Thursday, March 29, 2012

यूथ वेलफेयर सोसाइटी


यूथ वेलफेयर सोसाइटी के महासचिव दानिस सिद्धिकी अपने साथियों के साथ नव नियुक्त जिला अधिकारी बाराबंकी से मिलते हुये

Thursday, March 22, 2012

२३ मार्च - बलिदान व समाजवाद की एक यादगार - प्रेरक तारीख

अरविन्द विद्रोही ................. २३ मार्च , बलिदान व समाजवाद की एक यादगार - प्रेरक तारीख | २३ मार्च के ही दिन समाजवाद को नयी परिभाषा , नयी सोच और विचारो से कर्म तक के संघर्ष का नूतन पथ प्रदर्शित करने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था | डॉ राम मनोहर लोहिया का जन्म २३ मार्च , १९१० को हुआ | डॉ लोहिया का जन्म उस दौर में हुआ जब भारत ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था | भारत की तरुणाई गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का हर संभव प्रयास कर रही थी | डॉ लोहिया के जन्म से मात्र ५ वर्ष बाद २३ मार्च , १९१५ को भारत की आज़ादी के लिए छेड़े गये २१ फ़रवरी , १९१५ के विप्लव के अपराधी रहमत अली , दुदू खान , गनी खान , सूबेदार चिश्ती खान , हाकिम अली को उनके वतन भारत से दूर मलय स्टेट गाइड , मलय- सिंगापूर में वतन परस्ती के जुर्म में गोली से उड़ा दिया गया | पंजाब के लुधियाना जिले के हलवासिया गाँव के रहने वाले रहमत अली को जो कि फौज में हवलदार के पद पर मलय स्टेट गाइड में तैनात थे , को ग़दर पार्टी के प्रचारको ने २१ फ़रवरी , १९१५ के विप्लव से जोड़ा था | इस विप्लव के सूत्रधार कर्तार सिंह सराभा , रास बिहारी बोस , विष्णु गणेश पिंगले , शचीन्द्र नाथ सान्याल आदि थे | २३ मार्च , १९१५ के पश्चात् २३ मार्च , १९३१ को जंग ए आज़ादी की बलिवेदी पर भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव तीनो फांसी पर चढ़ा दिये गये | इनकी शहादत ने भारत के युवा मन को क्रांति पथ पर चलने को प्रेरित कर दिया | २३ मार्च , १९३१ के पश्चात् १९८८ में २३ मार्च के ही दिन पंजाब के क्रांति के गीत लिखने वाले अवतार सिंह पाशा को आतंक वादियो ने गोलियों से भून दिया था | साहित्य के माध्यम से जन चेतना जगाने का बीड़ा उठाने वाले पाशा की रचनाएँ राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन को स्वर देती है | इनकी रचनाओ ने सरकार तथा शोषक वर्ग दोनों के हितो को प्रभावित किया | २३ मार्च , १९१० को राम मनोहर लोहिया का जन्म - २३ मार्च ,१९१५ को रहमत अली , दुदू खान , गनी खान , सूबेदार चिस्ती खान , हाकिम अली का बलिदान - २३ मार्च ,१९३१ को भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव को फांसी तथा २३ मार्च , १९८८ को आतंवादियो द्वारा क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाशा की गोलियों से भूनकर की गयी निर्मम हत्या इन सभी चार एतिहासिक घटनाओं ने २३ मार्च को प्रेरणा की श्रोत व तारीखों में महत्वपूर्ण तारीख बना दिया है | लोहिया से पाशा तक सभी दसो सपूतो ने अपना जीवन अपनी मात्र भूमि के लिए कुर्बान किया | भारत भूमि की माटी से जुड़े ये सभी बलिदानी व्यवस्था परिवर्तन के हिमायती थे | समाज के निचले पायदान पर रह गये वंचितों की गैर बराबरी के खात्मे के हिमायती तथा मानव के द्वारा मानव के शोषण की खिलाफत करने में भगत सिंह , लोहिया और पाशा ने कोई कसर नहीं रखी | साम्राज्य वाद और पूंजी वाद के