही लोग उसे विधान सभा और लोक सभा की मेम्बरी हासिल करने के लिए करेंगे।‘‘समाजवादी नेतृत्व को इस बात का ध्यान रखना होगा कि जब पुराना संघर्ष का वफादार साथी सालों-साल से साथ निभा रहा है तो उसकी जगह मात्र स्वार्थ सिद्धि करने के फेर में लगे जनाधार विहीन,दलबदलू,पूॅजीवादी सोच के मगरूर लोग जिनका आम गा्रमीण जनता से कोई सरोकार नहीं को महत्व देना अपने संघर्षशील कार्यकर्ता के साथ विश्वासघात सरीखा होगा।अब गॉंव-गॉंव में 17मार्च के संघर्ष की अलख जलाने के लिए समाजवादी संघर्षशील-जुझारू कार्यकर्ताओं को घर से निकल जाना चाहिए।
Sunday, March 13, 2011
Friday, March 11, 2011
सेवानिवृत होते बिहार के युवा
सेवानिवृत होते बिहार के युवा
नितेन्द्र विक्रम कौशिक
पिछले कुछ सालों से हमारे बिहार में हस्यास्पद एवं दुखद स्थिति बनी हुयी है ! अभी जो यहाँ की स्थिति बनी हुयी है उसके हिसाब से मेरे पिताजी के लिए नौकरियों की भरमार हैं लेकिन मेरे लिए नहीं है ! आज की स्थिति ऐसी बनी हुयी है की , एक व्यक्ति जिसका नाम राकेश कुमार है ,जिसकी उम्र ४३ साल है , उसके पिताजी का नाम श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह है, जिनकी उम्र ६४ साल है ! एक दिन राकेश अपने पिताजी को उनके कार्यालय छोड़ने जा रहा था ! कार्यालय जाने के क्रम में उसका दोस्त मिल गया , जिसका नाम जीतेन्द्र था ! मिलने पे दोनों को बहुत ख़ुशी हुयी ,एक दुसरे हाल चाल लेने लगे ! फिर अचानक जीतेन्द्र ने राकेश से पूछा की , तुम्हारी नौकरी कब लगी और कितने साल नौकरी बची हुयी है ? उस समय वहां पे खड़े हुए लोगों के लिए हस्यास्पद स्थिति बन गयी और राकेश के लिए दुखद स्थिति ! फिर उसने अपने दोस्त से बोला की दोस्त मैं नौकरी नहीं करता हूँ , मैं अपने पिताजी को कार्यालय छोड़ने जा रहा हूँ ! उस समय राकेश के चेहरे का जो भाव था वो बहुत ही दुःख और पीड़ा से भरा हुआ था , मानो की वो थोड़ी देर में ही ख़ुदकुशी कर बैठेगा ! फिर वो किसी तरह अपने आप को सँभालते हुए मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया !
आज बिहार में अधिकतर युवाओं की कमोबेश यही स्थिति बनी हुयी है ! आज की तारीख में बिहार में जितनी भी नौकरियां आ रही हैं , उसके लिए जो - जो पात्रता चाहिए उसमे सेवानिवृत प्रमुख रूप से है या फिर उसी विभाग के अधिकारयों एवं कर्मचारियों की उम्र सीमा बढ़ा दी जा रही है , जिसके कारण बिहार के युवा सेवानिवृत होने पे मजबूर हो रहे हैं ! आज जिसे देखो वो विकास की बात कर रहा है , चाहे वो केंद्र सरकार हो या फिर राज्य सरकार ! दोनों अपने अपने दावे कर रहे हैं ! हम २०२० तक भारत को विकसित देश बना के छोड़ेंगे , तो राज्य सरकार का कहना है की २०१५ तक बिहार को विकसित राज्य की श्रेणी में खड़ा कर के ही रहेंगे ! लेकिन मुझे सरकार का कोई ऐसा काम दिखाई नहीं देता है जिससे ये परिलक्षित हो की वो हकीकत में भारत और बिहार का विकास चाहते हों ! क्योंकि युवा के बगैर विकास की बात करना बेईमानी है और मुर्खतापूर्ण है ! अगर आपको भारत और बिहार को विकसित बनाना है तो नए चेहरे , नई सोंच , नई तरीके और नए जोश को मौका देना होगा और अपने कार्यालयों में भागीदारी देनी होगी ! तभी जाकर विकसित भारत और विकसित बिहार की परिकल्पना को पूरा कर पाएंगे !
लेकिन ऐसा भी नहीं है की केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने कुछ नहीं किया है , उनके द्वारा बहुत सारी ऐसी योजनायें चलायीं गयी है जिससे युवा स्वाबलंबी बन सकें ! लेकिन वो भी कुछ विशेष समुदाय के लिए चलाया गया है जिससे उनके वोट बैंक में इजाफा हो सके ! क्योंकि उनलोगों को तकनिकी विषयों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है या दिया जाना है ! और उसकी जो समय सीमा तय की गयी है वो उन विषयों के लिए काफी नहीं है , उनके लिए जो नौकरी की व्यवस्था की जा रही है वो किसी भी मायने में न्यायोचित नहीं है ! यों कहें की उनके हाँथ में एक लड्डू थमा दिया गया है, एक खिलौना दे दिया गया है की खेलते रहो और अपनी जुवान को बंद रखो ! लेकिन हकीकत में उनलोगों के साथ ये लोग खेल रहे हैं !
