Thursday, October 11, 2012
लोकनायक जय प्रकाश नारायण का जन्म दिवस
लखनऊ के चिनहट विकास खंड के गाँव मुरलीपुर ( विधान सभा - बख्शी का तालाब ) में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के जन्म दिवस पे किसान नेताओ ने चित्र पर पुष्प अर्पित करके उनके योगदान की चर्चा की । लोकनायक जय प्रकाश नारायण के जन्म दिवस के अवसर पर आयोजित इस विचार गोष्ठी में अरविन्द विद्रोही , गंगा प्रसाद यादव , संतोष सिंह , चन्द्र शेखर वर्मा , पंकज श्रीवास्तव , कौसल किशोर वर्मा , राम कैलाश गौतम , धन पत रावत , उमेश वर्मा , राम कुमार , हनुमान , संजय यादव आदि ने अपने अपने विचार रखे । गोष्ठी में निर्णय लिया गया कि भारत के महापुरुषों के जीवन संघर्ष - विचारो के प्रचार प्रसार के लिए साहित्य का प्रकाशन और ग्रामीण इलाको में वितरण पुनः शुरू किया जाये । किसानो के साथ विचार विमर्श चौपाल लगाके किया जाये । ग्रामीण इलाको में शराब बंदी आन्दोलन शुरू हो । ग्रामीण युवाओ को रोजगार परक योजनाओ की जानकारी देने की और उनको सामाजिक जिम्मेदारी भावना से जोड़ने के लिए युवाओ को ग्रामीण चौपाल में बुलाने पर जोर गया ।
Tuesday, October 9, 2012
बहुजन समाज को सामाजिक चेतना से राजनीतिक चेतना तक ले जाने वाले नायक मान्यवर कांशीराम
अरविन्द विद्रोही .............
कांशीराम - भारत की राजनीति में एक अनूठा व्यक्तित्व | बालक कांशीराम का जन्म खवासपुर गाँव - जिला रोपड़ - पंजाब में एक रामदासिया हरिजन परिवार में हुआ था | गाँव में ही शिक्षा ग्रहण करने वाले बालक कांशीराम के दादा व चाचा फ़ौज में थे | कांशीराम ने विज्ञानं स्नातक की शिक्षा रोपड़ में ग्रहण की | बाल्य कल से लेकर शैक्षिक जीवन तक कांशीराम को सामाजिक भेदभाव व छुआ छूत का अनुभव नहीं था क्यूंकि आर्य समाज व सिख संप्रदाय के प्रभाव के चलते पंजाब में सामाजिक बुराई समाप्त प्राय : थी |
आखिर युवक कांशीराम से - एक शिक्षित नौकरी शुदा कांशीराम से सामाजिक राजनीतिक चेतना का नायक मान्यवर कांशीराम तक का सफ़र कैसे शुरू हुआ ? यह एक दिलचस्प और प्रेरक प्रसंग है | वर्तमान परिस्थितियो में भी मानों इतिहास खुद को दोहराने की प्रक्रिया में लगा हुआ है | आभास होता है कि काल की गति स्वयं को दोहारने वाली है | कांशीराम १९५७ में सर्वे ऑफ़ इंडिया की परीक्षा में उत्तीर्ण हुये | विभाग में कार्यभार ग्रहण करने के पूर्व भरवाए जाने वाले बंद को भरने से इंकार करके कांशीराम ने वो नौकरी ना करने का फैसला किया | तत्पश्चात आपने पूना में एक्स प्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेट्री ( ई आर डी एल ) में अनुसन्धान सहायक के पद पे कार्य करना प्रारंभ किया | अनुसन्धान सहायक के पद पे कार्य रत कांशीराम की रूचि सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों की तरफ होने लगी थी | कांशीराम की इसी नौकरी के दौरान ई आर डी एल में एक ऐसी घटना घटी जिसने शिक्षित कांशीराम को जो अगर यह घटना ना घटी होती तो शायद गुमनामी में ही गम रह जाता , को करोडो - करोड़ लोगो का मान्यवर कांशीराम बनाने में अहम् भूमिका अदा की | दरअसल इसी समय बुद्ध जयंती व अम्बेडकर जयंती के अवकाश को निरस्त करने का निर्णय ई आर डी एल ने लिया और जब उसका विरोध वही के एक कर्मचारी ने किया तो उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया | कांशीराम से ना रहा गया , अपने मित्रो-सहकर्मियों के तमाम मना करने के बावजूद कांशीराम ने अन्याय के खिलाफ प्रतिकार का संकल्प लेते हुये उस निलंबित कर्मचारी की मदद कारी तथा मा ० न्यायालय में इसके विरोध में वाद दायर किया | मा० न्यायालय ने न्याय किया तथा निलंबित कर्मचारी के निलंबन को रद्द करने के साथ साथ बुद्ध व अम्बेडकर जयंती दोनों के अवकाश को बहाल किया | आज उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पर घोषित अवकाश को रद्द करते हुये पुनः वही परिस्थितिया - हालात पैदा कर दिया है जो किसी नए कांशीराम के आगे आने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है |
