Tuesday, May 24, 2011
संगठन व सत्ता के सिधान्त व डॉ लोहिया
संगठन व सत्ता के सिधान्त व डॉ लोहिया अरविन्द विद्रोही यह सर्व विदित है की किसी भी लोकतान्त्रिक संघठन के सफल संचालन हेतु कार्यकर्ता,कार्यालय,कार्यक्रम,कोष,क्रियान्वयन अनिवार्य तत्त्व होते हैं| सिधान्त विहीन अवसरवादी राजनीति राजनीति आज के दौर में अपना परचम लहरा रही है| दल बदल व पूंजीवाद के सहारे सत्ता के गलियारे में अपना वजूद बने रखने के फेर में माहिर फरेबी किस्म के लोगो ने अपना पाला बदलना व भावनात्मक प्रलाप शुरु कर दिया है| आज राजनीति स्याह व संक्रीन हो चुकी है| काजल की कोठरी बन चुकी इस राजनीति में बेदाग रहना ही एक बड़ी उब्लाब्धि है| आज संघठन आधारित राजनीति का स्थान व्यक्ति,व्यक्ति के परिवार की चाटुकारिता व जी हजुरी ने ले लिया है| प्रख्यात समाजवादी विचारक व चिन्तक डॉ राम मनोहर लोहिया राजनीति में परिवार वाद के कट्टर विरोधी थे| वो इसे राजतन्त्र मानते थे| डॉ लोहिया आजाद भारत की दुर्दशा का कारण आजाद भारत की कांग्रेसी सरकार व पंडित नेहरु को मानते थे| कांग्रेस के खिलाफ गैर कांग्रेस वाद की मुहीम को साकार रूप लोहिया ने दिया था| आज डॉ लोहिया के विचार व सोच कार्यकर्ताओ की उपेक्षा व अवसर वादिओं को बढ़ावा दिये जाने के कारण नेपथ्य में चलते चले जा रहे हैं | डॉ राम मनोहर लोहिया राजनीति को समाज सेवा का माध्यम मानते थे | राजनीति में विचार व सिधान्त को सर्वोपरि मानने वाले डॉ लोहिया ने अपने सम्पुर्न्य जीवन में कभी भी संघर्ष शील साथियों - कार्यकर्ताओं की ना तो उपेक्षा की और ना ही चुनावी लाभ के दृष्टिकोण से अपने विचारों और सिधान्तों से समझोता किया | दरअसल १९६७ का वाकया है -- इस समय डॉ राम मनोहर लोहिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे | खुद कन्नौज सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे तथा दल के अन्य उम्मीदवारों की सभाओं में भाषण भी देने जाते थे | इस समय विधान सभा व लोक सभा दोनों के चुनाव साथ साथ हो रहे थे | डॉ लोहिया १९६३ में फर्रुखा बाद लोकसभा सरात से उपचुनाव में विजई होकर प्रथम बार सांसद बने थे | डॉ लोहिया समान नागरिक संहिता को लागु करने की आवाज उठाया करते थे | मुस्लिमो के एक बड़ा तबका डॉ लोहिया के इस विचार से आक्रोशित था | इलाहबाद में १९६७ के आज चुनावों में डॉ लोहिया को एक विशाल चुनावी सभा को संबोधित करना था | संसोपा के उम्मीदवारों का मानना था कि डॉ लोहिया का सभा में समान नागरिक संहिता का समर्थन करना उनके चुनावों में प्रतिकूल असर डालेगा | डॉ लोहिया सड़क मार्ग से प्रताप गढ़ से इलाहबाद आने वाले थे | समाजवादी नेता सत्य प्रकाश मालवीय ने गंगा पर - फाफा मौऊ बाज़ार में डॉ लोहिया का स्वागत किया और उसने साथ कार में ही बैठ लिए | कार में कैप्टेन अब्बास अली भी थे | सत्य प्रकाश मालवीय ने किसी तरह प्रत्याशियो की बात डॉ लोहिया से कही | डॉ लोहिया ने कहा ---- तुम चाहो तो मुझे मीटिंग में मत ले जाओ | लेकिन मीटिंग में यदि मुझसे प्रश्न पूछा गया या किसी ने वहा इस विषय पर चर्चा की , तो उसका वही उत्तर दूंगा जो मेरी राय है ,मेरी विचारधारा है | मैं वोट के लिए विचारधारा नहीं बदला करता भले ही मैं हार जाऊ , पार्टी के सभी उम्मीदवार हार जाएँ | मेरी विचारधारा मैं समझता हूँ देश हित में है और देश दल से , चुनावो से बड़ा है | आज उत्तर प्रदेश में आगामी विधान सभा के चुनावों में सत्ता प्राप्ति के लिए जिस प्रकार का दांव - पेंच व निष्ठा परिवर्तन का कार्य करने वालो को पुराने समाजवादी कार्यकर्ताओं के हक की कीमत पर समाजवादी पार्टी का नेतृत्व स्थापित कर रहा है , वाह डॉ लोहिया के समाजवादी विचार धारा के प्रति समर्पण व दृढ़ता के सिधान्त के नितांत प्रतिकूल है | इस प्रकार का आचरण समाजवादी चरित्र का परिचायक ना हो कर के सत्ता लोलुप चरित्र का घोतक है | सिर्फ डॉ लोहिया का नाम जपने व उनकी फोटो पे माला चढाने, उनके नाम से ट्रस्ट चलने से कोई उनका अनुयायी नहीं हो जाता, उनके विचारों को व्यव्हार में अमल करने वाले ही लोहिया के लोग है | कार्यकर्ताओं के हक के लिए लड़ने वाले डॉ लोहिया के तात्कालिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष का पालन ही कर रहे है और इनको करना भी चाहिए | तानाशाही के खिलाफ लड़ते लड़ते कब खुद तानाशाह सा आचरण करने लगते हैं राजनेता इसका इनको पता ही नहीं चलता,अब लोहिया के लोगो की हुनकर ही इनका भ्रम तोड़ेगी.....