आखिर में मैं एक सवाल पूछना कहता हूँ की इसके लिए जिम्मेदार कौन है सरकार या फिर हमलोग ? मेरा जवाब होगा की इन सबों के जिम्मेदार हमलोग खुद हैं ! क्योंकि हमलोग अपनी आवाज दवाए हुए हैं ! जिस दिन हमलोग अपने हक के लिए अपने आवाज को बुलंद करना सुरु कर देंगे उस दिन से सरकारें हमारी बातों की सुनने लगेगी ! सिर्फ सुनेगी ही नहीं बल्कि हमारी बातों को मानने भी लगेंगी ! हम युवाओं को आगे आकर अपनी आवाज को उठाना चाहिए ! हमलोग उनलोगों को इतना मजबूर कर दें की उनलोग खुद चलकर हमारे पास आ कर ये कहें की हमलोग आपलोगों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं ! हमलोग इन्टरनेट के जरिए शोशल साईट पे अपने मित्रों की बातों पे वक्तव्य देने में व्यस्त रहते हैं , हम एक दुसरे की बातों को काटने में लगे हुए रहते हैं , हम एक दुसरे को घेरने में लगे हुए रहते हैं ! इस से क्या फायदा होगा ? क्यों न हमलोग एक दुसरे के माध्यम से जानकारी प्राप्त करें , एक दुसरे के सहयोग से लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया करवाएं ! क्यों न हम अपने ज्ञान और अनुभव को अपने समाज के बिच जाकर बाटें! जिससे हमारे जैसे आने वाली युवा पीढ़ी को वो सब न झेलना पड़े जो हमलोगों ने झेला है या झेल रहे हैं ! आइये हमलोग आज संकल्प लें की हम अपने समाज के प्रति जो हमारी जवाबदेही है उसका ईमानदारी निर्वहन करेंगे और लोगों ( सरकार ) को इतना मजबूर कर देंगे की वो खुद हमारे पास आकर भारत और बिहार के विकास में हमलोगों को भागीदार बनायें
नितेन्द्र विक्रम कौशिक
पिछले कुछ सालों से हमारे बिहार में हस्यास्पद एवं दुखद स्थिति बनी हुयी है ! अभी जो यहाँ की स्थिति बनी हुयी है उसके हिसाब से मेरे पिताजी के लिए नौकरियों की भरमार हैं लेकिन मेरे लिए नहीं है ! आज की स्थिति ऐसी बनी हुयी है की , एक व्यक्ति जिसका नाम राकेश कुमार है ,जिसकी उम्र ४३ साल है , उसके पिताजी का नाम श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह है, जिनकी उम्र ६४ साल है ! एक दिन राकेश अपने पिताजी को उनके कार्यालय छोड़ने जा रहा था ! कार्यालय जाने के क्रम में उसका दोस्त मिल गया , जिसका नाम जीतेन्द्र था ! मिलने पे दोनों को बहुत ख़ुशी हुयी ,एक दुसरे हाल चाल लेने लगे ! फिर अचानक जीतेन्द्र ने राकेश से पूछा की , तुम्हारी नौकरी कब लगी और कितने साल नौकरी बची हुयी है ? उस समय वहां पे खड़े हुए लोगों के लिए हस्यास्पद स्थिति बन गयी और राकेश के लिए दुखद स्थिति ! फिर उसने अपने दोस्त से बोला की दोस्त मैं नौकरी नहीं करता हूँ , मैं अपने पिताजी को कार्यालय छोड़ने जा रहा हूँ ! उस समय राकेश के चेहरे का जो भाव था वो बहुत ही दुःख और पीड़ा से भरा हुआ था , मानो की वो थोड़ी देर में ही ख़ुदकुशी कर बैठेगा ! फिर वो किसी तरह अपने आप को सँभालते हुए मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया !
आज बिहार में अधिकतर युवाओं की कमोबेश यही स्थिति बनी हुयी है ! आज की तारीख में बिहार में जितनी भी नौकरियां आ रही हैं , उसके लिए जो - जो पात्रता चाहिए उसमे सेवानिवृत प्रमुख रूप से है या फिर उसी विभाग के अधिकारयों एवं कर्मचारियों की उम्र सीमा बढ़ा दी जा रही है , जिसके कारण बिहार के युवा सेवानिवृत होने पे मजबूर हो रहे हैं ! आज जिसे देखो वो विकास की बात कर रहा है , चाहे वो केंद्र सरकार हो या फिर राज्य सरकार ! दोनों अपने अपने दावे कर रहे हैं ! हम २०२० तक भारत को विकसित देश बना के छोड़ेंगे , तो राज्य सरकार का कहना है की २०१५ तक बिहार को विकसित राज्य की श्रेणी में खड़ा कर के ही रहेंगे ! लेकिन मुझे सरकार का कोई ऐसा काम दिखाई नहीं देता है जिससे ये परिलक्षित हो की वो हकीकत में भारत और बिहार का विकास चाहते हों ! क्योंकि युवा के बगैर विकास की बात करना बेईमानी है और मुर्खतापूर्ण है ! अगर आपको भारत और बिहार को विकसित बनाना है तो नए चेहरे , नई सोंच , नई तरीके और नए जोश को मौका देना होगा और अपने कार्यालयों में भागीदारी देनी होगी ! तभी जाकर विकसित भारत और विकसित बिहार की परिकल्पना को पूरा कर पाएंगे !