सामाजिक - राजनीतिक दिलचस्पी लेना प्रारंभ कर चुके कांशीराम ने डॉ भीमराव अम्बेडकर को उनके विचारो-पुस्तकों के अध्धयन से आत्मसात करना प्रारंभ कर दिया | इसी अध्धयन काल में कांशीराम ने नौकरी का परित्याग किया और संकल्प लिया --- "मैं कभी शादी नहीं करूँगा और ना ही किसी प्रकार की कोई व्यक्तिगत संपत्ति अर्जित करूँगा |" सामाजिक बुराइयों की जड़ जातिवाद है और इसको समाप्त करना जरुरी है , यह बात समाजवादी चिन्तक युगद्रष्टा डॉ राममनोहर लोहिया हमेशा दोहराते रहते थे | डॉ लोहिया ने कार्यक्रम भी दिया था , जाती तोड़ो - समाज जोड़ो | इसी जाती के विष को भांपते हुये , परखते हुये कांशीराम ने कहा था कि , -- " मुझे लगा कि जातिवाद सामाजिक व्यवस्था ही सारी बुराइयों की जड़ है | जाती विहीन समाज की स्थापना के बगैर इस तरह की बुराइयाँ समाप्त नहीं हो सकती है | मैं इस बुराई को ख़त्म करने का काम करूँगा इसीलिए मैंने १९६४ में अपनी नौकरी त्याग दी थी | "
सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में पूरी तरह तल्लीन कांशीराम ने महाराष्ट्र रिपब्लिक पार्टी तथा डॉ अम्बेडकर द्वारा स्थापित पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी के लिए काम शुरू किया | लगभग ४ वर्षो तक इन संगठनो में कार्य करने के पश्चात् कांशीराम ने अनुभव किया कि इन संगठनो में आन्तरिक मतभेद बहुत है तथा संगठन - समाज का मूल कम कर पाना इसमें संभव नहीं है | कांशीराम ने नया संगठन बनाने और शोषित समाज को एक साथ लाने कि दिशा में सोचा और ६ दिसम्बर , १९७३ को पुन व दिल्ली के चन्द सरकारी कर्मचारियों को साथ लेकर बामसेफ का गठन किया | बामसेफ को अखिल भारतीय स्वरुप देने में कांशीराम को ५ वर्षो का समय लगा और ६ दिसम्बर , १९७८ को दिल्ली में ही बामसेफ की औपचारिक घोषणा की | बामसेफ को सरकारी कर्मचारियों की संस्था के रूप में खड़ा करके एक मजबूत सामाजिक आधार के साथ साथ आर्थिक मजबूती का कार्य कांशीराम ने किया | कांशीराम के ही अनुसार ,- " जिस समाज की राजनीतिक जड़े मजबूत नहीं होती , उस समाज की राजनीति कभी कामयाब नहीं होती | मैंने बामसेफ बना कर दलित-शोषित समाज का राजनीतिक आधार मजबूत किया | "
सक्रिय राजनीति में कदम रख चुके कांशीराम की नज़र सर्वोच्च सत्ता पे थी , बगैर किसी लाग लपेट के कांशीराम का कहना था ,- " राजनीति सत्ता के लिए होती है और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती | " असमान सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को धार देने के लिए , जाती विहीन समाज की सथापना के लिए , समाज में बराबरी कायम करने के लिए कांशीराम ने १९८१ में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति ( डी एस फोर ) का गठन किया | डी एस फोर के बैनर तले कांशीराम ने ' समता और सम्मान के लिए संघर्ष ' आन्दोलन की शुरुआत ६ दिसम्बर ,१९८३ को प्रारंभ किया | देश के पाँच कोनो कन्याकुमारी , कोहिमा , कारगिल , पूरी तथा पोरबंदर से कांशीराम ने दो-दो दिन के अंतराल पर दिल्ली के लिए साइकिल यात्रा शुरू की | सौ दिन में दिल्ली पहुची इस यात्रा में डी एस फोर के ३ लाख कार्यकर्ताओ ने साढ़े सात हज़ार सभा करी , १० करोड़ से ज्यादा लोगो तक इस आन्दोलन के माध्यम से समता और सम्मान की बात पहुचाई | कांशीराम का मानना था कि , -- " जब हम इस गैर बराबरी वाले समाज को ध्वस्त कर एक नए समाज की स्थापना के लिए संघर्ष की बात करते है तो हमें विकल्प भी प्रस्तुत करना होगा और यह विकल्प राजनीतिक सत्ता को हासिल किये