Tuesday, May 10, 2011
समाजवादी विचार,लोहिया और मुलायम सिंह यादव
उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावो में चुनाव लड़ने के लिए दल बदलने का खेल चालू हो चुका है| राजनीती के व्यवसायीकरण का ही दुष्परिणाम है कि समाजवादी विचार के राजनैतिक संघठन भी आदर्श ,सुचिता ,संघर्ष ,समर्पण को दरकिनार कर दलबदलूं लोगो को तवज्जो दे रहे हैं | भारत की राजनीति में व्याप्त विसंगतियो को बखूबी समझने वाले समाजवादी विचारक व चिन्तक राम मनोहर लोहिया का हवाला देते हुए उनके शिष्य समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कई बार कहा है की ---- डॉ लोहिया जरुर चले गये है दुनिया से लेकिन उनके विचारों को कोई नहीं मिटा सकता | उनके विचारों पे चलना पड़ेगा| आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत ही भयावह स्थिति उत्पन्न हो चुकी है | किसानों की कृषि योग्य भूमि पर सरकारों की कुदृष्टि पड़ चुकी है | किसान जगह जगह अपना संघठन बना कर संघर्ष रत है | किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है | खेती के औजार की जगह विवशता में किसान हथियार उठा रहे है | आज किसान आन्दोलन पे भी गन्दी राजनीति हो रही है | डॉ लोहिया के तात्कालिक अन्याय के विरोध के सिधान्त के पालन करने वाले समाजवादी कार्यकर्ता कहा है? कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के बीच संघठन करने वालो को कितना तवज्जो समाजवादी पार्टी ने दिया है? डॉ लोहिया के सिधांतो के अनुपालन में , जनसंघर्षो में जेल जाने वाले कार्यकर्ताओ का मनोबल कैसे बढेगा? अब यह प्रश्न उठना लाजिमी है | दफा १४४ जैसे काले कानों को तोड़ने में लगातार जेल जाने वाले डॉ लोहिया की विरासत को बहुत हद तक संजो कर रखने वाले मुलायम सिंह यादव के द्वारा अपने समाजवादी कार्यकर्ताओ की आगामी उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रत्याशिता में उपेक्षा करना हतप्रभ करने वाला ,डॉ लोहिया व समाजवादी आन्दोलन के संघर्ष के साथियो का मान मर्दन करने वाला गैर जरुरी कदम है | बसपा सरकार में वर्षो मलाई काटने वाले लोगो को समाजवादी पार्टी में स्थानीय कार्यकर्ताओ पर थोपना व विधान सभा का प्रत्याशी बनाना घोर राजनितिक अवसरवादिता है | डॉ लोहिया के अनुसार पहले उत्तर प्रदेश में समाजवादियो को अपनी सफलता और कमजोरियो को जान लेना चाहिए | जहा समाजवादी ताकतवर है,वहा चुनाव समझोते की कोई जरुरत नहीं है| क्या डॉ लोहिया की इस बात पर समाजवादी नेतृत्व ध्यान देगा? उत्तर प्रदेश में बसपा के मुकाबिल समाजवादी पार्टी अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के संघर्ष की बदौलत ही पहुची है | दल्बद्लुओ को तवज्जो दिये जाने से एक निराशा व छोभ का वातावरण व्याप्त हो रहा है | सत्ता की तरफ समाजवादी पार्टी के बढ़ते कदम को भांप के स्वार्थी प्रवृति के लोग भी समाजवादी पार्टी में शामिल हो रहे है | इनका अतीत ना तो जनसंघर्ष का रहा है ना ही संघठन के प्रति वफ़ादारी का |इनसे भविष्य में भी कोई वफ़ादारी की उम्मीद करना बेकार है ,यह सिर्फ समाजवादी पार्टी के टिकेट से विधायक बनने की लालसा में आये है| दलबदल कर आये स्वार्थी तत्वों को बढ़ावा देना,उनको चुनाव में प्रत्याशी बनाना वो भी समाजवादी कार्यकर्ताओ के रहते डॉ राम मनोहर लोहिया की आत्मा और विचारो दोनों को लहूलुहान करने वाला कृत्या है | दलबदल कर के आये लोगो को कुछ समय समाजवाद के संघर्ष में जुटाना चाहिए,एक चुनाव में इनको पार्टी के प्रचार प्रसार में लगाना चाहिए |लेकिन क्या तब यह स्वार्थी तत्त्व समाजवादी पार्टी में रहेंगे?
Friday, April 29, 2011
समाजवादी आन्दोलन-संघर्ष और सत्ता
समाजवादी आन्दोलन-संघर्ष और सत्ता
अरविन्द विद्रोही
डा0 राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी आन्दोलन को सार्थक व सही राह पर चलाने के लिए 1957 में ही कहा था - किसी भी बड़े आन्दोलन में एक अजीब तरह की वाहियात चीज या मोड़ बन जाया करता है। एक तरफ वे लोग जो कि आन्दोलन के उद्देश्यों के लिए तकलीफ उठाते हैं, दूसरी तरफ वे लोग जो आन्दोलन के सफल होने के बाद उसके हुकूमती काम-काज को चलाते हैं। और आप याद रखना कि ये संसार के इतिहास में हमेशा ही हुआ है लेकिन इतना बुरी तरह से नहीं हुआ कभी जितना कि हिन्दुस्तान में हुआ है। और मुझे खतरा लगता है कि कहीं सोशलिस्ट पार्टी की हुकूमत में भी एैसा न हो जाये कि लड़ने वालों का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक्त आये तब दूसरा गिरोह आ जाये।
डा0 राम मनोहर लोहिया की यह आशंका दुर्भाग्य-वश अक्षरशः सत्य साबित हुई।डा0 लोहिया के धुर अनुयायी मुलायम सिंह यादव भी बगैर संघर्ष किये हुकूमत चलाने वाले गिरोह के मोहपाश में जकड़ गये थे।तमाम खांटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से दूर होते गये और मजे की बात यह है कि इन सबके दूर जाने के पीछे था सिर्फ एक चेहरा अमर सिंह। यह वह दौर था जब सपा में फिल्मी सितारों,खिलाड़ियों,पॅंूजीपतियों,ठेकेदारों, का वर्चस्व कायम हुआ। समाजवादी कार्यकर्ताओं के संघर्ष व त्याग के मूल्य की जगह ग्लैमर व दौलत ने ले लिया। कालान्तर में उ0प्र0 व केन्द्र दोनों जगह की सरकारों में सपा की कोई भागीदारी न रहने के कारण मौका पाकर व्यावसायिक नेता ने सपा व मुलायम सिंह यादव दोनों से किनारा कर लिया और अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया।सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए यह आघात के साथ-साथ एक सबक भी था।व्यावसायिक,आपराधिक प्रवृत्ति के दलबदलू लोग निहायत ही स्वार्थी व लोभी होते हैं।इन स्वार्थी लोगों का किसी भी राजनैतिक विचारधारा से कोई लगाव नहीं होता है। किसी भी संगठन से,उसके प्रचार-प्रसार से, विचारों के अनुपालन से इन तत्वों की कोई भी दिलचस्पी नहीं होती है। यह अवसरवादी प्रजाति के सर्वव्यापी जीव होते हैं तथा सरकार में रहकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह जनता का रूझान भांप कर उसी दल में प्रवेश करते हैं जिसकी सरकार बनने की उम्मीद होती है।
