Thursday, October 27, 2011

बधाई विज्ञापनों के जरिये अपना हित साधने , राजनीति चमकाने की और पत्रकारों को लुभाने की कोशिश

हम सभी ने दीप पर्व दीपावली मना लिया | पूंजीपतियो ने जम कर अपनी पूंजी का प्रदर्शन करते हुये जमकर अपने आवास , अपने व्यापारिक प्रतिषठान की सजावट रंग बिरंगे बिजली के झालरों से करवाई | एक एक पूंजीपति परिवार ने सिर्फ आतिशबाजी में ही हजारो रुपये स्वाहा कर दिये| इनकी देखा देखी परिवार के सदश्यो के मन रखने के लिए , परंपरा निर्वाहन के नाम पे मेहनत कशो ने भी अपनी सामर्थ से ज्यादा का धन दीप पर्व को उल्लास पूर्वक मानाने में खर्च किया | व्यापारिक वर्ग ने एक तरफ जहा जम के कमाई कि वही दूसरी तरफ इन्ही व्यापारियो ने अधिकारिओ के घर जा जाकर मिठाई ,आतिशबाजी और मेवा , कपडे आदि उपहार स्वरुप रिश्वत भेट की | यही नहीं तमाम कमाई वाली जगह पर नियुक्त सरकारी कर्मचारी व अधिकारिओ ने भी अपने उच्च अधिकारिओ को भेट देने में कोई कोताही नहीं रखी | दीपावली का असली आनंद तो नौकरशाह , पूंजीपतियो , व्यापारियो ने जम कर उठाया | यही नहीं राजनीतिज्ञों ने भी दीपावली का जमकर उपभोग किया | दीप पर्व के बहाने जन संपर्क किया , बड़ी बड़ी होर्डिंग्स लगवाकर बधाई सन्देश दिया | जिन लोगो ने कभी किसी का भला नहीं किया वो भी बधाई संदेशो और विज्ञापनों के द्वारा बधाई देते नज़र आये | राजनीति में नेपथ्य में पड़े जनाधार विहीन , असामाजिक तत्वों ने भी आने वाले विधान सभा चुनावो को ध्यान में रखते हुये दीप पर्व की बधाई आम जनता को दे डाली | अपने पास अनैतिक तरीके से जमा किये गये धन का प्रयोग अब विभिन्न पर्वो में बधाई संदेशो और समाचार पत्रों में विज्ञापनों को देने में करने में ये तत्त्व तनिक भी गुरेज़ नहीं करेंगे | मीडिया जगत भी ऐसे तत्वों के शोषण का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता है | सिर्फ चुनावी बेला में बधाई देने वालो के मंसूबो को भांप के आम जनता और मिडिया जगत दोनों भरपूर आर्थिक दोहन करने के इंतज़ार में इन तत्वों का हौसला अफजाई कर रही है |

Saturday, October 22, 2011

स्वार्थी,जनाधार विहीन ,विचार विहीन और सत्ता के दलाल प्रवृति के लोगो से समाजवादी संघर्ष को खतरा