बगैर संभव नहीं है | " और कांशीराम ने --- करोडो- करोड़ लोगो में सामाजिक राजनीतिक चेतना जगाने वाले बहुजन समाज के नायक कांशीराम ने अपने जीते जी राजनीतिक सत्ता- ताकत हासिल करके दिखाई भी | भारतीय लोकतंत्र में कांशीराम द्वारा गठित राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी ने जोरदार आगाज़ किया तथा सभी प्रमुख राजनीतिक दलों - नेताओ को अपने चातुर्य व रणनीति के तहत बार - बार घुटने टेकने पर विवश किया | कांशीराम अपने समाज को जागृत करते हुये कहते थे ,--" शिक्षित करो , संघर्ष करो तथा संगठित करो | " कांशीराम का स्पष्ट मानना था कि सामाजिक कार्यवाही बिना उग्रता के होनी चाहिए |
मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पे अवकाश को रद्द किये जाने पे प्रतिक्रिया देते हुये साथी पत्रकार धनञ्जय सिंह लिखते है कि -- यू पी में कांशीराम पुण्यतिथि पर अवकाश रद्द होना ठीक नहीं | यही एक प्रदेश है जहा उनके प्रयोग धरातल पर उतरे | छुट्टी के बहाने ही सही लोग उन्हें याद करते | आप उन्हें नकार नहीं सकते | नोयडा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश पाण्डेय का मानना है कि सीमित संसाधनों में समाज के सबसे निचले वर्ग का संकलन कर उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के सत्ता शीर्ष पर बैठने वाले मा कांशीराम जी वन्दनिये है | भले ही उनके मिशन को आगे बढ़ाने वाले कार्यकर्ताओ का अभाव हो गया है किन्तु तब भी अभी तक उनके द्वारा किये गये प्रयासों का अपेक्षित परिणाम ही आया है |
Saturday, September 29, 2012
भगत सिंह के विचारो की आजाद भारत में प्रासंगिकता --- अरविन्द विद्रोही
Thursday, September 27, 2012
२२ से २५ तक का मेरा दिल्ली प्रवास - अरविन्द विद्रोही
२२ को सुबह १० बजे दिल्ली पहुचने के पश्चात् सराय काले खां स्थित एक गेस्ट हाउस में दैनिक क्रिया से निवृत होकर मैं तक़रीबन दोपहर १ बजे जंतर मंतर पंहुचा | जंतर मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों को देखते देखते एक घंटे कब गुजर गये ये पता ही नहीं चला | यहाँ से स्वामी अग्निवेश जी के कार्यालय में गया , स्वामी अग्निवेश जी के ना होने के कारण मुलाकात ना हो सकी | मित्र दीपक सिंह - महामंत्री जनता दल यू दिल्ली प्रदेश से दूरभाष से वार्ता करने पे ज्ञात हुआ की वे अपने कार्यालय में ही पार्टी की बैठक में मौजूद है | उनके निमंत्रण पे मैं उनके कार्यालय में गया | कार्यालय में जनता दल-यू के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर बलबीर सिंह सहित दर्जनों प्रदेश पदाधिकारी २४ को होने वाले अपने कार्यकर्ता सम्मेलन की तैयारी बैठक कर रहे थे , दीपक सिंह के द्वारा मेरा परिचय कराने के बाद ठाकुर बलबीर सिंह ने सप्रेम पूर्वक मुझे भी अपने साथ बैठे रहने को कहा | कुछ समय पश्चात् जनता दल -यू के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण कुमार श्रीवास्तव के अपने भी कार्यालय में आने की सुचना मिली , जिनसे मिलने के लिए मैं उनके कार्यालय में तेजपाल सिंह के साथ गया | एक दशक के अन्तराल के पश्चात् मुलाकात के पश्चात् भी अरुण जी ने पहचान लिया ये मेरी आत्म संतुष्टि का कारण बना | जनता दल - यू के होने वाले दिल्ली प्रदेश के सम्मेलन में जिसमे शरद यादव जी को मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहना था से सम्बंधित एक प्रपत्र लिखने की जिम्मेदारी मुझे अरुण जी ने दी जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया | तभी जनता दल यू के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर बलबीर सिंह का सन्देश आया कि जनता दल अध्यक्ष श्री शरद यादव जी के घर चलना है , सभी लोगो के साथ मैं भी शरद जी के घर रवाना हुआ | शरद यादव जी के घर तमाम