लेकिन ऐसा भी नहीं है की केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने कुछ नहीं किया है , उनके द्वारा बहुत सारी ऐसी योजनायें चलायीं गयी है जिससे युवा स्वाबलंबी बन सकें ! लेकिन वो भी कुछ विशेष समुदाय के लिए चलाया गया है जिससे उनके वोट बैंक में इजाफा हो सके ! क्योंकि उनलोगों को तकनिकी विषयों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है या दिया जाना है ! और उसकी जो समय सीमा तय की गयी है वो उन विषयों के लिए काफी नहीं है , उनके लिए जो नौकरी की व्यवस्था की जा रही है वो किसी भी मायने में न्यायोचित नहीं है ! यों कहें की उनके हाँथ में एक लड्डू थमा दिया गया है, एक खिलौना दे दिया गया है की खेलते रहो और अपनी जुवान को बंद रखो ! लेकिन हकीकत में उनलोगों के साथ ये लोग खेल रहे हैं !
आखिर में मैं एक सवाल पूछना कहता हूँ की इसके लिए जिम्मेदार कौन है सरकार या फिर हमलोग ? मेरा जवाब होगा की इन सबों के जिम्मेदार हमलोग खुद हैं ! क्योंकि हमलोग अपनी आवाज दवाए हुए हैं ! जिस दिन हमलोग अपने हक के लिए अपने आवाज को बुलंद करना सुरु कर देंगे उस दिन से सरकारें हमारी बातों की सुनने लगेगी ! सिर्फ सुनेगी ही नहीं बल्कि हमारी बातों को मानने भी लगेंगी ! हम युवाओं को आगे आकर अपनी आवाज को उठाना चाहिए ! हमलोग उनलोगों को इतना मजबूर कर दें की उनलोग खुद चलकर हमारे पास आ कर ये कहें की हमलोग आपलोगों के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं ! हमलोग इन्टरनेट के जरिए शोशल साईट पे अपने मित्रों की बातों पे वक्तव्य देने में व्यस्त रहते हैं , हम एक दुसरे की बातों को काटने में लगे हुए रहते हैं , हम एक दुसरे को घेरने में लगे हुए रहते हैं ! इस से क्या फायदा होगा ? क्यों न हमलोग एक दुसरे के माध्यम से जानकारी प्राप्त करें , एक दुसरे के सहयोग से लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया करवाएं ! क्यों न हम अपने ज्ञान और अनुभव को अपने समाज के बिच जाकर बाटें! जिससे हमारे जैसे आने वाली युवा पीढ़ी को वो सब न झेलना पड़े जो हमलोगों ने झेला है या झेल रहे हैं ! आइये हमलोग आज संकल्प लें की हम अपने समाज के प्रति जो हमारी जवाबदेही है उसका ईमानदारी निर्वहन करेंगे और लोगों ( सरकार ) को इतना मजबूर कर देंगे की वो खुद हमारे पास आकर भारत और बिहार के विकास में हमलोगों को भागीदार बनायें
Monday, March 7, 2011
समाजवादी जनांदोलन
जब की पूरी समाजवादी पार्टी के लोग जनांदोलन के लिए कमर कस के जानता से संपर्क कर के सड़क पे उतरने की तैयारी में है समाजवादी पार्टी के ही एक नेता शिवपाल यादव जनाधारविहीन और पार्टी छोड़ के गए और फिर नवाबगंज-बाराबंकी से विधानसभा टिकेट के लिए वापस आये विकास यादव के विद्यालय के कार्यक्रम सम्मान समारोह में जाके बाराबंकी जनपद में समाजवादी जन आन्दोलन और पार्टी में गुटबाजी को बढ़ावा दे गए...संघर्ष के साथिओं की जगह दलबदलूं और पूंचिपतियो को तवज्जो देना बहुत महंगा पड़ेगा इसका ध्यान समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह को रखना पड़ेगा...यह सत्य है की जनता परिवर्तन चाहती है लेकिन जनता गलत लोगो,अपराधियो, पूंचिपतियो,जनाधारविहीन, दलबदलूं,मगरूर प्रवृत के लोगो की जगह सामाजिक लोगो को ही चुनेगी फिर चाहे वो किसी भी पार्टी का हो...समाजवादी संघर्ष के कार्यकर्ताओ की उपेक्षा करने से समाजवादी पार्टी सरकार नहीं बना पायेगी इस बात का ध्यान कौन रखेगा???????