खतरा बहुत बड़ा है समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर भी। एक तरफ दमनात्मक व अलोकतांत्रिक कार्यवाही पर आमादा उ0प्र0 की बसपा सरकार, दूसरी तरफ संघर्ष के पश्चात् सपा में संगठन में ही मौजूद गणेश परिक्रमा करने वाले,पूॅजीपतियों,स्वार्थी प्रवृत्ति के लोगों को नेतृत्व द्वारा तवज्जों दिये जाने का आंतरिक भय। और यह आंतरिक भय टिकट वितरण के बाद असंतोष के रूप में सामने आ रहा है।सड़क पर उतर कर गॉंव-गॉंव में जा कर जनता के दुःख-दर्द को बॉंटने वाला कार्यकर्ता या नेता कहॉं रोज मुख्यालय पर हाजिरी लगा पायेगा,इस तथ्य को समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को संज्ञान में लेना चाहिए। एक बात और है समाजवादी पार्टी में कौन-कौन कार्यकर्ता व नेता अपने संगठन के कार्यक्रमों को मनोयोग से पूरा किया है,इसकी पुख्ता जानकारी नेतृत्व के पास होनी चाहिए।
डा0 लोहिया ने संगठन के संदर्भ में भी सचेत किया था कि संगठन में जो लोग आयें उनमें सहयोगिता होनी चाहिए। अगर संगठन चलाना है तो व्यक्तिवाद कैसे चल सकता है? दोनों में सहअस्तित्व नहीं हो सकता है।जब संगठन चलेगा तो व्यक्तिवाद को खत्म करना ही पडेगा। पूरी तरह से खत्म करना नामुमकिन है क्योंकि हम लोग पूरी तरह से तो अच्छे हो नही सकते। लेकिन जिस हद तक व्यक्तिवाद को खत्म करना जरूरी है,करना पड़ेगा।
अरविन्द विद्रोही
डा0 राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी आन्दोलन को सार्थक व सही राह पर चलाने के लिए 1957 में ही कहा था - किसी भी बड़े आन्दोलन में एक अजीब तरह की वाहियात चीज या मोड़ बन जाया करता है। एक तरफ वे लोग जो कि आन्दोलन के उद्देश्यों के लिए तकलीफ उठाते हैं, दूसरी तरफ वे लोग जो आन्दोलन के सफल होने के बाद उसके हुकूमती काम-काज को चलाते हैं। और आप याद रखना कि ये संसार के इतिहास में हमेशा ही हुआ है लेकिन इतना बुरी तरह से नहीं हुआ कभी जितना कि हिन्दुस्तान में हुआ है। और मुझे खतरा लगता है कि कहीं सोशलिस्ट पार्टी की हुकूमत में भी एैसा न हो जाये कि लड़ने वालों का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक्त आये तब दूसरा गिरोह आ जाये।
डा0 राम मनोहर लोहिया की यह आशंका दुर्भाग्य-वश अक्षरशः सत्य साबित हुई।डा0 लोहिया के धुर अनुयायी मुलायम सिंह यादव भी बगैर संघर्ष किये हुकूमत चलाने वाले गिरोह के मोहपाश में जकड़ गये थे।तमाम खांटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से दूर होते गये और मजे की बात यह है कि इन सबके दूर जाने के पीछे था सिर्फ एक चेहरा अमर सिंह। यह वह दौर था जब सपा में फिल्मी सितारों,खिलाड़ियों,पॅंूजीपतियों,ठेकेदारों, का वर्चस्व कायम हुआ। समाजवादी कार्यकर्ताओं के संघर्ष व त्याग के मूल्य की जगह ग्लैमर व दौलत ने ले लिया। कालान्तर में उ0प्र0 व केन्द्र दोनों जगह की सरकारों में सपा की कोई भागीदारी न रहने के कारण मौका पाकर व्यावसायिक नेता ने सपा व मुलायम सिंह यादव दोनों से किनारा कर लिया और अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया।सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए यह आघात के साथ-साथ एक सबक भी था।व्यावसायिक,आपराधिक प्रवृत्ति के दलबदलू लोग निहायत ही स्वार्थी व लोभी होते हैं।इन स्वार्थी लोगों का किसी भी राजनैतिक विचारधारा से कोई लगाव नहीं होता है। किसी भी संगठन से,उसके प्रचार-प्रसार से, विचारों के अनुपालन से इन तत्वों की कोई भी दिलचस्पी नहीं होती है। यह अवसरवादी प्रजाति के सर्वव्यापी जीव होते हैं तथा सरकार में रहकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह जनता का रूझान भांप कर उसी दल में प्रवेश करते हैं जिसकी सरकार बनने की उम्मीद होती है।
खतरा बहुत बड़ा है समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर भी। एक तरफ दमनात्मक व अलोकतांत्रिक कार्यवाही पर आमादा उ0प्र0 की बसपा सरकार, दूसरी तरफ संघर्ष के पश्चात् सपा में संगठन में ही मौजूद गणेश परिक्रमा करने वाले,पूॅजीपतियों,स्वार्थी प्रवृत्ति के लोगों को नेतृत्व द्वारा तवज्जों दिये जाने का आंतरिक भय। और यह आंतरिक भय टिकट वितरण के बाद असंतोष के रूप में सामने आ रहा है।सड़क पर उतर कर गॉंव-गॉंव में जा कर जनता के दुःख-दर्द को बॉंटने वाला कार्यकर्ता या नेता कहॉं रोज मुख्यालय पर हाजिरी लगा पायेगा,इस तथ्य को समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को संज्ञान में लेना चाहिए। एक बात और है समाजवादी पार्टी में कौन-कौन कार्यकर्ता व नेता अपने संगठन के कार्यक्रमों को मनोयोग से पूरा किया है,इसकी पुख्ता जानकारी नेतृत्व के पास होनी चाहिए।
डा0 लोहिया ने संगठन के संदर्भ में भी सचेत किया था कि संगठन में जो लोग आयें उनमें सहयोगिता होनी चाहिए। अगर संगठन चलाना है तो व्यक्तिवाद कैसे चल सकता है? दोनों में सहअस्तित्व नहीं हो सकता है।जब संगठन चलेगा तो व्यक्तिवाद को खत्म करना ही पडेगा। पूरी तरह से खत्म करना नामुमकिन है क्योंकि हम लोग पूरी तरह से तो अच्छे हो नही सकते। लेकिन जिस हद तक व्यक्तिवाद को खत्म करना जरूरी है,करना पड़ेगा।
Thursday, April 7, 2011
मंगल पाण्डेय-1857 के गदर का प्रथम बलिदानी
मंगल पाण्डेय-1857 के गदर का प्रथम बलिदानी
अरविन्द विद्रोही
8 अप्रैल,1857 के दिन बैरकपुर की रेजीमेण्ट के एक सिपाही को फौजी अनुशासन भंग करने तथा हत्या करने के अपराध में फांसी पर चढ़ाया गया। फांसी चढ़ाने के लिए कोई स्थानीय जल्लाद न मिला। कलकत्ता से चार जल्लादों को बुलाकर इस फौजी को फॉंसी दी गई।यह फौजी था भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रथम योद्धा-मंगल पाण्ड़ेय।