अरविन्द विद्रोही समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश यादव -सांसद की वर्तमान सरकार की जनविरोधी नीतिओ ,मनमाने-पन के खिलाफ निरंतर पुरे प्रदेश में क्रांति रथ से , साइकिल से यात्रा के कार्यक्रम ने व्यापक जन समर्थन जुटा लिया है और जन संघर्ष व समाजवादी आन्दोलन के युवा कंधो की मजबूती को साबित करने में रात दिन एक कर रहे है |काबिल-ए -तारीफ है समाजवादी आन्दोलन व संघर्ष के नव प्रतीक बन कर उभरे समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश यादव का यह प्रयास | युवा समाजवादी अखिलेश यादव को जन संघर्ष खड़ा करने की इस मुहीम में सर राम मनोहर लोहिया की बातो का पूरा ध्यान भी रखना और उसका अनुपालन भी करना और करवाना चाहिए | डॉ लोहिया के विचारो की रौशनी अखिलेश यादव की अपनी राजनीतिक जीवन की तरक्की-बेहतरी के लिए कारगर ही साबित होगी, इसमें कोई शक सुबहा की लेश मात्र भी गुंजाइश नहीं है | डॉ राम मनोहर लोहिया समाजवादी विचारधारा की वो अखंड ज्योति है जिसकी रौशनी में धरती-पुत्र मुलायम सिंह यादव ने अपनी संघर्ष की राजनीति को परवान चढ़ाया | डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था -- एक तरफ वे लोग जो कि आन्दोलन के उद्देश्यों के लिए तकलीफ उठाते है ,दूसरी तरफ वे लोग जो आन्दोलन के सफल होने के बाद उसके हुकुमती काम-काज को चलते है | और आप याद रखना कि ये संसार के इतिहास में हमेशा ही हुआ है |लेकिन इतना बुरी तरह से कभी नहीं हुआ जितना की हिंदुस्तान में हुआ है | और मुझे खतरा लगता है कि कही सोशलिस्ट पार्टी कि हुकूमत में भी ऐसा ना हो जाये कि लड़ने वालो का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक़्त आये तब दूसरा गिरोह आ जाये | डॉ लोहिया कि यह चिंता दुर्भाग्य वश समाजवादी पार्टी के शासन काल में अमर प्रभाव के चलते वाजिब साबित हुई और जिसका खामियाजा भी सपा ने भुगता | बा मुश्किल सत्ता कि दलाली करने वाले गिरोह के मुखिया से सपा को निजात मिला और तब सपा के विचारधारा आधारित नेताओ व कार्यकर्ताओ को एक असीम सुख-आनंद की अनुभूति हुई थी | क्रांति रथ के माध्यम से जन संवाद , जन संपर्क पर निकले अखिलेश यादव को अपने इर्द-गिर्द लगातार बने रहने वाले चापलूस,जनाधार विहीन,फरेबी,दलाल प्रवृति के लोग ना जमने पाए यह विशेष ध्यान देना होगा | ऐसे स्वार्थी तत्वों कि शिनाख्त करके जो अपने अपने विधान सभा में प्रत्याशियो की मदद करने के बजाय उनके आगे पीछे घुमा करते है उनको तत्काल हटा देना चाहिए | नेतृत्व के अगल बगल रहकर चित्र खिचवा के विधान सभा का टिकेट कटवाने -दिलवाने का खेल भी चल रहा है यह ध्यान देना अखिलेश यादव के लिए जरुरी है | लोकतंत्र में किसी को भी विजय श्री मतदाताओ के द्वारा मत दिये जाने के कारण ही होती है | मतदाता संगठन के ,संगठन के नेताओ के विचार ,क्रिया कलाप व संघर्ष के कारण अपना समर्थन व अमूल्य मत देकर प्रत्याशी को विजयी बनाता है | युवा समाजवादी संघर्ष के प्रतीक अखिलेश यादव को अपने साथ सिर्फ विचारवान , संघर्ष शील युवा साथियो को ही रखना चाहिए | क्रांति रथ यात्रा के प्रारंभिक चरण में ही समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ़ कहा था कि विधान सभा के घोषित सभी प्रत्याशी सिर्फ अपने अपने विधान सभा के कार्यक्रमों में ही भागीदारी करे ,चुनाव कार्य में जुटे ,मतदाताओ के बीच बने रहे और चुनाव जीतने के बाद लखनऊ आये | पार्टी नेतृत्व को ध्यान देना चाहिए की क्या उसकी बातो पर तनिक भी ध्यान दिया जा रहा है? वो कौन लोग है जो स्पष्ट निर्देशों के बाद भी धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के प्रेरणा पुंज डॉ राम मनोहर लोहिया और छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र के चित्र व जिक्र तक से परहेज़ कर रहे है | अब समाजवादी पार्टी के संगठन को , नेतृत्व को खुद , अखिलेश यादव को संगठन व पार्टी के घोषित प्रत्याशियो की होने वाली बैठक में उपरोक्त बिन्दुओ को संज्ञान में लेकर कड़े निर्देश जारी करने चाहिए | अंत में एक बात सब से जरुरी हर जगह अपना फोटो साथ में खिचवाने वाले और जगह जगह आलाकामान से निजी रिश्ते होने की बात कहने वाले चन्द एक लोगो को अपने से दूर अखिलेश यादव हटाते है या उनसे गलबहिया करके उन लोगो के द्वारा कही जा रही तमाम बातो को पुख्ता करते है | सभी विपक्षी दलों सहित मिडिया की भी नज़र इस समय अखिलेश यादव व उनके इर्द गिर्द के लोगो पर यह यह बात सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव को नहीं भुलाना चाहिए | अतीत की गलती ना दुहराने से भविष्य सँवरता ही है |

Tuesday, October 18, 2011

पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के विरोधी ,समाजवादी -देशभक्त ,सच्चे आशिक थे मजाज़ अरविन्द विद्रोही