Sunday, March 6, 2011
वर्तमान भारतीय परिवेश में महिलाओं का जीवन
वर्तमान भारतीय परिवेश में महिलाओं का जीवन
अरविन्द विद्रोही
भाारतीय सभ्यता और संस्कृति में मातृ शक्ति अर्थात महिला वर्ग का स्थान सदैव सर्वोपरि माना गया है।इस देवभूमि में समस्त आराधना पद्धतियों में नारी शक्ति का पूजन किया जाता है।नारी के बगैर पुरूष के द्वारा की गई ईश आराधना अधूरी ही होती है।सृष्टि के दो अनिवार्य व पूरक अंग के रूप में महिला व पुरूष ही हैं,इस शाश्वत सत्य को कौन नकार सकता है?क्या कोई स्त्री-पुरूष के सहअस्तित्व को नकार सकता है?अधिकारों की बात करें तो भारतीय सभ्यता-संस्कृति व पारिवारिक मूल्य तो परिवार ही नही वरन् समाज के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो नर हो या नारी,बालक हो या वृद्ध सभी के संरक्षण व अधिकारों की बेमिसाल धरोहर है।भारतीय समाज सदैव सहिष्णु व मानवता वादी सोच का रहा है।मुगलों तथा ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की लडाई में महिला शक्ति किसी भी नजरिए से पुरूषों से पीछे नहीं रही हैं।वास्तविकता तो यह है कि वीर पुरूषों की जननी मातृशक्ति ही वीरोचित कर्म व धर्म की प्रेरक रही हैं।
अतीत की गौरव-शाली,बलिदानी,त्यागमयी गाथायें समेटे भारत-भूमि में आज पारिवारिक मूल्य व आपसी विश्वास दम तोड चुका है।जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूॅजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।
पूॅजीवाद के प्रभाव में भारत में भी महिलाओं को एक उत्पाद के रूप में,एक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुतिकरण का नतीजा है कि आज अर्धनग्नता फिल्मी परदों से निकल कर महानगरों से गुजरती हुई शहरों-कस्बों में पांव पसार चुकी है।परिवारों में आपसी सामंजस्य की कमी,विलासिता व उपभोगवादी संस्कृति के प्रति आर्कषण तथा अन्धानुकरण ने युवा वर्ग को गर्त में धकेलने का काम किया है।फिल्म,टेलीविजन,पत्र-पत्रिकायें यहां तक कि विद्यार्थियों की पाठ्य व लेखन पुस्तिका के आवरण पृष्ठ भी अश्लील,अर्धनग्न,कामुक,नायक-नायिकाओं,खिलाडियों,कार्टून चरित्रों से परिपूर्ण हैं।जिनका शिक्षा जगत से,नैतिकता से कोई लेना-देना नही है उनका दर्शन प्रतिक्षण करने को विद्यार्थियों को अनवरत् प्रेरित किया जा रहा है।दरअसल वर्तमान दौर में आधुनिकता व अधिकारों के नाम पर स्वच्छंदता व भौण्डेपन को अपनाया जा रहा है।आज भी भारत की बहुसंख्यक ग्राम्य आधारित जीवन जीने वाली मेहनतकश आम जनता अपने मनोरंजन के लिए तो इन तडक-भडक वाली जीवन शैली युक्त फिल्मों को देखता है परन्तु निजी तौर पर उस शैली को,उस जीवन पद्धति को अपनाने का विचार भी उसके जेहन में नही आता है।भारत में पारिवारिक विखण्डन व नैतिक अवमूल्यन के पश्चात् भी अभी सामाजिक-धार्मिक ताने बाने के कारण,लोक-लाज के कारण छोटे शहरों,कस्बों व ग्रामीण अंचलों में महिलायें कामकाज पर,नौकरी पर निकल तो रही हैं परन्तु महानगरों सी स्वछंदता यहां देखने को नही मिलती है।
कृषि आधारित भारतीय परिवारों का जीवन सरल व सुव्यवस्थित था।इसमें परिवार के सभी सदस्यों के काम बंटे होते थे और हित-अधिकार सुरक्षित।आज के आर्थिक युग में नौकरी कर रहीं महिलायें आर्थिक कमाई तो निश्चित रूप से कर ले रही हैं परन्तु शारीरिक,मानसिक व भावनात्मक रूप से कमजोर होती जा रही हैं।अपनी नौकरी के,व्यवसाय के दायित्वों का निर्वाहन के साथ-साथ पत्नी धर्म का पालन,संतानों की परवरिश,सास-श्वसुर की देखभाल के साथ-साथ मायके में वृद्ध मॉं-बाप के स्वास्थ्य की चिन्ता कामकाजी महिलाओं को हलकान कर देती हैं।आज महिला वर्ग नौकरी पाने पर अत्यधिक प्रसन्नता की अनुभूति करती हैं।दरअसल अब महिला वर्ग का दोहरा शोषण हो रहा है।रिश्तों को,परिवार को सहेजने के साथ-साथ महिला को परिवार के लिए धर्नाजन के लिए श्रम करना क्या महिला सशक्तिकरण है?यह बात उन महिलाओं पर कदापि लागू नही होती है जो परिवार व रिश्तों से ज्यादा अहमियत दूसरी बातों को देती हैं।मेरा यह विचार सिर्फ उन महिलाओं की आंतरिक पीडा पर है जो पारिवारिक सुख व सम्पन्नता को प्राथमिकता पर रखते हुए जीवन जी रही हैं और अपनी कमाई परिवार पर ही खर्च करती हैं।
अरविन्द विद्रोही