अजीमुल्ला खॉं द्वारा अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके तैयार की गई 31मई,1857 के गदर की योजना को क्रियान्वित नाना साहेब पेशवा ने किया, परन्तु मातृभूमि की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले प्रथम योद्धा हैं-मंगल पाण्ड़ेय। भारतीय क्रान्ति के अग्रदूत-मंगल पाण्डेय एक देशभक्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। बैरकपुर की 19नम्बर रेजीमेण्ट के भावुक तथा जोशीले सिपाही मंगल पाण्डेय का क्रोध मानों सातवें आसमान पर जा पहुॅंचा, जब यह खबर फैली कि अंग्रेजों द्वारा गाय तथा सूअर की चर्बी व खून का प्रयोग करके बनायी गई कारतूसों को रेजीमेण्ट में भेजा गया है। रेजीमेण्ट में असंतोष फैल गया।अंग्रेजों ने समझाया कि यैसा कुछ भी नहीं किया गया है परन्तु गो मांस भक्षी अंग्रेजों की बातों का रेजीमेण्ट में किसी को विश्वास नहीं हुआ। 31मई,1857 के गदर की तैयारी के लिए बैरकपुर में रेजीमेण्ट का मुखिया वजीर अली खॉं को बनाया गया था। कारतूसों को इस्तेमाल करने से इंकार कर देने के कारण रेजीमेण्ट को निशस्त्र करने की योजना अंग्रेजों द्वारा बनायी गई। इसकी भनक लगते ही भावुक ह्दय के जोशीले-धार्मिक-देशभक्त मंगल पाण्डेय संभवतः अपने मनोभावों एवं शक्ति पर नियंत्रण न रख सके अपितु रखना भी नहीं चाहा होगा। वो तो बलिदान की सजी हुई वेदी में प्रथम आहुति देने को उद्वेलित मानस था। सोचा होगा,‘‘ विद्रोह करना ही है तो कई मास बाद क्यो।? अभी क्यों नहीं?कहीं बर्मा से गोरी पलटन न आ जाये?‘‘ यह विचार मनो-मस्तिश्क में कौंधने लगे मंगल पाण्डेय के। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक कारणों के साथ-साथ धार्मिक कारण के जुड़ जाने से ज्वाला ने मंगल पाण्डेय के तन-बदन में आग लगा दी। समस्त कारणों ने एक सूत्र में एकत्र होकर गुलामी की बेडियां काटने के लिए मंगल पाण्डेय के भावुक-जोशीले मन को उद्वेलित कर दिया। फिरंगियों के प्रति घृणा,विद्वेष,असंतोष की अग्नि ने 29मार्च,1857 को पहली गोली चलाने पर विवश कर दिया,छेड़ दिया स्वतन्त्रता-संग्राम मंगल पाण्डेय ने। गुलामी की जंजीरों को काटने को बेचैन मन ने किस तरह विद्रोह की आधारशिला रखी,यह इतिहास में दर्ज हो चुका है।
29मार्च,1857 के दिन बैरकपुर की छावनी में अपने कमरे में बैठे मंगल पाण्डेय ने अचानक अपनी बन्दूक को उठाकर, माथे पर लगाकर चूमा। भारत माता की बारम्बार स्तुति करते हुए मंगल पाण्डेय ने बन्दूक में गोली भरी। शेर की तरह वीर मंगल पाण्डेय परेड ग्राउण्ड की तरफ चल पडे़। दमकता ललाट,गर्व से चौडी छाती,बलिदान की महान भावना से ओत-प्रोत आत्मा और नश्वर शरीर मानों साक्षात् काल अपने शिकार की तरफ लपका हो। साथियों ने रोका, मंगल पाण्डेय ने ललकारा, ‘‘व्यर्थ प्रतीक्षा मत करो। चलो,आज ही फैसला करो। आज ही फिरंगियो। का सफाया करो। भाइयों,उठो,आप पीछे क्यों हट रहे हो?‘‘ उन्होंने धर्म की सौगन्ध देते हुए ललकारा, ‘‘स्वतन्त्रता की देवी तुम्हें पुकार रही है और कह रही है कि तुम्हें धोखेबाज तथा मक्कार शत्रुओं पर फौरन आक्रमण बोल देना चाहिए। अब और रूकने की आवश्यकता नहीं है।‘‘ अन्य सिपाहियों के भाव क्रान्तिकारी नेताओं के निर्देशों की डोर में बधें रहे। मंगल पाण्डेय ने सिंहनाद कर दिया। सिंह की चपेट में ब्रितानिया हुकूमत का सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन आ गया। सार्जेन्ट ने मंगल पाण्डेय की गिरफतारी का आदेष दिया, कोई सिपाही आगे नहीं बढ़ा। सिंह की आंखे शोले उगल रही थीं, आत्मा रक्तदान के लिए तड़प रही थी। ठॉंय की आवाज हुई और सार्जेण्ट ह्यूसन जमीन चाटने लगा। दूसरा अंग्रेज अफसर लेफटीनेण्ट बॉब घोडे पर सवार होकर मंगल पाण्डेय की तरफ झपटा। मंगल पाण्डेय ने दूसरी गोली चला दी, गोली घोडे को लगी,घोडा व बॉब दोनो गिर पडे। बॉब ने पिस्टल से मंगल पाण्डेय पर फायर किया। निशाना चूका। मंगल पाण्डेय ने तलवार से अंग्रेज बॉब को मौत के घाट उतार दिया। इसी समय एक अंग्रेज ने पीछे से मंगल पाण्डेय पर हमला किया। एक भारतीय सिपाही ने जोर से बन्दूक का कुन्दा उस अंग्रेज के सर पर मारा,अंग्रेज का सिर फट गया और वह धरती पर गिर पड़ा। मंगल पाण्डेय की ऑंखें क्रान्ति की ज्वालायें बरसा रहीं थी। विद्रोह की खबर कर्नल व्हीलर को मिली। परेड-ग्राउण्ड में पहुॅंच कर उसने भारतीय सैनिकों को आज्ञा दी,‘‘पाण्डेय को गिरफतार करो।‘‘ सिपाहियों के मध्य से सिंहनाद हुआ, ‘‘खबरदार,मंगल पाण्डेय को कोई हाथ न लगाये। हम ब्राह्मण देवता का बाल भी बांका न होने दे।गें।‘‘ कर्नल व्हीलर ने अंग्रेजों की लाशें देखीं, मंगल पाण्डेय का रक्त से सना शरीर देखा तथा विद्रोह के मुहाने पर खड़ी फौज को देखा और कुछ सोचता हुआ लौट गया। उसने जनरल हियरे को खबर की। अंग्रेज सेना के साथ हियरे परेड ग्राउण्ड आ धमका। मंगल पाण्डेय ने अंग्रेज सेना को आते देखकर गर्जना की,‘‘भाइयों,बगावत करो,बगावत करो। अब देर करना उचित नहीं। देश को तुम्हारा बलिदान चाहिए।‘‘ परन्तु भारतीय सिपाही 31मई की तय तारीख और क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुशासन के कारण शान्त रहे। मंगल पाण्डेय ने तत्काल अपनी छाती पर नाल रखकर गोली चला दी। वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज जीवित पकड़ कर उनकी दुर्गति कर दें। दुर्भाग्य वश वो मरे नहीं, अंग्रेजों ने फौजी अस्पताल में इलाज कराया।ठीक होने पर उन पर फौजी अनुशासन भंग करने का तथा हत्या का मुकदमा चला। मंगल पाण्डेय ने कहा,‘‘जिन अंग्रेजों पर मैने गोली चलाई, उनसे मेरा कोई बैर नहीं था , झगड़ा व्यक्तियों का नहीं,दो देशों का है। हम नहीं चाहते कि दूसरों के गुलाम बन कर रहें। फिरंगियों को हम अपने देश से निकाल देना चाहते हैं।‘‘अदालत ने मंगल पाण्डेय को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। 8अप्रैल,1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई।
अरविन्द विद्रोही
8 अप्रैल,1857 के दिन बैरकपुर की रेजीमेण्ट के एक सिपाही को फौजी अनुशासन भंग करने तथा हत्या करने के अपराध में फांसी पर चढ़ाया गया। फांसी चढ़ाने के लिए कोई स्थानीय जल्लाद न मिला। कलकत्ता से चार जल्लादों को बुलाकर इस फौजी को फॉंसी दी गई।यह फौजी था भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रथम योद्धा-मंगल पाण्ड़ेय।