१९ अक्टूबर ,१९११ को रुदौली तत्कालीन अवध प्रान्त वर्तमान में फैजाबाद जनपद में चौधरी सिराजुल हक़ के पुत्र रूप में जन्मे असरारुल हक़ ने उस दौर में अपनी आँखे खोली थी जब भारत भूमि ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की बेड़ियो में जकड़ी थी | आवाम एक दीवाने की तरफ अपनी महबूबा यानि आजादी को हासिल करने के लिए तड़प रही थी | अपनी महबूबा को पाने के लिए दिवानो ने जान ली भी और जान दी भी | पूंजीवादी - साम्राज्यवादी व्यवस्था और ब्रितानिया शोषण - दासता विरोधी उभर व जंग से असरारुल हक़ उर्फ़ शहीद उर्फ़ मजाज़ की शायरी पुख्ता होने लगी | भाई अंसार जो की आजाद भारत में सांसद रहे और १९९६ में जिनका इंतकाल हुआ तथा तीन बहनों क्रमशः आरिफा खातून , साफिया खातून , हामिद सालिम के अज़ीज़ मजाज़ कालांतर में शायरी के शौकीनों और कलमकारों के आँखों के तारे बन गये | रुदौली से लखनऊ , लखनऊ से आगरा , आगरा से अलीगढ तक का सफ़र मजाज़ ने शैक्षिक योग्यता हासिल करने के लिए किया | अमीनाबाद इंटर कॉलेज-लखनऊ से हाई-स्कूल , सैंट जोंस कॉलेज -आगरा से इंटर , अलीगढ विश्व -विद्यालय से बी ए पास करने वाले मजाज़ हाकी के एक बेहतरीन खिलाडी भी थे | मजाज़ को कॉलेज में ही हुये एक मुशायरे में बेहतरीन ग़ज़ल पेश करने के कारण गोल्ड मेडल दिया गया था | मजाज़ एक देश भक्त , दीवाने शायर थे | बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न मजाज़ की शायरी की बेबाक टिप्पणिया मजाज़ के अंतर्मन में व्याप्त प्यार , करुना , संवेदना , देश प्रेम और मज़लूमो के प्रति उनकी सोच को दर्शाती हैं |मिल मालिको के मुशायरो में शिरकत की जगह मजदूरों के द्वारा आयोजित मुशायरे में शिरकत करने व तवज्जो देने वाले समाजवादी विचार धारा के मजाज़ ने गुलाम भारत में जन्म लिया और दुर्भाग्य वश बिना समाजवादी राज्य निर्माण का सपना पूरा होते देखे आजाद भारत में ५ दिसम्बर , १९५५ को उपेक्षा व मानसिक तनाव का शिकार हो कर काल के हाथो शिकार हो गये | मजाज़ की शायरी में स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन (पहला जश्ने आजादी ), पूंजीवादी व्यवस्था का पुरजोर विरोध (मुझे जाना है एक दिन ,आहंगे जुनू ,सरमायादारी ) . शोषण की खिलाफत व करुना -संवेदना (इन्कलाब ,दिल्ली से वापसी ,एक जलावतन की वापसी,खाना बदोश ,नौजवान ) , धार्मिक समानता (ख्वाबे सहर , इशरते तन्हाई ) , गाँधी के प्रति श्रधान्ज़ली (सानिहा ) पढ़ते ही मजाज़ की वैचारिक दृठता व विस्तारिता परिलक्षित होती है| माजदा असद के शब्दों में --- मजाज़ जीवन को लतीफा समझते थे | संभवता यह चुटकुले ही उनके जीवन के रंजो गम को भुलाने या उन पर पर्दा डालने में मदद करते थे | उन्होंने अपने अन्दर के दुखो को भुलाने के लिए लतीफो का सहारा लिया | और आखिर मजाज़ को कौन स गम सताता था ? मजाज़ की बहन हमीदा सालिम लिखती है कि --- मजाज़ मेरा भाई एक नाटकिये ढंग से जीवन में उभरा और फिर इसी ढंग से डूब गया | इसके जीवन का आरम्भ साहस और उमंगो से भरा था लेकिन अंत अभावों और निराशा से घिर कर हुआ | वह जीवन को प्रकाशमय देखने की उम्मीद करता रहा और उसका जीवन धीरे धीरे अंधकारमय होता गया |उसने जीवन को अपनी तहरिकी क़ाबलियत की संपत्ति सौपी ,अपनी शायरी दी , जिसमे इस ब्रह्माण्ड को सुन्दर बनाने का साहस है, भविष्य को संवारने की उमंगें हैं,यौवन की जौलानी है,अनुभव का चिन्ह है ,चेतना है ,तड़प है,अशांति है ,सुन्दरता है ,सफाई है,सादगी है,लेकिन