छात्रों और पदाधिकारियों से मुलाकात हुई | तक़रीबन ८ बजे वहा से निकल कर मित्र दीपक सिंह के साथ जर्नलिस्ट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में गया जहा कमाल भाई ने हम लोगो को आमंत्रित किया था | वहा से १० बजे निकलने के पश्चात् दीपक सिंह ने अपने मित्रो के साथ मेरा परिचय और भोज का कार्यक्रम रखा था ,वहा गया | लगा ही नहीं उन सभी मित्रो से मिलकर कि आज पहली बार मिल रहा हूँ ,हिंदी गाने , ग़ज़ल , पंजाबी गाने और चुटकुलों को सुनते सुनाते और सह भोज का आनंद उठाते उठाते २ बज गये | रात्रि २.३० में गेस्ट हाउस पंहुचा और तुरंत सो गया |
२३ तारीख को प्रातः ११.४५ बजे से राष्ट्रवादियो का लक्ष्मी नगर में एक सम्मेलन था जिसमे मित्र अवधेश पाण्डेय ने आमंत्रित किया था उसमे शिरकत के लिए मैं लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन ११ बजे पहुच गया , वहा अवधेश पाण्डेय जी के साथ कार्यक्रम स्थल गया | मित्र अवधेश पाण्डेय ने कार्यक्रम पश्चात् कार्यक्रम के विषय में अपनी कलम से जो लिखा वही प्रस्तुत है ---- दिल्ली में हुए ऐतिहासिक सम्मेलन का आयोजन अभूतपूर्व अनुभव रहा, आयोजकों के लिये भी और सम्मेलन में उपस्थित हो माँ भारती का गौरव बढ़ाने वाले भाई-बह्नों के लिये भी. देश के विभिन्न भागों से स्वत: प्रेरणा से आये लोगों का संगम अविस्मरणीय घटना है. आज जब जन-सामान्य राजनीति से घृणा करता है, तब देश को आगे ले जाने का संकल्प लेकर लोग किसी नेता के लिये अपना काम-धाम छोड़ दिल्ली आते हैं तो यह बहुत बड़ी बात है. सम्मेलन में जहाँ सोशल मीडिया के नामी धुरंधर उपस्थित हुए, वहीं अन्य राष्ट्रभक्त भी पीछे न रहे. लगभग 150 के आसपास की संख्या रही होगी. जो लोग सम्मेलन में नहीं आ सके उनके लिये कार्यक्रम विवरण कलमबद्ध करने का परम सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है, जो आप सभी को आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित है.
कार्यक्रम महन्त नित्यानंददास जी एवं एक अन्य उपस्थित बुजुर्ग द्वारा माँ भारती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित करने के साथ प्रारंभ हुआ. दो सत्रों में संपन्न कार्यक्रम के प्रथम सत्र में देश की विभिन्न समस्याओं पर चिंता जताते हुए, वक्ताओं ने मोदी जी के द्वारा किये गये विकास कार्यों, समाज के लोगों में जाति-धर्म आदि का भेद न करते हुए सभी का समान विकास करने की भावना, पारदर्शी व कुशल प्रशासन, आतंकवाद से सख्ती से निपटने, नशाबंदी व गौरक्षा आदि के लिये मोदी जी के कार्यों जैसे अनेकों कारण गिनाये. मोदी जी की कार्यक्षमता का लोहा मानते हुए सभी ने माँ भारती के मंदिर के लिये मोदी जी को ही उपयुक्त पूजारी बताया.
प्रथम सत्र के बाद भोजन की व्यवस्था भी थी. भोजन के उपरांत दूसरे सत्र में मोदी जी को राष्ट्र का नेतृत्व सौपने के मार्गों पर उपस्थित राष्ट्रवादियों ने निम्नलिखित सुझाव दिये. सुझाव अनंतिम है और आप लोग टिप्पणी के रूप में अपने बहुमूल्य सुझाव देने की कृपा करें तो यह राष्ट्रकार्य थोड़ा आसान हो सकता है.
1) युवाओं को राष्ट्र की समस्याओं से अवगत कराना और उन्हे अपने मताधिकार का प्रयोग करने का प्रोत्साहन देना
2) राष्ट्र के विरोधियों की पोल जनता के सामने खोलना, केन्द्र सरकार के घोटाले व उनके सहयोगियों के बारे में जनता को बताते हुए, मोदी जी के द्वारा कराये गये कार्यों को जनता के समक्ष रखना.
3) किसी भी संगठन से जुड़े लोगों को अपनी अपनी मातृ संस्थाओं पर दबाव डालना होगा.
4) देश में काँग्रेस के विरुद्ध माहौल है अत: मोदी जी को गैर काँग्रेसवाद का प्रतिनिधित्व करना होगा.
5) नारी शक्ति को राष्ट्र की समस्याओं से अवगत करा, उन्हे अपने आसपास चर्चा व मताधिकार का प्रयोग करने के लिये प्रोत्साहन देना होगा.