अजीमुल्ला खॉं द्वारा अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके तैयार की गई 31मई,1857 के गदर की योजना को क्रियान्वित नाना साहेब पेशवा ने किया, परन्तु मातृभूमि की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले प्रथम योद्धा हैं-मंगल पाण्ड़ेय। भारतीय क्रान्ति के अग्रदूत-मंगल पाण्डेय एक देशभक्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। बैरकपुर की 19नम्बर रेजीमेण्ट के भावुक तथा जोशीले सिपाही मंगल पाण्डेय का क्रोध मानों सातवें आसमान पर जा पहुॅंचा, जब यह खबर फैली कि अंग्रेजों द्वारा गाय तथा सूअर की चर्बी व खून का प्रयोग करके बनायी गई कारतूसों को रेजीमेण्ट में भेजा गया है। रेजीमेण्ट में असंतोष फैल गया।अंग्रेजों ने समझाया कि यैसा कुछ भी नहीं किया गया है परन्तु गो मांस भक्षी अंग्रेजों की बातों का रेजीमेण्ट में किसी को विश्वास नहीं हुआ। 31मई,1857 के गदर की तैयारी के लिए बैरकपुर में रेजीमेण्ट का मुखिया वजीर अली खॉं को बनाया गया था। कारतूसों को इस्तेमाल करने से इंकार कर देने के कारण रेजीमेण्ट को निशस्त्र करने की योजना अंग्रेजों द्वारा बनायी गई। इसकी भनक लगते ही भावुक ह्दय के जोशीले-धार्मिक-देशभक्त मंगल पाण्डेय संभवतः अपने मनोभावों एवं शक्ति पर नियंत्रण न रख सके अपितु रखना भी नहीं चाहा होगा। वो तो बलिदान की सजी हुई वेदी में प्रथम आहुति देने को उद्वेलित मानस था। सोचा होगा,‘‘ विद्रोह करना ही है तो कई मास बाद क्यो।? अभी क्यों नहीं?कहीं बर्मा से गोरी पलटन न आ जाये?‘‘ यह विचार मनो-मस्तिश्क में कौंधने लगे मंगल पाण्डेय के। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक कारणों के साथ-साथ धार्मिक कारण के जुड़ जाने से ज्वाला ने मंगल पाण्डेय के तन-बदन में आग लगा दी। समस्त कारणों ने एक सूत्र में एकत्र होकर गुलामी की बेडियां काटने के लिए मंगल पाण्डेय के भावुक-जोशीले मन को उद्वेलित कर दिया। फिरंगियों के प्रति घृणा,विद्वेष,असंतोष की अग्नि ने 29मार्च,1857 को पहली गोली चलाने पर विवश कर दिया,छेड़ दिया स्वतन्त्रता-संग्राम मंगल पाण्डेय ने। गुलामी की जंजीरों को काटने को बेचैन मन ने किस तरह विद्रोह की आधारशिला रखी,यह इतिहास में दर्ज हो चुका है।
29मार्च,1857 के दिन बैरकपुर की छावनी में अपने कमरे में बैठे मंगल पाण्डेय ने अचानक अपनी बन्दूक को उठाकर, माथे पर लगाकर चूमा। भारत माता की बारम्बार स्तुति करते हुए मंगल पाण्डेय ने बन्दूक में गोली भरी। शेर की तरह वीर मंगल पाण्डेय परेड ग्राउण्ड की तरफ चल पडे़। दमकता ललाट,गर्व से चौडी छाती,बलिदान की महान भावना से ओत-प्रोत आत्मा और नश्वर शरीर मानों साक्षात् काल अपने शिकार की तरफ लपका हो। साथियों ने रोका, मंगल पाण्डेय ने ललकारा, ‘‘व्यर्थ प्रतीक्षा मत करो। चलो,आज ही फैसला करो। आज ही फिरंगियो। का सफाया करो। भाइयों,उठो,आप पीछे क्यों हट रहे हो?‘‘ उन्होंने धर्म की सौगन्ध देते हुए ललकारा, ‘‘स्वतन्त्रता की देवी तुम्हें पुकार रही है और कह रही है कि तुम्हें धोखेबाज तथा मक्कार शत्रुओं पर फौरन आक्रमण बोल देना चाहिए। अब और रूकने की आवश्यकता नहीं है।‘‘ अन्य सिपाहियों के भाव क्रान्तिकारी नेताओं के निर्देशों की डोर में बधें रहे। मंगल पाण्डेय ने सिंहनाद कर दिया। सिंह की चपेट में ब्रितानिया हुकूमत का सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन आ गया। सार्जेन्ट ने मंगल पाण्डेय की गिरफतारी का आदेष दिया, कोई सिपाही आगे नहीं बढ़ा। सिंह की आंखे शोले उगल रही थीं, आत्मा रक्तदान के लिए तड़प रही थी। ठॉंय की आवाज हुई और सार्जेण्ट ह्यूसन जमीन चाटने लगा। दूसरा अंग्रेज अफसर लेफटीनेण्ट बॉब घोडे पर सवार होकर मंगल पाण्डेय की तरफ झपटा। मंगल पाण्डेय ने दूसरी गोली चला दी, गोली घोडे को लगी,घोडा व बॉब दोनो गिर पडे। बॉब ने पिस्टल से मंगल पाण्डेय पर फायर किया। निशाना चूका। मंगल पाण्डेय ने तलवार से अंग्रेज बॉब को मौत के घाट उतार दिया। इसी समय एक अंग्रेज ने पीछे से मंगल पाण्डेय पर हमला किया। एक भारतीय सिपाही ने जोर से बन्दूक का कुन्दा उस अंग्रेज के सर पर मारा,अंग्रेज का सिर फट गया और वह धरती पर गिर पड़ा। मंगल पाण्डेय की ऑंखें क्रान्ति की ज्वालायें बरसा रहीं थी। विद्रोह की खबर कर्नल व्हीलर को मिली। परेड-ग्राउण्ड में पहुॅंच कर उसने भारतीय सैनिकों को आज्ञा दी,‘‘पाण्डेय को गिरफतार करो।‘‘ सिपाहियों के मध्य से सिंहनाद हुआ, ‘‘खबरदार,मंगल पाण्डेय को कोई हाथ न लगाये। हम ब्राह्मण देवता का बाल भी बांका न होने दे।गें।‘‘ कर्नल व्हीलर ने अंग्रेजों की लाशें देखीं, मंगल पाण्डेय का रक्त से सना शरीर देखा तथा विद्रोह के मुहाने पर खड़ी फौज को देखा और कुछ सोचता हुआ लौट गया। उसने जनरल हियरे को खबर की। अंग्रेज सेना के साथ हियरे परेड ग्राउण्ड आ धमका। मंगल पाण्डेय ने अंग्रेज सेना को आते देखकर गर्जना की,‘‘भाइयों,बगावत करो,बगावत करो। अब देर करना उचित नहीं। देश को तुम्हारा बलिदान चाहिए।‘‘ परन्तु भारतीय सिपाही 31मई की तय तारीख और क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुशासन के कारण शान्त रहे। मंगल पाण्डेय ने तत्काल अपनी छाती पर नाल रखकर गोली चला दी। वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज जीवित पकड़ कर उनकी दुर्गति कर दें। दुर्भाग्य वश वो मरे नहीं, अंग्रेजों ने फौजी अस्पताल में इलाज कराया।ठीक होने पर उन पर फौजी अनुशासन भंग करने का तथा हत्या का मुकदमा चला। मंगल पाण्डेय ने कहा,‘‘जिन अंग्रेजों पर मैने गोली चलाई, उनसे मेरा कोई बैर नहीं था , झगड़ा व्यक्तियों का नहीं,दो देशों का है। हम नहीं चाहते कि दूसरों के गुलाम बन कर रहें। फिरंगियों को हम अपने देश से निकाल देना चाहते हैं।‘‘अदालत ने मंगल पाण्डेय को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। 8अप्रैल,1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई।