जीवन ने उसे परेशानिया तथा शर्मिंदगी दी ,उलझने ,छटपटाहटें दी,वह जीवन से प्यार मांगता रहा ,प्रसन्नता मांगता रहा ,चैन मांगता रहा ,खुशहाली मांगता रहा परन्तु जीवन धीरे-धीरे उससे दूर होता चला गया कि यहाँ तक जीवन की फसल को अपने लहू से सींचने वाले शायर को मौत की बाँहों में सोना पड़ा |वे आगे लिखती है कि मजाज़ को आगरे में फानी का पड़ोस तथा कॉलेज में ज़ज्बी का साथ मिला |शिक्षा का पतन और शेरो-शायरी के दौर का उत्कर्ष शुरु हुआ |कॉलेज पत्रिका के संपादक बने | दिल्ली रेडियो-स्टेशन में इसी समय नौकरी लगी |अलीगढ में गुजारा गया समय जग्गन भैय्या के जीवन का सबसे प्रकाशमय काल है,अधिकतर अच्छी कवितायेँ इसी काल में लिखी गयी | सरदार भाई,सत्ते भाई, भाई अंजान सब एक समूह से थे |मजाज़ जिसके पास तलवार की-सी तेज़ी और संगीत की-सी कोमलता दोनों ही है,जिसके ह्रदय में बागी की आग ,जिसकी रंगों में यौवन का उत्स ,जिसके कंठ में नगमा-ए-संज काफर था,जिसने क्रांति के नारे लगाने के स्थान पर क्रांति के राग गाये- वह मजाज़ शिक्षको का प्रिय ,विद्यार्थियो के लिए गर्व ,लडकियो के लिए चाहत था | अलीगढ से दिल्ली रेडियो स्टेशन की नौकरी के दौरान दिल्ली में ठहरने के दौरान मजाज़ ने दिल पर ऐसी चोट खायी जिसका घाव कभी ना भर सका| हमीदा आगे लिखती है ,-- मजाज़ ने अपने लिए घर वालो के लिए , समाज के लिए प्रेम किया ,ऐसा गहरा तथा घनिष्ठ कि अंतिम समय तक यह प्रेम इनके साथ रहा परन्तु भाग्य का खेल देखिये कि हाथ भी बढाया तो निषिद्ध वृझ की तरफ | दिल्ली की चोटी के खानदान की इकलौती पुत्री चंचल ,सुन्दर,नटखट ,लाड-प्यार में पली,सुख-ऐश्वर्या की और भारी -भरकम संपत्ति की स्वामिनी ,जो भी कहें ,ये बेल मंडवे चढ़ती तो कैसे ? परन्तु शायर चरणों में मोती बिखराता रहा,सिर पर फूल बरसता रहा और सिर्फ चन्द मुस्कानों की चाह रखता रहा |लेकिन बुरा हो उस समाज का , समाज की टेढ़ी-तिरछी कठोर दृष्टि से यह शायर घुट कर रह गया और उसका दिल टूट गया | सरदार जाफरी मजाज़ के गम की वज़ह को कुछ इस तरह बयान करते है,--- उसने उम्र भर में सिर्फ एक लड़की से मोहब्बत की और वह भी शादी शुदा थी | मजाज़ की मोहब्बत खामोश थी ,लेकिन शेरों से छलकी पड़ती थी | एक दिन उस घर का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया | अब सिर्फ शिकस्ता-दिली और बेकारी है| दिल में इन्कलाब और बगावत की आग जल रही है,जिसे शराब भी नहीं बुझा सकती ,बल्कि उस आग को और भड़कती है | सबसे पहला जाम उन महबूब हाथो से मिला था , जिन्हें मजाज़ ने कभी छूने की कोशिस नहीं ही | इस कैफियत में मजाज़ की सबसे हसीन और उस अहद की सबसे भरपूर नज़्म आवारा की तख्लीक हुई जिसमे मजाज़ के जाती गम ,उसके इंकलाबी एहसासात के साथ मिलकर एक हो गये हैं ------------ शहर की रात और मैं नाशाद व नाकारा फिरूँ जगमगाती जागती सडको पर आवारा फिरूँ गैर की बस्ती है ,कब तक दर ब दर मारा फिरूँ ए गेम दिल ,क्या करूँ ! ए वहशते दिल ,क्या करूँ ! असरारुल हक़ उर्फ़ मजाज़ इंसानियत के पुजारी,प्रगतिशील,आन्दोलन के कवि,समाजवादी सोच के प्रहरी तथा एक सच्चे आशिक थे |कृष्ण चंदर ने कहा था कि मजाज़ हमारे ज़माने और हमारी पीढ़ी का सबसे ज़हीन ,बालिग नज़र और ज्याला शायर था | इस्मत चुगताई के अनुसार - लड़कियां मजाज़ के नाम के पर्चे निकल के खुश होती हैं | और हम सबके मजाज़ ने सिर्फ एक बार मोहब्बत की और उसी नाकाम मोहब्बत की दीवानगी को निभाते निभाते इस ज़माने से चले गये |