स्थान पर समाजवाद की परिकल्पना संजोये ना जाने कितने प्रेरक लेख व गीत इन्होने लिख डाले | जगह जगह २३ मार्च के उपलक्ष्य में आयोजन होते है | समाजवादी चरित्र के लोगो की निगाहें इस बात उत्तर प्रदेश पर केन्द्रित है | अपने को डॉ लोहिया के विचारो की पार्टी मानने वाली समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के हालिया विधान सभा चुनावो में २२४ विधायक निर्वाचन के पश्चात् स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना चुकी है | उत्तर प्रदेश में गठित समाजवादी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी अखिलेश यादव - प्रदेश अध्यक्ष , सपा ने संभाली है | उम्मीदों की साइकिल पर सवार होकर अखिलेश यादव ने बसपा सरकार के तानाशाही - मनमाने शासन के खिलाफ जबरदस्त संगठन करके , जन संघर्ष खड़ा करके जो विश्वास अर्जित किया है , उसको बरक़रार रखना ही सर्वाधिक दुष्कर चुनौती है | अपने को एक समाजवादी चरित्र का , डॉ लोहिया के विचारो का सच्चा सेनानी साबित करने की चुनौती है अब - अखिलेश यादव के सम्मुख | खुद को डॉ लोहिया का , समाजवाद का अनुयायी बनाने व साबित करने के लिए किसी को भी लोहिया को , समाजवाद को मन से , कर्म से और वचन से आत्म सात करना पड़ेगा | अखिलेश यादव के अन्दर विचारो के प्रति दृढ़ता के बूते ही जनता को आकर्षित करने की छमता बढ़ी है | समाजवादी मूल्यों के प्रति दृठता में लचीलापन जनविश्वास और जन आकर्षण में कमी ही उत्पन्न करेगा ,यह तथ्य सदैव समाजवादी नेतृत्व को ध्यान में रखना चाहिए | समाजवादियो की आशाव के केंद्र बिंदु बनके उभरे अखिलेश यादव को डॉ राम मनोहर लोहिया की यह बात कि --- मुझे खतरा लगता है कि कही सोशलिस्ट पार्टी कि हुकूमत में भी ऐसा ना हो जाये कि लड़ने वालो का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक़्त आये तब दूसरा गिरोह आ जाये | लोहिया स्मृति से एक प्रसंग मन को उद्वेलित करता है | कितने महान व संवेदन शील थे - डॉ लोहिया , इसकी बानगी इस प्रसंग से पता चलती है | एक बार २३ मार्च को होली का पर्व पड़ा तब डॉ लोहिया ने बदरी विशाल पित्ती से कहा था - (यह दिन अच्छा नहीं है | मेरे लिए ख़ुशी का नहीं है और टीम लोगो के लिए भी नहीं होना चाहिए | आज २३ मार्च है , आज ही मेरे नेता भगत सिंह को फांसी हुई थी | ) डॉ राम मनोहर लोहिया के अधूरे पड़े संकल्पों को पूरा करने कि दिशा में , उनके विचारो को प्रचारित-प्रसारित करने की दिशा में , अमली जमा पहनने की दिशा में सार्थक कदम उठाने की नितांत आवश्यकता है | यह आवश्यकता समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने भी महसूस की थी | मुलायम सिंह यादव के ही शब्दों में --- वर्त्तमान परिवेश में लोहिया जी के आदर्श और विचार सर्वाधिक प्रासंगिक हो गये है | अतः इनका जन जन तक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए | वह लोक भोजन, लोक भाषा और लोक भूषा के प्रबल पक्षधर थे तथा उन्होंने जीवन पर्यत्न दलितों , शोषितों एवं पीडितो की लडाई लड़ी | २३ मार्च की इस प्रेरक तारीख पर लोहिया के लोगो के शासन को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के संकल्प के साथ बलिदानियो के सपनो का कल्याण कारी - समाजवादी राज्य स्थापित करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए |

Wednesday, March 21, 2012

समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पिछले साल मार्च में तीन दिवसीय जन आन्दोलन किया था , यह वह निर्णायक मोड़ था जिसके बाद पुरे प्रदेश में बसपा से नाराज़ जनता का मन सपा की तरफ बन गया | समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ के संघर्ष से बने जन समर्थन को भांप के तमाम नेता तत्काल सपा में शामिल हो गये और कई तो विधान सभा का टिकेट भी पा के निर्वाचित हो गये | समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को मंथन करना चाहिए और जिन कार्यकर्ताओ -नेताओ ने अपनी निष्ठा कभी ना बदली और संघर्ष में जेल गये ,लाठी खायी , यहाँ तक कि संगठन के पदों पे भी नहीं रहे ,अब प्राथमिकता के आधार पर उनको संगठन व सत्ता में जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए | जनपदों में तमाम नेता ऐसे है जो संगठन के जिम्मेदार पदों पर वर्षो से अहमियत पा रहे है और अब सत्ता में भी लाल बत्ती की जुगत लगाने में रात दिन एक किये है , इनकी मंशा संगठन विस्तार की ना होकर अपने व्यक्तिगत लाभ अर्जन की साफ़ तौर पर दिखती है | विधान सभा चुनावो के दौरान तमाम नेता दल बदल के सपा में शामिल हुये और ये दलबदल के आये सभी नेता सत्ता में मलाई काटने , विधान परिषद् सदस्य बनने या किसी आयोग का अध्यक्ष बनने , सदस्य बनने में अपनी लामबंदी कर रहे है | सपा नेतृत्व को मार्च आन्दोलन-२०११ के पश्चात् शामिल किसी भी नेता को लोकसभा २०१४ के पहले कोई भी लाभ का पद नहीं देना चाहिए | समाजवादी पार्टी के पुराने नेताओ-कार्यकर्ताओ को संगठन-सत्ता में जिम्मेदारी देने से समर्पित लोगो में विश्वास जागेगा | मार्च २०१४ के पश्चात् शामिल लोगो को संगठन के कामों में जुटाना चाहिए और २०१४ के लोकसभा चुनावो के पश्चात् जिन लोगो ने मेहनत से काम किया उनको तवज्जो देनी चाहिए | समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्य दलों से एन चुनावो के पहले शामिल लोग कही सत्ता का बेजा लाभ उठाने और दलाली करने में तो नहीं लगे हुये है | जनपदों में जिम्मेदार पदों पर नियुक्त लोगो,खासकर जिला अध्यक्ष , जिला महा सचिव , कोष अध्यक्ष को अभी लोकसभा २०१४ तक सत्ता में किसी जिम्मेदारी के पद को देने से बचना चाहिए | जनपदों में एक व्यक्ति-एक पद का नियम निर्धारित होना जरुरी है |