Tuesday, March 29, 2011
अंतिम संस्कार
भारत की ब्रितानिया हुकूमत से जंग ए आजादी की एक यौद्धा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमिला सिंह पत्नी स्वर्गीय ए. पी .सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल २८मर्च,२०११ को हमारे बीच से इस nasvar संसार को छोड़ कर चली गयी...उनका देहावसान उनके सुपुत्र श्री अतुल कुमार अंजान जी के निवास ३हल्वसिया कोर्ट,हजरतगंज लखनऊ में हुआ...आज २९मर्च,२०११ को भैंसा kund में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रमिला सिंह का ११बजे सुबह अंतिम संस्कार किया जायेगा..अतुल कुमार अंजान जी का mobile 9415884415
Sunday, March 27, 2011
निर्णय का पालन सुनिश्चित करायें मुख्यमंत्री
निर्णय का पालन सुनिश्चित करायें मुख्यमंत्री
अरविन्द विद्रोही
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने समीक्षा के बाद अधिकारियों को जो कार्य सम्बन्धी चेतावनी दी है,वो एक प्रशंसनीय कृत्य है। जनता की शिकायतों के तत्काल निवारण, विकास कार्यों का सुचारू संचालन, शासनादेशों का अनुपालन, कानून व्यवस्था कायम रखना आदि सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों की ही जिम्मेदारी होती है। इन उत्तर-दायित्वों को पूर्ण न कर पाने वाले लोकसेवकों को सेवा से बर्खास्त कर देना ही एक मात्र समुचित दण्ड़ात्मक कार्यवाही है। उ0प्र0 के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0चौधरी चरण सिंह भ्रष्टाचार में लिप्त पटवारी संवर्ग की सामूहिक बर्खास्तगी करके शासन की ईमानदार हनक दिखा चुके हैं। कुख्यात अपराधियों और उनके गुर्गों पर प्रभावी कार्यवाही व नियंत्रण प्राप्त करने में सफल सिद्ध हो चुकी उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को लापरवाह, गैर जिम्मेदार तथा भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी लोकसेवकों पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में और ठोस कदम उठाने चाहिए।
मुख्यमंत्री सुश्री मायावती द्वारा लिया गया यह निर्णय कि बगैर किसानों की सहमति के उनकी भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जायेगा, एक सार्थक किसान हितैषी तथा क्रांतिकारी कदम है। इस निर्णय के लिए वे धन्यवाद की पात्र हैं। अब उन्हें एक और बड़ी पहल करनी चाहिए। बाराबंकी जनपद की फतेहपुर तहसील के रामनगर मार्ग स्थित पचघरा के किसानों की बेशकीमती कृषि भूमि का पूर्व की सरकारों द्वारा मनमाने तरीके से बगैर किसानों की सहमति के जबरिया किये गये अधिग्रहण को रद्द करके मुख्यमंत्री को किसानों की वास्तविक दुःखहरता बनना चाहिए। पचघरा के किसानों की भूमि उनके नाम राजस्व अभिलेखों में वापस दर्ज होनी चाहिए। पचघरा के किसान आज भी अपने संगठन पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा के बैनर तले अपने अध्यक्ष खुशीराम लोधी राजपूत के नेतृत्व में अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के इस निर्णय से इन किसानों को हार्दिक प्रसन्नता हुई है और अब इन किसानों को अपना भूमि अधिकार वापस मिलने का यकीन हो गया है।शायद इन किसानों का यकीन हकीकत में तब्दील हो जाये।
अरविन्द विद्रोही
उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने समीक्षा के बाद अधिकारियों को जो कार्य सम्बन्धी चेतावनी दी है,वो एक प्रशंसनीय कृत्य है। जनता की शिकायतों के तत्काल निवारण, विकास कार्यों का सुचारू संचालन, शासनादेशों का अनुपालन, कानून व्यवस्था कायम रखना आदि सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों की ही जिम्मेदारी होती है। इन उत्तर-दायित्वों को पूर्ण न कर पाने वाले लोकसेवकों को सेवा से बर्खास्त कर देना ही एक मात्र समुचित दण्ड़ात्मक कार्यवाही है। उ0प्र0 के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0चौधरी चरण सिंह भ्रष्टाचार में लिप्त पटवारी संवर्ग की सामूहिक बर्खास्तगी करके शासन की ईमानदार हनक दिखा चुके हैं। कुख्यात अपराधियों और उनके गुर्गों पर प्रभावी कार्यवाही व नियंत्रण प्राप्त करने में सफल सिद्ध हो चुकी उ0प्र0 की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को लापरवाह, गैर जिम्मेदार तथा भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी लोकसेवकों पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में और ठोस कदम उठाने चाहिए।
मुख्यमंत्री सुश्री मायावती द्वारा लिया गया यह निर्णय कि बगैर किसानों की सहमति के उनकी भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जायेगा, एक सार्थक किसान हितैषी तथा क्रांतिकारी कदम है। इस निर्णय के लिए वे धन्यवाद की पात्र हैं। अब उन्हें एक और बड़ी पहल करनी चाहिए। बाराबंकी जनपद की फतेहपुर तहसील के रामनगर मार्ग स्थित पचघरा के किसानों की बेशकीमती कृषि भूमि का पूर्व की सरकारों द्वारा मनमाने तरीके से बगैर किसानों की सहमति के जबरिया किये गये अधिग्रहण को रद्द करके मुख्यमंत्री को किसानों की वास्तविक दुःखहरता बनना चाहिए। पचघरा के किसानों की भूमि उनके नाम राजस्व अभिलेखों में वापस दर्ज होनी चाहिए। पचघरा के किसान आज भी अपने संगठन पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा के बैनर तले अपने अध्यक्ष खुशीराम लोधी राजपूत के नेतृत्व में अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के इस निर्णय से इन किसानों को हार्दिक प्रसन्नता हुई है और अब इन किसानों को अपना भूमि अधिकार वापस मिलने का यकीन हो गया है।शायद इन किसानों का यकीन हकीकत में तब्दील हो जाये।
Tuesday, March 22, 2011
23मार्च-प्रेरणा व बलिदान की अमिट तारीख
23मार्च-प्रेरणा व बलिदान की अमिट तारीख
अरविन्द विद्रोही