Monday, October 17, 2011

सरकार महाभ्रष्ट व उसके विधायक-मंत्री लुटेरे है -- सरवर अली ,पूर्व विधायक





बाराबंकी | कमर तोड़ महंगाई ,भयंकर भ्रस्टाचार , जातिवाद , फिरकापरस्ती , राजनितिक गिरावट के विरुद्ध संघर्ष की रूप रेखा तैयार करने के लिए बाराबंकी जनपद की कुर्सी विधान सभा के इसरौली बाज़ार -फतेहपुर में दिनांक १६ अक्टूबर , दिन रविवार को दोपहर ११ बजे से स्थानीय नागरिको की एक निर्णायक सभा आयोजित की गयी | इस निर्णायक सभा की अध्यक्षता जनाब हाजी उस्मान गनी साहब तथा संचालन सुफियान अख्तर - पूर्व जिला पंचायत सदस्य ने किया | निर्णायक सभा के मुख्य वक्ता समाजवादी सोच व पृष्ठ भूमि के जन नेता सरवर अली - पूर्व विधायक थे | इस निर्णायक सभा को संबोधित करने वाले प्रमुख लोगो में सरवर अली , मौलवी मोइद्दीन , जनाब सगीर अंसारी , गयास मियां , शब्बू खान , डॉ तौफीक अहमद , पंडित सुनील तिवारी , रफ़ी अंसारी , शकील बेलहरवी , मास्टर वीरेन्द्र विक्रम सिंह , जुम्मन अंसारी , रमेश यादव , रईस खान , विश्राम यादव , नेता राम लाल यादव , लल्लन प्रधान , कौशल बी डी सी , हाजी अबरार , कौशल वर्मा , मो फारुख , केदार नाथ मिश्र , मास्टर हरी राम यादव , गणेश यादव , मो अय्यूब तथा पंडित बलराम थे | सभी वक्ताओ ने अपने संबोधन में सरवर अली से विधान सभा का आगामी चुनाव लड़ने को कहा | सभा में उपस्थित स्थानीय नागरिको ने चुनाव लड़ने की मांग का पुरजोर समर्थन किया | निर्णायक सभा में उमड़ी हजारो किसानों-मजदूरों-युवाओ -स्थानीय नागरिको को संबोधित करते हुये मुख्य वक्ता सरवर अली-पूर्व विधायक ने कहा कि कृषि आधारित भारत देश में पहले से ही परेशान व जेरबार किसानों को उनकी उपज के सही मूल्य ना मिल पाने , खेती में उपयोग होने वाली समस्त सामग्री उर्वरक , बीज , डीज़ल , कीटनाशक दवा के दामो में चल रही लगातार बढ़ोत्तरी तथा समय से बिजली व नहरों में पानी ना मिल पाने के कारण किसान और भी परेशान और जेरबार होता जा रहा है | स्थानीय नागरिको की भारी उपस्थिति से उत्साहित सरवर अली ने समाजवादी चरित्र व तेवर में बोलते हुये कहा कि वर्तमान बहुजन समाज पार्टी कि सरकार महा भ्रष्ट सरकार है | ऐसी सरकार दुबारा ना बने यह मै चाहता हूँ| आज केंद्र व प्रदेश कि सरकारों ने लूट मचा रखी है | दोनों के मंत्री जेल में है और बेशर्मी पूर्वक सरकारे चल रही है | बाराबंकी जनपद के हालातो को भयावह करार देते हुये सरवर अली ने कहा कि राजनीतिक चरित्र में गिरावट के चलते बसपा सरकार के मंत्री से पुलिस का सिपाही रिश्वत दिलाने कि बात कहता है | सत्ता धारी बसपा कि वर्तमान स्थानीय विधायिका को दलित-जनविरोधी बताते हुये कहा ही ये राजनीतिक बदले की भावना से काम करती है | राजनीतिक विरोधियो को परेशान करना इनका शगल है | अधिकारिओ पर दबाव बना कर , उनसे मिली भगत कर के जनता की मेहनत की कमाई को यहाँ लुटा जा रहा है | ६० % से ज्यादा कमीशन खोरी की बात आम जन चर्चा में है | स्थानीय पुलिस की मनमानी की मनमानी का विवरण देते हुये मंच से ही सार्वजनिक रूप से पुलिस कर्मचारियो - अधिकारिओ को सुधर जाने व जनता को नाजायज़ परेशान आईंदा ना करने की चेतावनी देते हुये सरवर अली ने कहा कि अब जुल्म, नाइंसाफी बर्दाश्त के बाहर हो गयी है | कानून का पालन पुलिस वाले और सरकारी कर्मचारी भी करे अन्यथा उनको जनता सबक सिखाएगी ,उनका चालान काटेगी | अंत में सभा के संचालक सुफियान अख्तर ने सभी का हार्दिक धन्यवाद दिया तथा कहा कि अपनी सरज़मी के लिए काम करना , संघर्ष करना हमारी पहचान रही है | अपने पुरखो से मिली गरीबो , वंचितों, पिछडो , मज़लूमो , दलितों की सेवा कि विरासत व जिम्मेदारी को हम हमेशा निभाते रहे है और आगे भी निभाते रहेंगे | जन संघर्ष में ना हम कभी पीछे रहे है और ना आगे कभी पीछे रहेंगे |