6) माननीय श्री सुरेश जी सोनी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, केशव कुँज, झण्डेवालान, नयी दिल्ली को पत्र भेज मोदी जी राष्ट्र रक्षा के लिये आगे करने का अनुरोध करना.
7) गली-मुहल्लों में नोटिस बोर्ड लगाकर मोदी जी के द्वारा कराये गये कार्यों का उल्लेख करना.
8) गाँवों और कस्बों में टोलियाँ बना देश की उन्नति के लिये मोदी जी जैसे अनुभवी व प्रामाणिक क्षमता की आवश्यकता के बारे में लोगों को बताना.
9) केन्द्र का रास्ता गुजरात के विधानसभा चुनाव से होकर जाने वाला है, अत: सभी राष्ट्रवादियों को गुजरात विधानसभा चुनाव में अपना समय देने के लिये तैयार रहना होगा.
उपरोक्त प्रस्तावों को वास्तविकता का रूप देने के लिये अगली कार्ययोजना बैठक का भी विचार किया गया.
सम्मेलन में आने वाले राष्ट्रभक्तों का सादर धन्यवाद.
!! भारत माता की जय !!
राष्ट्रवादियो का यह कार्यक्रम शाम ६बजे तक चला था | कार्यक्रम समाप्ति के पश्चात् मैंने मित्र दीपक सिंह को दूरभाष से सुचना दिया और ७ बजे वो आये और मैं उनके साथ जनता दल यू के कार्यालय की तरफ चल पड़ा | सम्मेलन की तैयारियां अपने चरम पर थी | १० बजे तक वहा रहने के पश्चात् हम लोगो ने भोजन किया और वापस गेस्ट हाउस सराय काले खां आ गये |
२४ तारीख को प्रातः १० बजे मैं तैयार होकर दीपक सिंह के साथ मान्वलकर सभागार पंहुचा | भव्य व्यवस्था के साथ साथ सुबह से ही कार्यकर्ताओ के हुजूम आने शुरू थे | दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर बलबीर सिंह और उनके सभी पदाधिकारियों की मेहनत अपना रंग दिखा रही थी | ११ बजते बजते सभागार में कोई सीट खाली ना रही और बाहर भी सैकड़ो की तादात में कार्यकर्ता मौजूद रहे | खांटी समाजवादी शरद यादव - राष्ट्रीय अध्यक्ष जनता दल यू के साथ साथ राष्ट्रीय महासचिव अरुण कुमार श्रीवास्तव , गोविन्द यादव - अध्यक्ष मध्य प्रदेश ने कार्यकर्ता सम्मेलन को विशेष रूप से संबोधित किया | कार्यकर्ताओ के हुजूम और उत्साह से शरद यादव गद गद दिखे और उन्होंने कार्यकर्ताओ का उत्साह वर्धन किया | इस दिन मेरे छात्र जीवनसे मित्र रहे सैयद आमिर जो की दिल्ली में ही रहते रहते साथ साथ रहे और हमने खूब सारी बातें भी करी |
दिल्ली प्रवास के अंतिम दिन २५ तारीख को प्रातः १० बजे मित्र दीपक सिंह के साथ प्रवीन प्रधान जी से मिलने उनके कार्यालय गया | वहा परिचय के पश्चात् कुछ सामाजिक कार्यक्रमों की योजना बनी जिसका क्रियान्वयन आने वाले दिनों में होगा | यहाँ से सुप्रीम कोर्ट पंहुचा जहा पर वरिष्ट अधिवक्ता श्री राजेंद्र वर्मा जी से मुलाकात करी | श्री राजेंद्र वर्मा जी से लगभग एक वर्ष के अन्तराल पर हुई दूसरी मुलाकात भी मेरे लिए बहुत उत्साहवर्धक रही | वरिष्ट लेखक - पत्रकार श्री मस्तराम कपूर जी से मुझे मेरी अगली दिल्ली यात्रा में मिलवायेंगे यह उन्होंने वायदा किया | वहा से जंतर मंतर होते हुये शाम ६.२० बजे पुरानी दिल्ली स्टेशन पंहुचा |अपने नियत समय ६.४० पे ट्रेन चल पड़ी और मैं उसमे सवार होकर अपने घर बाराबंकी वापस .......