Friday, March 16, 2012

स्मृति शेष -- जंग ए आज़ादी के गुमनाम सेनानी बलवंत सिंह का बलिदान दिवस १७ मार्च

अरविन्द विद्रोही ....................... श्री बलवंत सिंह का जन्म सरदार बुद्ध सिंह के घर पहली आश्विन संवत १९३९ दिन शुक्रवार को गाँव खुर्द पुर जिला जालंधर में हुआ था | आदम पुर के मिडिल स्कूल में आपका दाखिला कराया गया | कम उम्र में ही आपका विवाह भी हुआ , शीघ्र ही पत्नी की मौत भी हो गयी | स्कूल त्याग कर बलवंत सिंह फौज में भर्ती हुये | वहां संत कर्म सिंह जी की संगति से आप ईश्वर भजन करने लगे | आपका दूसरा विवाह हुआ | दस वर्षो बाद नौकरी छोड़ कर गाँव के पास स्थित एक गुफा में ग्यारह माह तक तपस्या की | सन १९०५ में कनाडा चले गये | आपके ही अथक प्रयासों से वैंकोवर में अमेरिका का पहला गुरु द्वारा स्थापित हुआ , इस कार्य में आपके साथी थे श्री भाग सिंह | बाद में भाग सिंह की एक देश द्रोही ने गोली मार कर हत्या कर दी | उस समय वहां के प्रवासी हिन्दुओ तथा सिक्खों को मृतक संस्कार करने में बड़ी विपत्ति होती थी | मुर्दे जलाने की उन्हें आज्ञा ना थी | श्री बलवंत सिंह ने कुछ जमीने खरीदी तथा दाह संस्कार की अनुमति ले ली | भारतीय मजदूरों को संगठित किया | उनमे सच्चरित्रता तथा ईश्वरोपासना का प्रचार किया | आपने गुरुद्वारा का ग्रंथी बनना स्वीकार किया | इमिग्रेसन विभाग ने भारतीओं को कैनेडा से हटाने का षड्यंत्र रचा | भारतीय मजदूरों को हांडूरास नामक द्वीप में चले जाने को राजी करने का प्रयास किया | बलवंत सिंह श्री नागर सिंह को द्वीप देखने भेजा | वहा इमिग्रेसन विभाग वालो ने उन्हें भारत में पाँच मुरब्बे जमीन और पाँच हज़ार डालर देने का लोभ देकर भारतीओं को इस द्वीप पर भेजने को कहा | नागर सिंह ने घुस ठुकरा कर बलवंत सिंह को वास्तविकता बता दी | प्रवासी भारतीओं की इच्छा थी कि हमारा पूरा परिवार साथ आकर रहे | श्री बलवंत सिंह , श्री भाग सिंह , भाई सुन्दर सिंह जी को भारत लौट कर अपने परिवार को लाने के लिए भेजा गया | १९११ में ये तीनो सपरिवार हांगकांग पहुचे | वैंकोवर आने के लिए काफी मुसीबतें उठाई | परिवार वालो को जमानत की तयं अवधि तक ही रहने की अनुमति मिली | अवधि बीतते ही इमिग्रेसन विभाग के लोग आ धमके | भारतीय झगडे के लिए तैयार हो गये | अफसर लोग जरा गरम हुये परन्तु वीर योद्धाओं की लाल आँखे देख कर खिसिया कर लौट गये | वे परिवार तो वही रहे परन्तु शेष भारतीओं के परिवार लाने की समस्या बनी हुई थी | तीन सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल बनाया गया जिसमे बलवंत सिंह शामिल थे | प्रतिनिधिमंडल इंग्लॅण्ड गया , वहा कहा गया की मामला भारत सरकार द्वारा यहाँ पहुचना चाहिए | निराश होकर सभी भारत आये | संपर्क व आन्दोलन शुरु किया | उस समय लाला लाजपत राय ने भी एक सडा स उत्तर देकर प्रतिनिधिमंडल से अपना पीछा छुड़ा लिया | फिर क्या था ? ये लोग लगे रहे , सहायता भी मिली और सभाएं भी हुई | घोर निराशा , विवशता , क्रोध से घिरे बलवंत सिंह को सहारा था तो सिर्फ राष्ट्रीय भाव का और कर्त्तव्य निर्वाहन का | बलवंत सिंह ने सभाओं में ह्रदय के अन्दर के लावे को उगला | सर माईकल ओडायर ने अपने ग्रन्थ इंडिया एस आई नो में इस बारे में लिखा है | वे बलवंत सिंह की सफाई , शांति , वीरता , गंभीरता और निर्भीकता को देख कर कहा करते थे कि - बलवंत सिंह सिक्खों के पादरी है अथवा सेनापति , यह निश्चय करना