Saturday, October 15, 2011

लोहिया और जयप्रकाश नारायण मधु लिमये की नज़र में-अरविन्द विद्रोही -

स्वतन्त्र भारत की राजनीति और चिन्तन धारा पर जिन गिने -चुने लोगो के व्यक्तित्व का गहरा असर हुआ है , उनमे डॉ राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण प्रमुख रहे हैं | भारत के स्वतंत्रता युद्ध के आखिरी दौर में दोनों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है | हजारीबाग जेल से जयप्रकाश के बाग़ जाने की घटना ने चिंगारी का काम किया और इस एक घटना के कारण जयप्रकाश की लोकप्रियता बहुत बढ़ गयी | भूमिगत आंदोलनों को प्रज्ज्वलित करने में लोहिया की भूमिका कार्यक्रम और विचार की दृष्टि से असाधारण था | भूमिगत रेडिओ की कल्पना को उषा मेहता और उनके साथियो की मदद से डॉ लोहिया ने ही साकार किया था | सुचेता कृपलानी जैसी गाँधी वादी और अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादी , इनके बीच की कड़ी लोहिया ही थे समाजवादी नेता समझते थे कि महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरु में जवाहरलाल अपेक्षतया ज्यादा प्रगतिशील और वामपंथी हैं | उनकी यह भी धारणा थी कि नेहरु गाँधी और सुभाष चन्द्र बोष से ज्यादा आधुनिक हैं| लोहिया का यह सम्मोहन १९४२ से ही टूटने लगा था और गाँधी जी की हत्या के दिन तक पूरी तरह टूट चुका था | लेकिन जयप्रकाश का मोह आखिर तक नहीं टूटा | जयप्रकाश के मन में नेहरु के प्रति गहरा प्रेम था , वे नेहरु के परिक्रमा पथ से कभी नहीं निकल पाए | लोहिया का आत्म परीक्षण समाजवादी दल के मुल्यांकन की दृष्टि से महत्व पूर्ण है | जहा तक अशोक मेहता , जयप्रकाश आदि का सवाल है , उनमे निश्चित ही धीरज की कमी रही | जय प्रकाश सदभाव से ओत-प्रोत थे | लोहिया की तरह उनमे भी सत्ता-पिपासा लेश मात्र नहीं थी, मगर उनमे विचारो की स्पष्टता नहीं रहती थी | वे अगल-बगल के लोगो से जल्दी प्रभावित हो जाते थे | साथ ही , किसी भी विवादस्पद प्रश्न पर स्पष्ट राय देने तथा उस पर अड़े रहने में जय प्रकाश को हिचक होती थी | चाहे सुभाष चन्द्र बोस के दुबारा अध्यक्ष पड़ का चुनाव लड़ने की बात हो , या त्रिपुरी कांग्रेस के बाद हुये मतभेदों का प्रश्न , चाहे कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में अपनाये गये रुख का सवाल , किसान मजदूर प्रजा पार्टी के साथ विलीनीकरण की समस्या हो या कांग्रेस के साथ सहयोग का विवाद जय प्रकाश अक्सर ढुलमुल नीति अपनाते थे , अपना मत नहीं बना पाते थे | लोहिया इन तरीको से बहुत नाराज़ रहते थे | जय प्रकाश दल के महामंत्री थे | किसी बड़े संगठन को चलाने के लिए लचीलेपन की , समझौते की जरुरत होती है | जय प्रकाश ने लोहिया से कहा था -- आखिर तुमने मुझको दल का महामंत्री बना रखा है तो महामंत्री को यह सुविधा होनी चाहिए कि वह आखिर में बोले , सबकी राय सुनकर , आखिर सबको साथ लेकर चलना है | लोहिया कुछ हद तक जय प्रकाश कि बात सही मानते थे | लोहिया चिंतन-मनन वाले आदमी थे | लेकिन वे क्रांति शुन्य नेता नहीं थे , सृज़न शील चिंतन के साथ तमाम जन आन्दोलन कि अगुवाई की | लेकिन संगठन बनाने का एक अलग कौशल होता है | लोहिया खुद मानते थे कि उनमे ना इस तरह का कौशल है और ना ही इस तरह के काम के प्रति आस्था | १९५५ के बाद दो तीन साल तक संगठन बनाने का प्रयोग लोहिया ने किया लेकिन सफलता नहीं मिली | लोहिया को चाह थी सिर्फ दिमागी नेतृत्व की | जय प्रकाश कुशल संगठन कर्ता थे | कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना काल से संगठन की जिम्मेदारी जय प्रकाश ने संभाली | जय प्रकाश के व्यक्तित्व में करिश्मा था | १९५२ के चुनावो में समाजवादी दल की हार के बाद जय प्रकाश का मन दल से दूर हटने लगा | चुनावी हार को व्यक्तिगत पराजय मन