भाारतीय सभ्यता और संस्कृति में मातृ शक्ति अर्थात महिला वर्ग का स्थान सदैव सर्वोपरि माना गया है।इस देवभूमि में समस्त आराधना पद्धतियों में नारी शक्ति का पूजन किया जाता है।नारी के बगैर पुरूष के द्वारा की गई ईश आराधना अधूरी ही होती है।सृष्टि के दो अनिवार्य व पूरक अंग के रूप में महिला व पुरूष ही हैं,इस शाश्वत सत्य को कौन नकार सकता है?क्या कोई स्त्री-पुरूष के सहअस्तित्व को नकार सकता है?अधिकारों की बात करें तो भारतीय सभ्यता-संस्कृति व पारिवारिक मूल्य तो परिवार ही नही वरन् समाज के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो नर हो या नारी,बालक हो या वृद्ध सभी के संरक्षण व अधिकारों की बेमिसाल धरोहर है।भारतीय समाज सदैव सहिष्णु व मानवता वादी सोच का रहा है।मुगलों तथा ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की लडाई में महिला शक्ति किसी भी नजरिए से पुरूषों से पीछे नहीं रही हैं।वास्तविकता तो यह है कि वीर पुरूषों की जननी मातृशक्ति ही वीरोचित कर्म व धर्म की प्रेरक रही हैं।
अतीत की गौरव-शाली,बलिदानी,त्यागमयी गाथायें समेटे भारत-भूमि में आज पारिवारिक मूल्य व आपसी विश्वास दम तोड चुका है।जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूॅजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।
पूॅजीवाद के प्रभाव में भारत में भी महिलाओं को एक उत्पाद के रूप में,एक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुतिकरण का नतीजा है कि आज अर्धनग्नता फिल्मी परदों से निकल कर महानगरों से गुजरती हुई शहरों-कस्बों में पांव पसार चुकी है।परिवारों में आपसी सामंजस्य की कमी,विलासिता व उपभोगवादी संस्कृति के प्रति आर्कषण तथा अन्धानुकरण ने युवा वर्ग को गर्त में धकेलने का काम किया है।फिल्म,टेलीविजन,पत्र-पत्रिकायें यहां तक कि विद्यार्थियों की पाठ्य व लेखन पुस्तिका के आवरण पृष्ठ भी अश्लील,अर्धनग्न,कामुक,नायक-नायिकाओं,खिलाडियों,कार्टून चरित्रों से परिपूर्ण हैं।जिनका शिक्षा जगत से,नैतिकता से कोई लेना-देना नही है उनका दर्शन प्रतिक्षण करने को विद्यार्थियों को अनवरत् प्रेरित किया जा रहा है।दरअसल वर्तमान दौर में आधुनिकता व अधिकारों के नाम पर स्वच्छंदता व भौण्डेपन को अपनाया जा रहा है।आज भी भारत की बहुसंख्यक ग्राम्य आधारित जीवन जीने वाली मेहनतकश आम जनता अपने मनोरंजन के लिए तो इन तडक-भडक वाली जीवन शैली युक्त फिल्मों को देखता है परन्तु निजी तौर पर उस शैली को,उस जीवन पद्धति को अपनाने का विचार भी उसके जेहन में नही आता है।भारत में पारिवारिक विखण्डन व नैतिक अवमूल्यन के पश्चात् भी अभी सामाजिक-धार्मिक ताने बाने के कारण,लोक-लाज के कारण छोटे शहरों,कस्बों व ग्रामीण अंचलों में महिलायें कामकाज पर,नौकरी पर निकल तो रही हैं परन्तु महानगरों सी स्वछंदता यहां देखने को नही मिलती है।
कृषि आधारित भारतीय परिवारों का जीवन सरल व सुव्यवस्थित था।इसमें परिवार के सभी सदस्यों के काम बंटे होते थे और हित-अधिकार सुरक्षित।आज के आर्थिक युग में नौकरी कर रहीं महिलायें आर्थिक कमाई तो निश्चित रूप से कर ले रही हैं परन्तु शारीरिक,मानसिक व भावनात्मक रूप से कमजोर होती जा रही हैं।अपनी नौकरी के,व्यवसाय के दायित्वों का निर्वाहन के साथ-साथ पत्नी धर्म का पालन,संतानों की परवरिश,सास-श्वसुर की देखभाल के साथ-साथ मायके में वृद्ध मॉं-बाप के स्वास्थ्य की चिन्ता कामकाजी महिलाओं को हलकान कर देती हैं।आज महिला वर्ग नौकरी पाने पर अत्यधिक प्रसन्नता की अनुभूति करती हैं।दरअसल अब महिला वर्ग का दोहरा शोषण हो रहा है।रिश्तों को,परिवार को सहेजने के साथ-साथ महिला को परिवार के लिए धर्नाजन के लिए श्रम करना क्या महिला सशक्तिकरण है?यह बात उन महिलाओं पर कदापि लागू नही होती है जो परिवार व रिश्तों से ज्यादा अहमियत दूसरी बातों को देती हैं।मेरा यह विचार सिर्फ उन महिलाओं की आंतरिक पीडा पर है जो पारिवारिक सुख व सम्पन्नता को प्राथमिकता पर रखते हुए जीवन जी रही हैं और अपनी कमाई परिवार पर ही खर्च करती हैं।
सोच बदलिए
प्रतिभा वाजपेयी
सोच बदलिए
सकारात्मक खबर न देने के लिए अक्सर मीडिया पर इल्जाम लगाए जाते हैं, लेकिन मुझे यह कहते हुए थोड़ी तकलीफ जरूर हो रही है पर सच यही है कि फेसबुक की स्थिति इससे कुछ बेहतर नहीं है। देश की वर्तमान हालात उसे विचलित करती हैं परंतु देश का भविष्य हमारे बच्चे उसकी प्राथमिकता में नहीं आते। मी सिंधुताई सपकाल सिखते समय मुझे लगा था कि फेसबुक में जो हमारे हजारो-हजार मित्र हैं उनके हाथ उनकी सहायता के लिए आगे आएंगे। मित्र चंदन आर्यन को छोड़कर किसी ने भी इस विषय में अपनी उत्सुकता तक व्यक्त नहीं की। निश्चित रूप से निराशा हुई। यह निराशा उस समय और बढ़ गई जब अरुंधती राय की नग्न पेंटिग को लेकर एक जगह नहीं कई जगह प्रतिक्रियाओं का सैलाब देखा। कुछ ने तो इसे तुरंत नेट पर डालने का भी आग्रह किया हुआ था। किसी महिला के नग्न चित्र को देखने के लिए इतनी उत्सुकता किस मानसिकता का द्योतक है। अगर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जा रहा है...तो हुसैन का इतना विरोध क्यों किया गया क्योंकि जो चित्र उन्होंने बनाएं थे वे भी तो मूल रूप से स्त्रियों के ही थे....