Tuesday, September 11, 2012
हिन्दू धर्म-दर्शन व अध्यात्म के प्रचारक स्वामी विवेकानंद ----- अरविन्द विद्रोही
गुरूदेव श्री रामकृष्ण परमहंस की अमर वाणी, ‘‘सभी धर्म सत्य हैं और वे ईश्वर प्राप्ति के विभिन्न उपाय मात्र हैं। ‘‘को आत्म सात् किये हुए स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो -अमेरिका में आयोजित होने वाले विराट धर्मसभा व महासम्मेलन में जाने का निश्चय मद्रास के शिष्यों के अनवरत् दबाव व इच्छा तथा एक रात को गुरूदेव श्री रामकृष्ण परमहंस को स्वप्न में देखा कि वे महासागर के अथाह जल में पैदल चलते चले जा रहें हैं और उन्हें अपने पीछे-पीछे आने को कह रहे हैं, देखकर किया था। मातु श्री शारदा देवी की आज्ञा उन्होंने विदेश यात्रा के लिए पत्र लिख कर मांगीं माता की आज्ञा व आशीर्वाद एक साथ प्राप्त हो गये। स्वामी विवेकानन्द ने सारी उलझनों को त्याग कर धर्मसभा में जाने का निश्चय किया। पश्चिम को हिन्दू दर्शन और अध्यात्म का सन्देश देने तथा गुलामी की जंजीरों में जकड़े स्वदेश को जाने के महान उद्देश्य को पूरा करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने 31मई 1893 को मातृभूमि भारत के सागर तट से जलयान पर सवार हो कर, अपनी यात्रा प्रारम्भ की। पश्चिम के वैज्ञानिक विकास को देखने-समझने की जिज्ञासा मन में समेटे स्वामी विवेकानन्द जहाज के सहयात्रियों तथा कैप्टेन के साथ परिचय प्राप्त कर घुलमिल गये। सागर की तरंगों से उत्पन्न संगीत को ध्यान का माध्यम बना कर विवेकानन्द ने सात दिनों की यात्रा के बाद, जहाज के श्रीलंका के बन्दरगाह पर पहूँचने पर कोलम्बों का नगर भ्रमण किया। बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म की विद्रोही शाखा व पूरक मानने वाले विवेकानन्द ने भगवान बुद्धदेव की महानिर्वाण अवस्था की मूर्ति के दर्शन किये। भाषा की कठिनाई के चलते वहाँ के पुरोहित से स्वामी विवेकानन्द की बात न हो पाई। कोलम्बो से जलयान चलकर मलाया, सुमात्रा, सिंगापुर होते हुए हांगकांग पहूँचा। यहाँ तीन दिन के प्रवास में स्वामी विवेकानन्द ने दक्षिण चीन की राजधानी कैण्टन की यात्रा कर ली। यहाँ भी बौद्ध मन्दिर के दर्शन किये और जापान पहूँचने पर नागासाकी, याकोहामा, ओसाका और टोक्यो को देखकर अपने शिष्यों को लिखा, – ‘‘भारत की मानो जराजीर्ण स्थिति से बुद्धि का भी नाश हो गया है! देश छोड़कर बाहर जाने से तुम लोगों की जाति बिगड़ जाती है! हजारों वर्ष पुराने इस कुसंस्कार का बोझ सिर पर धरे हुए तुम लोग बैठे हुए हो! हजारों वर्ष से खाद्य-अखाद्य की शुद्धा-शुद्धि पर विचार करते हुए तुम लोग अपनी शक्ति बरबाद कर रहे हो! पौरोहित्य रूपी मूर्खता के गम्भीर आवर्त में चक्कर काट रहे हो! सैकड़ों युग के लगातार सामाजिक अत्याचार से तुम्हारा सारा मनुष्यत्व नष्ट हो गया है!……..आओ, मनुष्य बनो। अपने संकीर्ण अन्धकूप से निकलकर बाहर जाकर देखो, सभी देश कैसे उन्नति के पथ पर चल रहें है। क्या तुम मनुष्य से प्रेम करते हो? तुम लोग क्या देश से प्रेम करते हो? तो फिर आओ हम भले बनने के लिए प्राणपण से चेष्टा करे।
जहाज प्रशान्त महासागर पार कर बैंकुवर बन्दरगाह पहूँचा। स्वामी विवेकानन्द रेलमार्ग से 3दिन की यात्रा पूरी कर के शिकागों पहूँचे। गेरूवा वस्त्र धारी अपरिचित युवक को देख लोग घूरने व ठगने लगे। खिन्न होकर स्वामी विवेकानन्द एक होटल में जाकर विश्राम करने लगे। दूसरे दिन स्वामी विवेकानन्द प्रदर्शनी देखने गये। वहाँ पर भी अपरिचित युवा साधु को देखकर पत्रकारों ने परिचय प्राप्त किया। अत्यधिक व्यय से चिन्तित स्वामी विवेकानन्द को यह ज्ञात हुआ कि धर्मसभा का आयोजन सितम्बर माह में होगा तथा प्रतिनिधि के रूप में आवेदन पत्र भेजने का समय भी बीत चुका