वे भूदान की तरफ , विनोबा भावे की विचार धारा की ओर मुड़े | अनशन आदि के आध्यात्मिक प्रयोगों में वे उलझ गये | इसी बीच नेहरु ने जय प्रकाश को एक पत्र लिख कर दिल्ली आकर सहयोग-वादी बात चीत का न्यौता दिया , बात चीत का सिलसिला शुरु हुआ | जय प्रकाश में हुये इन परिवर्तनों को लोहिया पसंद नहीं करते थे | पंच मढ़ी सम्मेलन १९५२ में जय प्रकाश की कार्यकर्ताओ ने जन संघर्ष के मोर्चे पर पहल ना करने पर आलोचना की | जय प्रकाश के मन में जवाहर लाल की सरकार के बारे में गुस्सा नहीं था जो बाद में इंदिरा सरकार के बारे में उनके मन में पैदा हुआ | अतः नेहरु के समय में सरकार से जूझने के लिए , टक्कर लेने के लिए जो चिंगारी , जो प्रखरता होनी चाहिए , वह उत्पन्न नहीं हो पाई | लोहिया इस बात को लेकर दुखी हो जाते थे कि उनके द्वारा इतने आन्दोलन चलाये गये , इतने विचार दिये गये , लेकिन इसका श्रेय उन्हें कभी नहीं मिला | १९५७ से लोहिया निरंतर कोशिश करते रहे कि जय प्रकाश राजनीति में वापस आये | लोहिया की बातो और कोशिशो का उस समय कोई असर जय प्रकाश पर नहीं पड़ा | जय प्रकाश ने यहाँ तक कहा कि देश को इस तरह हिलाने कि प्रक्रिया पर ना उनका विश्वास है , ना इस तरह के काम में उनको कोई रूचि है | समाजवादी आन्दोलन का यह दुर्भाग्य रहा कि जय प्रकाश - लोहिया के बीच मतभेदों के कारण दोनों का व्यक्तित्व व गुण परस्पर पूरक होते हुये भी आपसी सहयोग का सिलसिला टूट गया | अफ़सोस इस बात का था कि समाजवादी आन्दोलन में परिवर्तन की गाड़ी को जय प्रकाश - लोहिया रूपी बैलो को जोड़ने वाला कोई गाँधी नहीं था | जो काम लोहिया चाहते थे कि जय प्रकाश करे और जिसे करने में राम मनोहर लोहिया के जीवन काल में जय प्रकाश ने इंकार किया , वही काम उन्होंने १९७४ के बाद किया | लोहिया का बस चलता तो वे कांग्रेस का तख्ता १९६७ में ही उलट देते | जय प्रकाश ने जब यह काम संभाला तब तक समाजवादी आन्दोलन विघटित होते होते अत्यंत कमजोर हो गया था | देश की राजनीति को नयी दिशा देने या देश के आर्थिक-सामजिक ढांचे में बुनियादी तबदीली लाने की उसकी छमता ख़त्म हो चुकी थी | लोहिया में निर्भीक बन आत्म परीछन करने का बड़ा गुण था | लोहिया सम दृष्टि वाले थे | जय प्रकाश में सम दृष्टि का अभाव था | धनी-मानी और बड़े लोगो से वे प्रभावित हो जाते थे | उनके व्यवहार में फर्क आ जाता था | लोहिया और जे पी दोनों पर गाँधी का प्रभाव था | लोहिया का व्यक्तित्व लुभावना होते हुये भी प्रखरता थी , शब्द तीखे होते थे | भावना का वे ख्याल नहीं रखते थे | जय प्रकाश का स्वाभाव सौम्य था , व्यक्तित्व में मिठास थी | वे म्रदु भाषी थे , वे किसी को जल्दी नाराज़ नहीं करते थे | दोहिया का डालिए प्रणाली व लोकतंत्र में पूर्ण विश्वास था | वे लोकतंत्र को हर प्रकार से समृद्ध बनाना चाहते थे और जय प्रकाश राष्ट्रीय सहमति , दल हीन लोकतंत्र , दल विहीन राजनीति आदि अवास्तविक कल्पनाओ के शिकार थे | लोहिया की सप्त क्रांति और जय प्रकाश की संपूर्ण क्रांति में अंतिम उद्देश्यों को लेकर कोई फर्क नहीं | जे पी सप्त क्रांति को ही सम्पुर्न्य क्रांति मानते थे | प्रखर राष्ट्रीयता के प्रवक्ता लोहिया सिकुड़ने वाले राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं थे | लोहिया और जय प्रकाश के आदर्श उतुंग थे | नागालैंड , कश्मीर , बांग्ला देश आदि के प्रश्नों के बारे में जय प्रकाश द्वारा की गयी पहल उनकी आदर्श वादिता का उत्तम सबूत है | लोहिया की अपनी एक सम्यक- दार्शनिक दृष्टि थी और जय प्रकाश के व्यक्तित्व में गज़ब का जन -आकर्षण | डॉ लोहिया ने १९५४ में ही जय प्रकाश को पत्र लिखा था ---- देश की जनता का तुमसे लगाव है , तुम चाहो तो देश को हिला सकते हो , बशर्ते देश को हिलाने वाला खुद ना हिले |