बड़ा कठिन है | बलवंत सिंह ने निश्चय कर लिया था कि भारत को हर सम्भव उपाय से स्वतंत्र करवाना ही प्रत्येक भारत वासी का कर्त्तव्य है और सब रोगों कि एक मात्र औषधि भारत कि स्वतंत्रता है | प्रतिनिधि मंडल २०१४ के प्रारंभ में वापस लौटा | इस समय बरकत उल्लाह तथा श्री भगवान सिंह अमेरिका में थे | बलवंत सिंह और प्रतिनिधि मंडल का अभी इनसे संपर्क नहीं हुआ था | इसी प्रकार कि गतिविधिओ में महीनो बीत गये | सन १९१४ के अंतिम में आप शंघाई पहुचे | वहा आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई | परिवार को श्री कर्तार सिंह के साथ वापस भारत भेज दिया | सन १९१५ में बैंकाक आ गये | २१ जनवरी , १९१५ के विद्रोह के आयोजन में जुटे रहे | दुर्भाग्य वश विद्रोह असफल हुआ उसके बाद आप बीमार भी हो गये | डाक्टर ने बिना क्लोरोफोर्म सुंघाए आप्रेशन कर डाला | बीमारी में ही अस्पताल से डिस्चार्ज भी कर दिये गये बलवंत सिंह | स्यान - थाईलैंड कि सरकार ने बलवंत सिंह और उनके साथियो को गिरफ्तार करके भारत की अंग्रेज सरकार के हवाले कर दिया | बलवंत सिंह को सिंगापुर लाया गया | मौन साध गये बलवंत सिंह | आखिर कर १९१६ में लाहौर षड़यंत्र-कारियो में आपको भी शामिल किया गया | २४ दिन के नाटक के बाद आपको फांसी की सजा सुनाई गयी | क्रान्तिकारियो के बौद्धिक नेता भगत सिंह लिखते है -- काल कोठरी में बंद हैं , सिक्ख होने पर टोपी नहीं पहन सकते | कम्बल ही सिर पर लपेट लिया है | बदनाम करने के लिए किसी ने शरारत की - कम्बल के किसी कोने में अफीम बांध दी और कहा गया कि आप आत्म हत्या करना चाहते है | अपने अत्यंत शांति से उत्तर दिया -- मृत्यु सामने खड़ी है | उसके आलिंगन के लिए तैयार हो चुका हूँ | आत्म हत्या कर के मैं मृत्यु सुंदरी को कुरूपा नहीं बनाऊंगा | विद्रोह के अपराध में मृत्यु दंड पाने में गर्व अनुभव करता हूँ | फांसी के तख्ते पर ही वीरता पूर्वक प्राण त्याग दूंगा | पूछ ताछ करने पर भेद खुल गया | कुछ नंबर दार कैदियो तथा वार्डर को कुछ सजाएं हुई | सभी ने आपकी देश भक्ति तथा निर्भीकता की दाद दी | १७ मार्च , १९१६ को बलवंत सिंह और उनके साथ छह साथी वीर नहाने के बाद भारत का स्वतंत्रता गान गाते हुये मुक्ति मार्ग पर चल पड़े | छोड़ गये अपने पीढियो के लिए त्याग , तपस्या और देश प्रेम की अनोखी मिसाल | बलवंत सिंह के जीवन संघर्ष को विस्तार से फ़रवरी १९२८ में चाँद के फांसी अंक में भगत सिंह ने लिखा था | भगत सिंह ने लिखा --- वे बड़े ईश्वर भक्त थे | धर्म निष्ठा के कारण उन्हें सिक्खों में पुरोहित बना दिया गया था | शांति के परम उपासक बलवंत का स्वाभाव बड़ा मृदुल था | वे सुमधुर भाषी थे | पहले पहल वे ईश्वरोपासना की ओर लगे | फिर लोगो को उस ओर लाने की चेष्टा की | बाद में लोगो के कष्ट दूर करने के प्रयास में धीरे धीरे गौरांग महाप्रभुओ से मुठभेड़ होती गयी और अंत में फांसी पर मुस्कुराते हुये आपने प्राण त्याग दिये | भगत सिंह ने फांसी के समय को कुछ इस प्रकार से वर्णित किया --- बलवंत सिंह ने प्रातः काल स्नान किया तथा अपने छह और साथियो के साथ भारत माता को अंतिम नमस्कार किया | भारत स्वतंत्रता का गान गाया | हँसते हँसते फांसी के तख्ते पर जा खड़े हुये | फिर क्या हुआ ? क्या पूछते हो ? वही जल्लत , वही रस्सी ! ओह ! वही फांसी और वही प्राण त्याग ! आज बलवंत सिंह इस संसार में नहीं है , उनका नाम है , उनका देश है , उनका विप्लव है |