इसे पुरुषों की विकृत मानसिकता कहें या उनका दोगलापन जो एक तरफ दुर्गा, सरस्वती को पूजते हैं दूसरी तरफ महिलाओं के नग्न चित्र सार्वजनिक करने को उतावले रहते है।
अगर कोई महिला अपनी इच्छा से ऐसे चित्र बनवाती है तो उसकी मर्जी। परंतु यदि वह ऐसे चित्र का समाजिक प्रदर्शन करती है तो किसी को भी उस चित्र के प्रति अपनी राय देने का हक बनता था पर यहां तो यह भी स्पष्ट नहीं है अरुंधती ने यह चित्र स्वयं बनवाया या यह उस चित्रकार के दिमाग का खुराफात है।
अरुंधती एक अच्छी लेखिका है। उनके अपने सामाजिक सरोकार भी हैं। उनके विचारों से सहमत या असहमत होने का समाज के हर व्यक्ति को अधिकार है। पर इस तरह का सोच निंदनीय है।
-प्रतिभा वाजपेयी.
सकारात्मक खबर न देने के लिए अक्सर मीडिया पर इल्जाम लगाए जाते हैं, लेकिन मुझे यह कहते हुए थोड़ी तकलीफ जरूर हो रही है पर सच यही है कि फेसबुक की स्थिति इससे कुछ बेहतर नहीं है। देश की वर्तमान हालात उसे विचलित करती हैं परंतु देश का भविष्य हमारे बच्चे उसकी प्राथमिकता में नहीं आते। मी सिंधुताई सपकाल सिखते समय मुझे लगा था कि फेसबुक में जो हमारे हजारो-हजार मित्र हैं उनके हाथ उनकी सहायता के लिए आगे आएंगे। मित्र चंदन आर्यन को छोड़कर किसी ने भी इस विषय में अपनी उत्सुकता तक व्यक्त नहीं की। निश्चित रूप से निराशा हुई। यह निराशा उस समय और बढ़ गई जब अरुंधती राय की नग्न पेंटिग को लेकर एक जगह नहीं कई जगह प्रतिक्रियाओं का सैलाब देखा। कुछ ने तो इसे तुरंत नेट पर डालने का भी आग्रह किया हुआ था। किसी महिला के नग्न चित्र को देखने के लिए इतनी उत्सुकता किस मानसिकता का द्योतक है। अगर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जा रहा है...तो हुसैन का इतना विरोध क्यों किया गया क्योंकि जो चित्र उन्होंने बनाएं थे वे भी तो मूल रूप से स्त्रियों के ही थे....
इसे पुरुषों की विकृत मानसिकता कहें या उनका दोगलापन जो एक तरफ दुर्गा, सरस्वती को पूजते हैं दूसरी तरफ महिलाओं के नग्न चित्र सार्वजनिक करने को उतावले रहते है।
अगर कोई महिला अपनी इच्छा से ऐसे चित्र बनवाती है तो उसकी मर्जी। परंतु यदि वह ऐसे चित्र का समाजिक प्रदर्शन करती है तो किसी को भी उस चित्र के प्रति अपनी राय देने का हक बनता था पर यहां तो यह भी स्पष्ट नहीं है अरुंधती ने यह चित्र स्वयं बनवाया या यह उस चित्रकार के दिमाग का खुराफात है।
अरुंधती एक अच्छी लेखिका है। उनके अपने सामाजिक सरोकार भी हैं। उनके विचारों से सहमत या असहमत होने का समाज के हर व्यक्ति को अधिकार है। पर इस तरह का सोच निंदनीय है।
-प्रतिभा वाजपेयी.
मुख्यमंत्री जी .........फिर कब आओगी???
मुख्यमंत्री जी .........फिर कब आओगी???