Tuesday, October 11, 2011

समाजवादी दलों की एका ही डॉ लोहिया-जय प्रकाश नारायण को सच्ची श्रधांजलि

अरविन्द विद्रोही १२ अक्टूबर , १९६७ को समाजवाद के प्रखर प्रवक्ता , युग दृष्टा डॉ राम मनोहर लोहिया की आत्मा ने नश्वर शरीर त्याग कर दिया था | आज डॉ लोहिया स-शरीर भले ही ना हो लेकिन उनके विचार , उनका चिंतन , उनकी राष्ट्र परक , आम जन हित की सोच एक अनमोल विरासत के रूप में हमारी धरोहर के रूप में विद्यमान है | चिर सत्याग्रही , अन्याय का प्रतिकार तत्काल करने वाले क्रांति के मतवाले डॉ लोहिया समाजवादी आन्दोलन के जरिये भारतीय राजनीति से कांग्रेस की भ्रष्ट सरकारों को उखाड़ फैकने की अदम्य इक्छा शक्ति रखते थे | जयप्रकाश नारायण ने भले ही डॉ लोहिया के जीवन काल में उनकी यह इक्छा ना मानी हो लेकिन १९७७ में जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेसी सरकारों को धूल चटा कर लोहिया की बात मानी जरुर | और डॉ लोहिया तो कहते ही थे कि -- लोग मेरी बात सुनेंगे जरुर लेकिन मेरे मरने के बाद | आज ना तो गाँधी है , ना जयप्रकाश और ना ही डॉ लोहिया | आज के दौर में करतार सिंह सराभा , रास बिहारी बोस , भगत सिंह , आजाद , अशफाक , सुभाष सरीखे क्रांतिकारी भी नहीं है | आज आम जन हित चिंतन की जगह स्वयं हित चिंतन या समूह हित चिंतन को प्राथमिकता दी जा रही है | भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकारों का चरित्र आम जन विरोधी ही साबित होता रहा है | तानाशाह सरकारों के विरुद्ध अनवरत सत्याग्रह चलाने की मंशा रखने वाले डॉ लोहिया की आत्मा को इधर कुछ सुकून तो मिला ही होगा | भ्रस्टाचार में सरोबोर सरकारों के खिलाफ आंदोलनों ने उम्मीद जगाई है | जनता में आये उबाल को बनाये रखने के डॉ लोहिया की सप्त क्रांतियो पर ध्यान देना नितांत जरुरी है |नर-नारी समानता , रंग भेदों पर आधारित विषमता की समाप्ति , जन्म तथा जाती पर आधारित असमानता का अंत , विदेशी जुल्म का खात्मा तथा विश्व सरकार का निर्माण , निजी संपत्ति से जुडी आर्थिक असमानता का नाश और संभव बराबरी की प्राप्ति , हथियारों के इस्तेमाल पर रोक और सिविल नाफ़रमानी के सिधान्त की प्रति स्थापना तथा निजी स्वतंत्रताओ पर होने वाले अतिक्रमण का मुकाबला इन सात बिन्दुओ - विचारो के लिए संघर्ष ही समाजवादियो की पहचान है | लोहिया के चित्र-जिक्र व उनके विचारो को मूर्त रूप देने में लगा व्यक्ति ही डॉ लोहिया का सच्चा शिष्य हो सकता है , समाजवादी हो सकता है अन्यथा वो रंगे सियार या पाखंडी के सिवाय कुछ नहीं कहा कहा जा सकता है | डॉ लोहिया जीवन पर्यन्त अन्याय के खिलाफ प्रतिकार करते रहे | लोकतान्त्रिक अधिकारों के सिकुड़ने के खिलाफ सड़क-सदन के अलावा डॉ लोहिया ने अदालत का भी सहारा लिया | डॉ लोहिया एक मजबूत और बराबरी का समाज बनाने के लिए जीवन पर्यन्त लगे रहे | आज डॉ लोहिया को अपना आदर्श मानने वालो , उनके विचारो का अनुसरण कर्ता स्वयं को मानने वालो को एक जुट होना चाहिए | और यह एक जुटता किस लिए हो , यह भी समझ लेना चाहिए | प्रदेश-देश दोनों जगह की राजनीति में लाठी-गोली के जरिये जनता को , जनता की आवाज को दबाने-कुचलने वालो की सरकारे है | यह सरकारे पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों का प्रतिनिधित्व कर रही है | समाजवादी ताकतों को इन भ्रष्ट - जनविरोधी सरकारों को हटाने के लिए और ना सिर्फ हटाने के लिए वरन समाजवादी मूल्यों की , डॉ लोहिया के विचारो के अनुपालन करने वाली सरकार को बनाने के लिए एक साथ होना चाहिए | आज समाजवादी बिखरे है | सभी अपने-अपने मुगालते में है | डॉ लोहिया एक कर्म योगी थे | कर्म प्रधान , चिंतन शील व्यक्तित्व के धनी डॉ राम मनोहर लोहिया को सच्ची श्रधांजलि होगी -- समाजवादी विचार धरा के विभिन्न व्यक्तिओ व दलों का एकीकरण और समन्वय | उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति में बसपा सरकार के मुकाबिल समाजवादी पार्टी सड़क से सदन तक मजबूती से संघर्ष कर रही है | डॉ लोहिया के विचारो की पार्टी बनाने से शुरु हुआ मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफ़र तमाम उतार-चढाव के बाद आज पुनः जनता की उम्मीदों का केंद्र बिंदु बना है | समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव -सांसद एक बार पुनः क्रांति रथ यात्रा पर निकल चुके है | चार चरण की यात्रा में मिले व्यापक जन समर्थन ने सत्ताधारी बसपा को चौकन्ना व अन्य राजनीतिक दलों को अचंभित कर दिया है | समाजवादी पार्टी के युवा नेता अखिलेश यादव में सौम्यता के साथ साथ जुझारूपन का अनोखा मिश्रण देखने को मिल रहा है | डॉ लोहिया के विचारो की शिक्षा छोटे लोहिया स्व जनेश्वर मिश्र से ग्रहण करने वाले अखिलेश यादव के अन्दर जनता को आकर्षित करने की गज़ब की शक्ति देख कर बरबस लोकनायक जयप्रकाश नारायण याद आ जाते है | डॉ लोहिया के विचारो और जय प्रकाश नारायण के करिश्माई व्यक्तित्व का अनूठा मिश्रण बन के उभर रहे है अखिलेश यादव , यह समाजवादी आन्दोलन के लिए एक शुभ संकेत है | अब समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव को सभी समाजवादियो को, सभी समाजवादी दलों की एका की पहल करनी चाहिए | व्यापक जनाधार वाले नेता धरतीपुत्र माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी एका की पहल से , समाजवादी दलों की एका से उत्तर प्रदेश की विधान सभा २०१२ के ही नहीं वरन पुरे देश के चुनावो में समाजवादी पार्टी व सहयोगियो का परचम लहराएगा व डॉ लोहिया की समाजवादी एका के मनसूबे , आन्दोलन की मजबूती तथा समाजवादी राज्य की स्थापना का संकल्प पूरा होगा | निः संदेह यह कार्य डॉ लोहिया के विचारो की सबसे बड़ी जनाधार वाली पार्टी समाजवादी पार्टी की अगुआई व मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में ही होना संभव है और यह होना ही डॉ लोहिया-जय प्रकाश नारायण के प्रति सच्ची श्रधांजलि होगी समाजवादियो वादियो की तरफ से लोहिया - जय प्रकाश को |