Monday, March 12, 2012

भूमि अधिग्रहण

उत्तर प्रदेश में किसानों की जो कृषि योग्य बेश कीमती भूमि पिछली सरकारों के द्वारा जबरन व मनमाने तरीके से अधिग्रहित कर ली गयी थी , उन तमाम अधिग्रहित भूमि जहा के किसान अपनी जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ रहे है ,जिन्होंने मुआवजा लेने से इंकार कर दिया था और अधिग्रहित भूमि पर अधिग्रहण के वर्षो बाद भी कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ है वो सभी भूमि अधिग्रहण चिन्हित करके रद्द किया जाना चाहिए | इस प्रकार की सभी अधिग्रहित कृषि भूमि किसानों के नाम तत्काल की जानी चाहिए ,किसानों के नाम राजश्व अभिलेखों में दर्ज करने का शासनादेश निर्गत किया जाना समाजवादी सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए |

समाजवादी पार्टी में जारी अनुशासन हीनता

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश व प्रवक्ता सम्बन्धी जारी विज्ञप्ति कि राजेंद्र चौधरी के अलावा कोई भी प्रवक्ता नहीं है का उल्लंघन बदस्तूर जारी , बगलगीर - खासम खास माने जा रहे हालिया नियुक्त एक और सचिव लिख रहे है अपने को समाजवादी पार्टी का प्रवक्ता | अनुशासन हीनता- राजनीतिक अनुभव हीनता का प्रदर्शन जारी ,देखते है क्या होता है अंजाम ?