अरविन्द विद्रोही
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती का निरीक्षण कार्यक्रम बाराबंकी जनपद में 12फरवरी,दिन शनिवार को निर्धारित था।अपने निर्धारित कार्यक्रम के एक दिन पूर्व 11फरवरी,दिन शुक्रवार को ही बाराबंकी जनपद में मुख्यमंत्री महोदया का आगमन हो गया।जिलाधिकारी विकास गोठलवाल रात-दिन एक करके विभागवार व क्षेत्रवार समीक्षा व भ्रमण करके मुख्यमंत्री के निरीक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे रहे।यूॅं भी जनपद बाराबंकी में अपनी तैनाती के प्रारम्भ में ही भ्रष्ट व गैर जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों को कुछ हद तक प्रशासनिक नियंत्रण में कर चुके जिलाधिकारी विकास गोठलवाल निरन्तर समीक्षा बैठक करते ही रहते हैं।प्रशासनिक दृष्टिकोण से मुख्यमंत्री का जनपद बाराबंकी का भ्रमण कार्यक्रम सफल ही माना जायेगा क्योंकि किसी भी स्तर के अधिकारी को न तो निलम्बित किया गया और न ही स्थानान्तरित।लेकिन क्या विकास के तय मापदण्डों,शासनादेशों के अनुपालन तथा सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की अवधारणा पर जनपद बाराबंकी में कार्य हो रहा है?यह विचारणीय प्रश्न है।
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती के जनपद आगमन पर संभावित निरीक्षण स्थलों,सम्पर्क मार्गों की साफ-सफाई युद्ध स्तर पर की गई।विकास भवन मार्ग तक की सफाई विगत् 13वर्षों में पहली बार इतने कायदे से प्रशासन द्वारा कराई गई।मुख्यमंत्री के बाराबंकी आगमन कार्यक्रम निर्धारित होने के पश्चात् सुनियोजित तरीके से सब कुछ दुरूस्त है का एक माहौल बनाया गया।मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान प्रशासन ने जगह-जगह बैरियर लगाकर आम जनता को सडक पर बेवजह घण्टों खडा करके एक जनविरोधी कृत्य किया है।प्रशासन के इस रास्ता रोको अभियान से परेशान नागरिक आक्रोशित हुए।अपनी कमियां न उजागर हो पाये,कोई नागरिक मुख्यमंत्री से किसी बात की शिकायत रूबरू होकर न कह पाये,इस मकसद में निःसन्देह प्रशासनिक अमला सफल रहा लेकिन उसकी प्रशासनिक मनमानी से कितना जनाक्रोश मुख्यमंत्री के खिलाफ पनपा है,इसका आकलन नौकरशाहों को करने की न तो आवश्यकता है और न ही फुर्सत।
मुख्यमंत्री मायावती के बाराबंकी आगमन पर प्रमुख स्थानों व मार्गों की सफाई हुई थी।मुख्यमंत्री को अब औचक निरीक्षण रात में करना चाहिए।जनपद बाराबंकी में शिक्षा-स्वास्थ्य व ग्राम्य विकास विभाग में भ्रष्टाचार व शासनादेशों के उल्लंघन को लेकर विभिन्न संगठन कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं।ठोस प्रशासनिक कार्यवाही न होने से इन विभागों के भ्रष्ट,नाकारा कर्मियों की चॉंदी है।आप दोबारा बाराबंकी कब आओगी यह सवाल जेहन में कौंधता है।अब आप जब भी आओगी हम तो घर से निकलेंगे ही नही।एक फायदा हो जायेगा कि फिर से साफ-सफाई हो जायेगी।इस बार आप जब आओ तो यहां कि प्रशासनिक गंदगी को साफ करके जाओ तो आम जनता का कुछ भला हो।
अरविन्द विद्रोही
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती का निरीक्षण कार्यक्रम बाराबंकी जनपद में 12फरवरी,दिन शनिवार को निर्धारित था।अपने निर्धारित कार्यक्रम के एक दिन पूर्व 11फरवरी,दिन शुक्रवार को ही बाराबंकी जनपद में मुख्यमंत्री महोदया का आगमन हो गया।जिलाधिकारी विकास गोठलवाल रात-दिन एक करके विभागवार व क्षेत्रवार समीक्षा व भ्रमण करके मुख्यमंत्री के निरीक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे रहे।यूॅं भी जनपद बाराबंकी में अपनी तैनाती के प्रारम्भ में ही भ्रष्ट व गैर जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों को कुछ हद तक प्रशासनिक नियंत्रण में कर चुके जिलाधिकारी विकास गोठलवाल निरन्तर समीक्षा बैठक करते ही रहते हैं।प्रशासनिक दृष्टिकोण से मुख्यमंत्री का जनपद बाराबंकी का भ्रमण कार्यक्रम सफल ही माना जायेगा क्योंकि किसी भी स्तर के अधिकारी को न तो निलम्बित किया गया और न ही स्थानान्तरित।लेकिन क्या विकास के तय मापदण्डों,शासनादेशों के अनुपालन तथा सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की अवधारणा पर जनपद बाराबंकी में कार्य हो रहा है?यह विचारणीय प्रश्न है।