23मार्च का दिन एक विशेष व प्रेरक दिवस के रूप में सदैव विद्यमान रहेगा। 23मार्च का दिन भारत की ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की जंग के बलिदानी योद्धाओं की प्राणोत्सर्ग की अमिट व अमर गाथा की यादगार-प्रेरक तारीख है। जंग-ए-आजादी से लेकर आजाद भारत में भी अंतिम सांस तक सरकार के कुशासन व भ्रष्टाचार के खिलाफ अनवरत् संघर्ष करने वाले धुर समाजवादी चिंतक डा0राम मनोहर लोहिया का जन्म दिन भी 23मार्च ही है। 23मार्च,1931को ही ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ आम जनता की आवाज बनकर उभर चुके क्रंातिकारियों के बौद्धिक नेता सरदार भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरू को फॉंसी पर चढ़ा दिया गया था। इस घटना से भी 16वर्ष पूर्व क्रंातिकारी करतार सिंह सराभा,रासबिहारी बोस,शचीन्द्र नाथ सान्याल,विष्णु गणेश पिंगले आदि गदर पार्टी के वीरों ने सम्पूर्ण भारत में एक साथ 1857 की तरह गदर करने की योजना बनाई। तारीख तय हुई 21फरवरी,1915। यह बहुत बडा़ काम था।भारतीय फौजों को अपने पक्ष में करने, हथियार, गोला-बारूद, काफी धन सभी प्रबन्धों को करने में क्रंातिकारी योजना पूर्वक लग गये।देश में सर्वत्र संगठन किया गया।गदर पार्टी के प्रचारकों ने पंजाब के लुधियाना जिले के हलवासिया गॉंव के रहने वाले रहमत अली से जो कि फौज में हवलदार पद पर मलय-स्टेट-गाइड में तैनात थे, से सम्पर्क किया। रहमत अली की टुकडी मलय अर्थात सिंगापुर में तैनात थी।रहमत अली एक देशभक्त योद्धा थे।वे भी अपनी सरजमीं की आजादी की जंग को लडना व जीतना चाहते थे।अवसर की प्रतिक्षा में वे थे ही। रहमत अली ने अल्प समय में ही तमाम साथी तैयार कर लिए।तयशुदा तारीख 21फरवरी,1915 को अपनी टुकडी के साथ रहमत अली ने बगावत कर दी। साथ ही पांचवीं नेटिव इन्फैण्टरी ने भी बगावत कर दी। दूसरी टुकड़ी से बागियों पर गोली चलाने को कहा गया, उन्होंने भी साफ मना कर दिया। परिणाम स्वरूप रहमत अली और उसके साथियों पर आज्ञा उल्लंघन के साथ दूसरे सैनिकों को भड़काने का आरोप लगा। रहमत अली, गनी, सूबेदार दूदू खॉं, चिश्ती खॉं और हाकिम अली का एक साथ कोर्ट मार्शल किया गया।
23मार्च,1915 को सिंगापुर छावनी के सभी फौजियों को परेड़ मैदान में एकत्र किया गया। फौजियों के मन में दहशत पैदा करने के उद्देश्य से पॉंचों अभियुक्तों को एक दीवार के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया गया।हाथ पीठ की तरफ बंधे तथा एक बल्ली में पॉंचों को एक साथ बांधा गया था। पांचों देशभक्तों ने आवाज लगाई थी, -हमारी पीठ पर नहीं छातियों पर गोली मारों। निशानेबाजों की गोलियों से पांचों भारत मॉं के लाडले वतन से बहुत दूर सिंगापुर में 23मार्च,1915 को कुर्बान हो गये।23मार्च,1931 को ही राजगुरू, सुखदेव के साथ भगतसिंह भी क्रंातिपथ को अपने प्राणोत्सर्ग से आलोकित कर मुक्ति-पथ के राही हो लिए। भगत सिंह ने लिखा, - नौजवानों को क्रंाति का संदेश देश के कोने-कोने में पहुॅंचाना है, फैक्टरी-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गॉंवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में क्रंाति की अलख जगानी है जिससे आजादी आयेगी और तब एक मनुष्य के द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा। सुखदेव ने महात्मा गॉंधी के नाम एक पत्र में लिखा था, -क्रंातिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित करना है। इस ध्येय में संशोधन की जरा भी गुंजाइश नहीं है।वह दिन दूर नहीं है जबकि क्रंातिकारियों के नेतृत्व में और उनके झण्ड़े के नीचे जनसमुदाय उनके समाजवादी प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखायी पडेगा।आम जन के प्रति ह्दय में असीम दर्द समेटे और उस दर्द को खत्म करने के लिए दधीचि की तरह अपनी बलिदान देने वाले थे ये वीर बलिदानी।
और 23मार्च,1910 को जन्में व अंतिम सांस तक क्रांति की राह पर चलने वाले डा0राम मनोहर लोहिया ने क्रांति के उच्च ध्येय को अपने विचारों से प्रचारित करने का अद्भुत कार्य कर दिखाया।आजादी के पश्चात् डा0लोहिया ने इस भ्रम को तोडने के लिए कि सामाजिक न्याय, समता व आर्थिक समानता सिर्फ कांग्रेस ही दे सकती है, समाजवादी पार्टी का स्वतंत्र संगठन बनाया था और घोषणा भी किया था कि - कांग्रेस पार्टी ही एक एैसी पार्टी है जो भारतीय जनता की अस्मिता और आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। डा0लोहिया की सोच, उनके संघर्ष भारत की आम जनता के हित में रहे हैं। समाजवादी विचारक मधु लिमये के अनुसार-कार्यक्रम और विचार की दृष्टि से भूमिगत संगठन में उनका स्थान असाधारण था।भूमिगत रेडियों की कल्पना को उषा मेहता और उनके साथियों की मदद से उन्होंने साकार किया।भूमिगत अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा नित्य नये कार्यक्रम जारी करने का काम मुख्य रूप से वे ही करते थे। सुचेता कृपलानी जैसी गॉंधीवादी व अच्युत पटवर्द्धन जैसे समाजवादी-इनके बीच की कड़ी लोहिया ही थे।अंग्रेजी साम्राज्यवाद के मर्म स्थानों- पुलिस, थाना, रेल, तार, स्टेशन, डाकखाना आदि पर हमला कर विदेशी हुकूमत से जल्दी और थोड़े में उभर कर खत्म होने वाली क्रांति के जरिए उखाड़ फेंकने की उन्ही की योजना थी। डा0 लोहिया के मनोमस्तिष्क में भगत सिंह के प्रति असीम श्रद्धा थी।समाजवादी नेता बदरी विशाल पित्ती के अनुसार-एक बार 23मार्च को लोहिया जी के जन्म दिन के अवसर पर होली भी आई तो उस दिन लोहिया जी ने कहा कि यह दिन अच्छा नहीं है, मेरे लिए यह खुशी का दिन नहीं है और तुम लोगों के लिए भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि 23मार्च को ही भगत सिंह को फॉंसी हुई थी।
23मार्च, 1915 के अमर बलिदानी रहमत अली, गनी, सूबेदार दूदू खॉं, चिश्ती खॉं एवं 23मार्च, 1931 के बलिदानी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू तथा 23मार्च, 1910 को भारत भूमि पर जन्म लेने वाले डा0 राम मनोहर लोहिया सहित मॉं भारती के सभी अमर सपूतों कों श्रद्धा सुमन अर्पण तथा कोटिशः वन्दन-अभिनन्दन।
अरविन्द विद्रोही