Friday, March 9, 2012

उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक अखिलेश यादव



अरविन्द विद्रोही .......................... उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो चुका है | विधान सभा उत्तर प्रदेश के आम चुनाव २०१२ में आम जनता के विश्वास रूपी मतों के सहारे , तमाम राजनीतिक पूर्वानुमानो को धता बताते हुये समाजवादी पार्टी ने विजय पताका फहरा ली है | बहुमत के जादुई अंक को पार करते हुये समाजवादी पार्टी ने अपने स्थापना से लेकर अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल की है | बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश में सत्ता से विदाई के साथ ही साथ परिपक्व हो रहे लोकतंत्र की झलक भी उत्तर प्रदेश के मतदाताओ ने दिखा ही दिया है | माया के मायावी , कांग्रेस के दिखावी , भाजपा के भ्रमित प्रचार युद्ध की जगह समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ के अनवरत संघर्ष को तरजीह देते हुये आम जनता ने अपनी पहली पसंद के रूप में उम्मीदों की साइकिल का बटन दबा के उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक अखिलेश यादव के माथे पर विजयी तिलक लगा दिया है | बहुजन समाज पार्टी सरकार के जनविरोधी नीतिओ के खिलाफ जनता की आवाज बनने का महती काम करने वाले युवा समाजवादी अखिलेश यादव-सांसद ,प्रदेश अध्यक्ष सपा ने जनता के लिए सड़क पे उतर के संघर्ष करने में तनिक भी संकोच या देर नहीं किया | समाजवादी पार्टी के संगठन में जिम्मेदारी स्वरुप मिले उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद के दायित्व निर्वाहन को बखूबी निभाते हुये अखिलेश यादव ने धुर समाजवादी राजेंद्र चौधरी-प्रवक्ता ,समाजवादी पार्टी को अहमियत देते हुये संगठन से जुड़े प्रत्येक निर्णय में उनकी सलाह को अहमियत देते हुये समाजवादी विचारधारा पर अपनी दृठता निरंतर बढ़ाते रहने पर , कर्मठ युवाओ को अपने से , समाजवादी विचारधारा से , जनता के संघर्ष से जोड़ते रहने पर विशेष ध्यान दिया | आज उत्तर प्रदेश में डॉ राम मनोहर लोहिया के विचारो पर बनी समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत में आ चुकी है | आज से लगभग १९ वर्ष , ४ महीना पूर्व ४-५ नवम्बर , १९९२ को लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में संपन्न हुये समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन में देश के लगभग सभी प्रान्तों के तपे-तपाये समाजवादी नेता शामिल हुये थे | इस दौर में मुलायम सिंह यादव ने ना तो शौकिया राजनीति की थी और ना पेशेवर राजनीति की थी | डॉ लोहिया के शिष्य मुलायम सिंह यादव ने उस समय छोटे लोहिया पंडित जनेश्वर मिश्र के निर्देश पे जोखिम की राजनीति की थी | मुलायम सिंह यादव ने डॉ लोहिया के कार्यक्रमों को पुनः जीवित करने का महती काम उस दौर में किया था | सपा की स्थापना के समय समाजवादी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुये मुलायम सिंह यादव ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष का एलान किया था | अन्याय के खिलाफ संघर्ष की विरासत - यह वह विरासत है जो डॉ लोहिया - जे पी के बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने बूते हासिल की थी | समाजवाद की इसी संघर्ष की विरासत को उत्तर प्रदेश में युवा समाजवादियो ने बखूबी निभाया और उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट - मनमानी बसपा सरकार के जुल्म के खिलाफ इस संघर्ष के अगुआ के तौर पे समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव - सांसद ने अपनी महती भूमिका को बखूबी अंजाम दिया | उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनाव में यह सफलता किसी चमत्कार के बदौलत नहीं हासिल हुई है समाजवादी पार्टी को , इस जन विश्वास के पीछे बसपा सरकार के खिलाफ जनता की आवाज बनकर संघर्ष कर रहे समाजवादियो की मेहनत रही है | जनता के मुद्दों पर आन्दोलनरत युवा सपाइयो के शरीर पर पड़ी एक एक लाठी , पुलिसिया बूटो से रौंदे गये युवाओ के जिस्म के दर्द को आम जनता ने अपने