है। व्यय खर्च कम करने के उद्देश्य से विवेकानन्द बोस्टन चल पड़े। एक वृद्ध महिला से आकस्मिक भेंट हो गई। वृद्ध महिला ने अमेरिका में आये वेदान्त के इस प्रचारक को अपने घर अतिथि के रूप में रहने का आमंत्रण दिया। स्वामी विवेकानन्द का मन निश्चिन्त हुआ और वे उनके घर रहने लगे। यहीं पर हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विख्यात प्रोफेसर श्री जे0एच0राइट आये और स्वामी विवेकानन्द से परिचय होने के बाद, प्रभावित होकर, धर्मसभा से सम्बन्धित अपने मित्र मिस्टर बनी को पत्र लिखा, -‘‘मेरा विश्वास है कि यह अज्ञात हिन्दू सन्यासी हमारे सभी विद्वानों से अधिक विद्वान है। ’’स्वामी विवेकानन्द श्री राइट के लिखे इस पत्र को लेकर शिकागो आये, दुर्भाग्यवश वे पत्र को खो बैठे। भीषण शीतलहर में किसी तरह रात रेलवे मालगोदाम के सामने पड़े एक बडे से बक्से में बिताई। सड़क किनारे बैठे भूख से निढ़ाल स्वामी विवेकानन्द ने गुरूदेव का स्मरण किया ।जहाँ पर स्वामी विवेकानन्द बैठे थे, वहीं सामने एक विशाल घर था। इसी घर से एक स्त्री ने बाहर आकर स्वामी विवेकानन्द से पूछा, ‘‘क्या आप धर्ममहासभा के प्रतिनिधि हैं? विवेकानन्द ने अपना पूरा हाल बताया। मिसेज जार्ज डब्ल्यू० हैल नामक इस स्त्री ने स्वामी विवेकानन्द को सादर अपने घर आमंत्रित किया, भोजन कराया तथा फिर उन्हें धर्म महासभा के कार्यालय ले कर गई। इस तरह विभिन्न लोगों के सहयोग तथा गुरूदेव के आशीर्वाद से स्वामी विवेकानन्द हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में ले लिए गये तथा वहा अतिथि भवन में रहने लगे।
फिर वो घड़ी भी आ गई जिसके लिए स्वामी विवेकानन्द भारत भूमि से शिकागो पधारे थे।11सितम्बर1893 को प्रातः से ही शिकागो के आर्ट इंस्टिच्यूट के अन्दर बाहर हजारों का हुजूम एकत्र होने लगा। बड़े हाॅल में एक विशाल मंच पर बीचो-बीच एक बड़ी सी राजसिंहासन नुमा कुर्सी और दोनो तरफ पीछे की तीन पंक्तियों में अर्धगोलाकार तरीके से सजाई गई लकड़ी की कुर्सियां थी। बडे घण्टे की गूंज के साथ ही विश्व धर्म महासम्मेलन के अधिवेशन के सभापति चाल्र्स कैरोल बोनी और अमेरिकी कैथेलिक चर्च के प्रमुख पादरी कार्डिनल गिबन्स हाथ में हाथ डाले, समस्त अतिथि धर्म प्रतिनिधियों का नेतृत्व करते हुए मंच तक आये और फिर सभी लोग तयशुदा स्थान पर आसीन हो गये। चीन, जापान, यूनानी गिरजाघर, अफ्रीका, मिस्र तथा भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के प्रतिनिधि अपनी-अपनी वेशभूषा में आसीन हो गये । भारत से-प्रतापचन्द्र मजूमदार ब्रह्म समाज के, वीरचन्द्र गाँधी जैन धर्म के, श्रीमती ऐनी बेसेन्ट थियोसोफी की, नागरकर जी बम्बई के साथ-साथ स्वामी विवेकानन्द गेरूए अचकन और पगड़ी में एक विशुद्ध परिव्राजक के रूप में उपस्थित थे। स्वामी विवेकानन्द का वैराग्य साफ झलक रहा था। श्रोताओं और दर्शकों की निगाहें बरबस ही मंचासीन श्रेश्ठजनों से फिसलती हुई इसी युवा साधु पर टिक जाती थी। विश्व के इतिहास में अपना विशेष स्थान रखने वाली यह धर्म महासभा, हिन्दू धर्म के इतिहास में नये युग का द्वार खोलने वाली सिद्ध हुई। विश्व के प्रत्येक कोने के करोड़ों व्यक्तियों की आस्थाओं व विचारों का प्रतिनिधित्व यहाँ हुआ। सभा का उद्घाटन मधुर वाद्य संगीत से हुआ। सर्वव्यापी परमेश्वर की स्तुति की गई । सभी का परिचय हुआ । सर्वप्रथम यूनानी गिरजाघर के प्रधान धर्माध्यक्ष ने बहुत ही उदार व भाव पूर्ण व्याख्यान दिया। फिर कई प्रतिनिधियो के व्याख्यान हुए । अपरान्ह में चार प्रतिनिधियों के पश्चात् स्वामी विवेकानन्द ने गुरू रामकृष्ण व जगदम्बा काली की शक्ति का स्मरण कर, ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को मन ही मन नमन कर अंग्रेजी में अपना व्याख्यान प्रारम्भ किया,-‘‘अमेरिका की बहनों और भाईयो।’’