23मार्च का दिन एक विशेष व प्रेरक दिवस के रूप में सदैव विद्यमान रहेगा। 23मार्च का दिन भारत की ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की जंग के बलिदानी योद्धाओं की प्राणोत्सर्ग की अमिट व अमर गाथा की यादगार-प्रेरक तारीख है। जंग-ए-आजादी से लेकर आजाद भारत में भी अंतिम सांस तक सरकार के कुशासन व भ्रष्टाचार के खिलाफ अनवरत् संघर्ष करने वाले धुर समाजवादी चिंतक डा0राम मनोहर लोहिया का जन्म दिन भी 23मार्च ही है। 23मार्च,1931को ही ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ आम जनता की आवाज बनकर उभर चुके क्रंातिकारियों के बौद्धिक नेता सरदार भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरू को फॉंसी पर चढ़ा दिया गया था। इस घटना से भी 16वर्ष पूर्व क्रंातिकारी करतार सिंह सराभा,रासबिहारी बोस,शचीन्द्र नाथ सान्याल,विष्णु गणेश पिंगले आदि गदर पार्टी के वीरों ने सम्पूर्ण भारत में एक साथ 1857 की तरह गदर करने की योजना बनाई। तारीख तय हुई 21फरवरी,1915। यह बहुत बडा़ काम था।भारतीय फौजों को अपने पक्ष में करने, हथियार, गोला-बारूद, काफी धन सभी प्रबन्धों को करने में क्रंातिकारी योजना पूर्वक लग गये।देश में सर्वत्र संगठन किया गया।गदर पार्टी के प्रचारकों ने पंजाब के लुधियाना जिले के हलवासिया गॉंव के रहने वाले रहमत अली से जो कि फौज में हवलदार पद पर मलय-स्टेट-गाइड में तैनात थे, से सम्पर्क किया। रहमत अली की टुकडी मलय अर्थात सिंगापुर में तैनात थी।रहमत अली एक देशभक्त योद्धा थे।वे भी अपनी सरजमीं की आजादी की जंग को लडना व जीतना चाहते थे।अवसर की प्रतिक्षा में वे थे ही। रहमत अली ने अल्प समय में ही तमाम साथी तैयार कर लिए।तयशुदा तारीख 21फरवरी,1915 को अपनी टुकडी के साथ रहमत अली ने बगावत कर दी। साथ ही पांचवीं नेटिव इन्फैण्टरी ने भी बगावत कर दी। दूसरी टुकड़ी से बागियों पर गोली चलाने को कहा गया, उन्होंने भी साफ मना कर दिया। परिणाम स्वरूप रहमत अली और उसके साथियों पर आज्ञा उल्लंघन के साथ दूसरे सैनिकों को भड़काने का आरोप लगा। रहमत अली, गनी, सूबेदार दूदू खॉं, चिश्ती खॉं और हाकिम अली का एक साथ कोर्ट मार्शल किया गया।
23मार्च,1915 को सिंगापुर छावनी के सभी फौजियों को परेड़ मैदान में एकत्र किया गया। फौजियों के मन में दहशत पैदा करने के उद्देश्य से पॉंचों अभियुक्तों को एक दीवार के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया गया।हाथ पीठ की तरफ बंधे तथा एक बल्ली में पॉंचों को एक साथ बांधा गया था। पांचों देशभक्तों ने आवाज लगाई थी, -हमारी पीठ पर नहीं छातियों पर गोली मारों। निशानेबाजों की गोलियों से पांचों भारत मॉं के लाडले वतन से बहुत दूर सिंगापुर में 23मार्च,1915 को कुर्बान हो गये।23मार्च,1931 को ही राजगुरू, सुखदेव के साथ भगतसिंह भी क्रंातिपथ को अपने प्राणोत्सर्ग से आलोकित कर मुक्ति-पथ के राही हो लिए। भगत सिंह ने लिखा, - नौजवानों को क्रंाति का संदेश देश के कोने-कोने में पहुॅंचाना है, फैक्टरी-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गॉंवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में क्रंाति की अलख जगानी है जिससे आजादी आयेगी और तब एक मनुष्य के द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा। सुखदेव ने महात्मा गॉंधी के नाम एक पत्र में लिखा था, -क्रंातिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित करना है। इस ध्येय में संशोधन की जरा भी गुंजाइश नहीं है।वह दिन दूर नहीं है जबकि क्रंातिकारियों के नेतृत्व में और उनके झण्ड़े के नीचे जनसमुदाय उनके समाजवादी प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखायी पडेगा।आम जन के प्रति ह्दय में असीम दर्द समेटे और उस दर्द को खत्म करने के लिए दधीचि की तरह अपनी बलिदान देने वाले थे ये वीर बलिदानी।
और 23मार्च,1910 को जन्में व अंतिम सांस तक क्रांति की राह पर चलने वाले डा0राम मनोहर लोहिया ने क्रांति के उच्च ध्येय को अपने विचारों से प्रचारित करने का अद्भुत कार्य कर दिखाया।आजादी के पश्चात् डा0लोहिया ने इस भ्रम को तोडने के लिए कि सामाजिक न्याय, समता व आर्थिक समानता सिर्फ कांग्रेस ही दे सकती है, समाजवादी पार्टी का स्वतंत्र संगठन बनाया था और घोषणा भी किया था कि - कांग्रेस पार्टी ही एक एैसी पार्टी है जो भारतीय जनता की अस्मिता और आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है। डा0लोहिया की सोच, उनके संघर्ष भारत की आम जनता के हित में रहे हैं। समाजवादी विचारक मधु लिमये के अनुसार-कार्यक्रम और विचार की दृष्टि से भूमिगत संगठन में उनका स्थान असाधारण था।भूमिगत रेडियों की कल्पना को उषा मेहता और उनके साथियों की मदद से उन्होंने साकार किया।भूमिगत अखिल भारतीय कांग्रेस समिति द्वारा नित्य नये कार्यक्रम जारी करने का काम मुख्य रूप से वे ही करते थे। सुचेता कृपलानी जैसी गॉंधीवादी व अच्युत पटवर्द्धन जैसे समाजवादी-इनके बीच की कड़ी लोहिया ही थे।अंग्रेजी साम्राज्यवाद के मर्म स्थानों- पुलिस, थाना, रेल, तार, स्टेशन, डाकखाना आदि पर हमला कर विदेशी हुकूमत से जल्दी और थोड़े में उभर कर खत्म होने वाली क्रांति के जरिए उखाड़ फेंकने की उन्ही की योजना थी। डा0 लोहिया के मनोमस्तिष्क में भगत सिंह के प्रति असीम श्रद्धा थी।समाजवादी नेता बदरी विशाल पित्ती के अनुसार-एक बार 23मार्च को लोहिया जी के जन्म दिन के अवसर पर होली भी आई तो उस दिन लोहिया जी ने कहा कि यह दिन अच्छा नहीं है, मेरे लिए यह खुशी का दिन नहीं है और तुम लोगों के लिए भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि 23मार्च को ही भगत सिंह को फॉंसी हुई थी।
23मार्च, 1915 के अमर बलिदानी रहमत अली, गनी, सूबेदार दूदू खॉं, चिश्ती खॉं एवं 23मार्च, 1931 के बलिदानी भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू तथा 23मार्च, 1910 को भारत भूमि पर जन्म लेने वाले डा0 राम मनोहर लोहिया सहित मॉं भारती के सभी अमर सपूतों कों श्रद्धा सुमन अर्पण तथा कोटिशः वन्दन-अभिनन्दन।
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