दिलो दिमाग में बैठा लिया था | हटाना ही था बसपा की सरकार को , बसपा सरकार के खिलाफ खिलाफ अपने कार्यकर्ताओ के संघर्ष ,अखिलेश यादव के सौम्य -निर्भीक नेतृत्व की बदौलत समाजवादी पार्टी आम जन की पहली पसंद बन चुकी थी और यह अब चुनाव परिणामो से साबित भी हो चुका है | यह निष्ठावान समाजवादियो का संघर्ष ही था कि साल भर पहले से दुसरे दलों से नेता एक के बाद एक समाजवादी पार्टी में अपना भविष्य तलाशने व सुरक्षित करने आने लगे थे | संघर्ष का एक कारवां बनाया अखिलेश यादव ने जिसमे संघर्ष शील नेता-कार्यकर्ता जुड़ते गये | दुर्भाग्य वश चुनावो के दौरान लगभग सभी दलों के जनाधार विहीन- संकुचित सोच के नेताओ ने आम जनता की रोज मर्रा की परेशानियो पर छिड़े संघर्ष की जगह हिन्दू-मुस्लिम और नेपथ्य में जा चुके धार्मिक मुद्दों को अनावश्यक तूल देने का प्रयास किया | यह वही नेता गण थे जिनका कोई जन सरोकार नहीं ,जिनकी पूरी राजनीति सिर्फ कोरी बयान बाजी , जातीय-धार्मिक उन्माद पर टिकी रहती है | नकारे गये ऐसे नेता ,नहीं चलने पाई इनकी सतही व भ्रमित करने वाली स्याह - संकीर्ण राजनीति इस बार यह एक विशेष उपलब्धि रही है चुनाव की | निरंकुश व भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ संघर्ष ही समाजवादियो की पहचान व पूंजी होती है | डॉ लोहिया और जय प्रकाश के बाद समाजवादी संघर्ष को सहेजने - सवारने का काम मुलायम सिंह यादव ने बखूबी अंजाम दिया था | समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने ग्रामीण जनता , छात्रों-युवाओ पर अपनी मजबूत पकड़ की बदौलत ही मुलायम सिंह यादव धरती पुत्र के संबोधन से नवाजे गये | गाँधी-लोहिया - जयप्रकाश के सिद्धांतो के अनुपालन में तनिक भी विचलित ना होने के कारण ,तात्कालिक अन्याय का विरोध करने के कारण , भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ हल्ला बोलने के कारण मुलायम सिंह यादव को जिद्दी भी कहा गया | समाजवादी आन्दोलन में भटकाव व कामियो के बावजूद जन संघर्ष की जो विरासत मुलायम सिंह यादव ने जो अर्जित की थी , उस पर उनके साथ साथ सपा कार्यकर्ता भी खरे साबित हुये है | आज पंडित जनेश्वर मिश्र नहीं है लेकिन उनकी कही हुई बात स्मृति पटल पर अंकित है | कन्नौज की लोकसभा सीट से १९९९ में प्रत्याशी के रूप में अखिलेश यादव का नामांकन करने पहुचे छोटे लोहिया ने पत्रकारों के सवालो के जवाब में कहा था कि - यह संघर्ष का परिवारवाद है , सत्ता का नहीं | इसके पहले शिक्षा ग्रहण कर रहे अखिलेश यादव से एक मुलाकात के दौरान जनेश्वर मिश्र ने अखिलेश यादव से कहा था --- युवाओ को सार्थक व सकारात्मक राजनीति करनी चाहिए और तुमको भी पढाई के बाद करनी है | छोटे लोहिया के मार्ग धर्षण में युवा अखिलेश यादव ने लोक सभा चुनाव जीतने के बाद क्रांति रथ के माध्यम से पुरे प्रदेश का भ्रमण किया था | यह अखिलेश यादव की संघर्ष और जनता से जुड़ने की शुरुआत थी | जनता से जुड़ने की ललक ने ही अखिलेश यादव को नव आशा का केंद्र बिंदु बना दिया है | वर्तमान पीढ़ी में विरलों के ही मन में सीखने की इच्छा होती है ,विरलों को ही धुर समाजवादियो का सानिद्ध्य मिलता है | जनेश्वर मिश्र के शिष्य रूप में अखिलेश यादव ने जनता से जुड़े सवालो को बखूबी समझा , अध्धयन किया , मानसिक दृठता अर्जित करने के साथ साथ कर्मठ युवाओ के समाजवादी संगठन के रूप में समाजवादी पार्टी को एक नयी पहचान दिया | वरिष्ठ समाजवादियो का मार्गदर्शन व युवाओ कि उर्जा के एकीकरण की बदौलत डॉ लोहिया की आर्थिक नीतिओ ,किसानों .मजदूरों,युवाओ,महिलाओ ,आम जन के मुद्दों को सड़क से संसद तक उठाने में अखिलेश यादव किसी भी समकालीन युवा संसद से पीछे नहीं है | सरल स्वभाव के धनी अखिलेश यादव ने वैचारिक दृठता के बूते संघर्ष की राजनीति के सहारे सत्ता तक का सफ़र तय किया है | उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की वर्तमान सफलता के पीछे आम जनमानस के नज़रिए से उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक समाजवादियो की उम्मीदों के केंद्र बिंदु बनके उभरे अखिलेश यादव ही है |