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री मायावती के जनपद आगमन पर संभावित निरीक्षण स्थलों,सम्पर्क मार्गों की साफ-सफाई युद्ध स्तर पर की गई।विकास भवन मार्ग तक की सफाई विगत् 13वर्षों में पहली बार इतने कायदे से प्रशासन द्वारा कराई गई।मुख्यमंत्री के बाराबंकी आगमन कार्यक्रम निर्धारित होने के पश्चात् सुनियोजित तरीके से सब कुछ दुरूस्त है का एक माहौल बनाया गया।मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान प्रशासन ने जगह-जगह बैरियर लगाकर आम जनता को सडक पर बेवजह घण्टों खडा करके एक जनविरोधी कृत्य किया है।प्रशासन के इस रास्ता रोको अभियान से परेशान नागरिक आक्रोशित हुए।अपनी कमियां न उजागर हो पाये,कोई नागरिक मुख्यमंत्री से किसी बात की शिकायत रूबरू होकर न कह पाये,इस मकसद में निःसन्देह प्रशासनिक अमला सफल रहा लेकिन उसकी प्रशासनिक मनमानी से कितना जनाक्रोश मुख्यमंत्री के खिलाफ पनपा है,इसका आकलन नौकरशाहों को करने की न तो आवश्यकता है और न ही फुर्सत।
मुख्यमंत्री मायावती के बाराबंकी आगमन पर प्रमुख स्थानों व मार्गों की सफाई हुई थी।मुख्यमंत्री को अब औचक निरीक्षण रात में करना चाहिए।जनपद बाराबंकी में शिक्षा-स्वास्थ्य व ग्राम्य विकास विभाग में भ्रष्टाचार व शासनादेशों के उल्लंघन को लेकर विभिन्न संगठन कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं।ठोस प्रशासनिक कार्यवाही न होने से इन विभागों के भ्रष्ट,नाकारा कर्मियों की चॉंदी है।आप दोबारा बाराबंकी कब आओगी यह सवाल जेहन में कौंधता है।अब आप जब भी आओगी हम तो घर से निकलेंगे ही नही।एक फायदा हो जायेगा कि फिर से साफ-सफाई हो जायेगी।इस बार आप जब आओ तो यहां कि प्रशासनिक गंदगी को साफ करके जाओ तो आम जनता का कुछ भला हो।
Thursday, March 3, 2011
महत्वाकांक्षी इंसान
| नितेन्द्र विक्रम कौशिक | |
महत्वाकांक्षी होना इंसान के लिए बहुत अच्छी बात है , लेकिन ज्यादा महत्वाकांक्षी होना गलत है , क्योंकि वो फिर लोभ और स्वार्थ का धोतक है , कभी कभी हम अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के चकर में दुसरे लोगों की महत्वाकांक्षा और उनकी भावनाओं को गहरा ठेस पहुंचाते हैं ! हमें ये ख्याल रखना होगा की और लोग भी हैं , सभी लोगों का अलग अलग महत्व है , सभी लोगों का मान सामान , महत्व का ख्याल रखते हुए हमें अपना वक्तव्य देना चाहिए ! हम हमेश अपनी आदत से लचर हैं अपने आपको देखने और दिखाने के चकर में औरों को भूल जाते हैं , कभी कभी इन सबों के चकर में लोगों की गरिमा तो ठेस पहुंचाते हैं , हम हमेशा भूल जाते हैं की सामने वाला व्यक्ति क्या है , उनकी अहमियत क्या है , मैं जो बोलने या लिखने जा रहा हूँ वो सही है या नहीं है , इससे औरों को कैसा महसूस होगा ? ऐसा तो नहीं की हम लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं, और ऐसे भी हमारी जो सभ्यता और संस्कृति है उसके हिसाब से लोगों का ख्याल रखना पड़ता है , सामने वाले वरिष्ट हैं या गुनी हैं या फिर हम से ज्यादा जानते हों और करते हों , एक संगठन चलने के लिए इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ेगा तभी जाकर कोई संगठन सफल होगा , हम हमेशा लोगों को भूल कर आदेश जरी कर देते हैं , हमारे संस्कृति में व्यक्तियों की दो वजहों से आदर करते हैं एक उनके उम्र के हिसाब से दूसरा उनके काम और उनके नाम के हिसाब से , लेकिन ये बहुत ही दुःख की बात है की हमलोग या भूल गए हैं ! और अक्सर ही ऐसी गलतियाँ करते रहते हैं ! जब हम औरों को आदर करेंगे तभी हमें भी कोई आदर करेगा , जब हम औरों की भावनाओं का क़द्र करेंगे तभी हमारी भावनाओं की कोई क़द्र करेगा ! हमें अपने आप को भूलना नहीं चाहिए ! हम अपनी बात दो तरीके से किसी को कह सकते हैं एक तो आदेश दे सकते हैं और दूसरा हम निवेदन करते हुए ,ये हमें तय करना है की इन दोनों में कौन सा तरीका अच्छा रहेगा ! देखने में ये छोटी बात लगती है लेकिन ये बहुत ही बड़ी बातें हैं ! इन्ही छोटी छोटी बातों से रिश्तों के बिच बहुत बड़ी खायी आ जाती है , और बाद में उस खायी को पाटना बहुत मुश्किल हो जाता है !
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