। इस सम्बोधन का विद्युत प्रवाह श्रोताओं पर पड़ा एवं हाॅल काफी देर तक तालियों से गुंजायमान रहा। शिकागो स्थित आर्ट इंस्टिच्यूट के हाॅल में उपस्थित विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि तथा हजारों-हजार नागरिक भारत के इस युवा सन्यासी की वाणी के अधीन हो, सम्मोहित भाव से सुनते रहे और युवा सन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने आगे कहा, -‘‘आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हमारा स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा ह्दय अवर्णनीय हर्ष से भरा जा रहा है । संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से धन्यवाद देता हूँ। इस पर उपस्थित अपार जनसमूह द्वारा काफी समय तक जय ध्वनि की गई । फिर विवेकानन्द ने कहा,-‘‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है।’’ 11सितम्बर के तीसरे प्रहर की समाप्ति तक विवेकानन्द ने अपने इस प्रथम लघु व्याख्यान में साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उसकी वीभत्स धर्मान्धता की तीव्र भत्र्सना की। सत्रह दिनों तक लगातार प्रातः, दोपहर और शाम को सम्मेलन की बैठकें चलती रही। ।स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिया गया प्रथम लघु व्याख्यान श्रोताओं के ह्दय को स्पर्श कर गया था । सनातन धर्म की सहिष्णुता, सार्वभौमिकता, सच्चाई तथा विशालता का वर्णन स्वामी विवेकानन्द ने जिस भावपूर्ण तरीके से किया था, उससे सभी अत्यन्त प्रभावित हुए । चौथे दिन 15 सितम्बर को ‘‘हमारे मतभेद के कारण’’ विषय पर बोलते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कुएं के मेंढ़क की कथा सुनाने के बाद कहा कि, ‘‘हम सभी धर्मावलम्बी इसी प्रकार के अपने अपने कुएं में बैठकर अपने अपने धर्म को एक-दूसरे से बड़ा कह कर झगड़ा मोल ले रहें हैं । मैं आप अमेरिका वालों को धन्य कहता हूँ, क्योंकि आप हम लोगों के इन छोटे-छोटे संसारों की क्षुद्र सीमाओं को तोड़ने का महान प्रयत्न कर रहें हैं । ’’फिर 19सितम्बर को ‘‘हिन्दू धर्म’’ पर लिखित निबन्ध को श्रोताओं को बताते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि, ‘‘हिन्दू धर्म सभी प्रकार के धार्मिक विचारों तथा सभी प्रकार की आराधनाओं का समन्वय करता है । ’’वेदान्त दर्शन की व्याख्या के साथ-साथ परमेश्वर की सगुण उपासना का महत्व समझाते हुए उन्होंने सार्वभौमिक धर्म के विषय में उम्मीद जतायी और कहा- ‘‘जो किसी देश और काल से सीमाबद्ध नहीं होगा – वह उस असीम ईश्वर के समान ही असीम होगा, जो संसार के सभी कोटियों के सभी प्राणियो। पर एक सा प्रकाश वितरण करता रहेगा । यह विश्वधर्म सभी धर्मों की अच्छाइयों को अपने बाहुपाश में आबद्ध कर लेगा और मानवता को सुकार्य एवं प्रेम का संदेश देगा । ’’इसी दिन स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका को सम्बोधित करते हुए कहा,- ‘‘ऐ स्वाधीनता की मातृभूमि कोलम्बिया, तू धन्य है । यह तेरा सौभाग्य है कि तूने अपने पड़ोसियों के रक्त से अपने हाथ नहीं भिगोये, तूने अपने पड़ोसियों का सर्वस्व हरण कर सहज में ही धनी और सम्पन्न होने की चेश्टा नहीं की, अतएव समन्वय की ध्वजा फहराते हुए सभ्यता की अग्रणी होकर चलने का सौभाग्य तेरा ही था । ’’20सितम्बर को ‘‘धर्म भारत की प्रधान आवश्यकता नही। ’’विषय पर अपने छोटे से भाषण में ईसाइयों के द्वारा भारत में भेजे हुए धर्म प्रचारकों की कटु निन्दा करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा, -‘‘आप ईसाई लोग जो मूर्तिपूजकों की आत्मा का उद्धार करने के लिए धर्म प्रचारकों को भेजने के लिए इतने उत्सुक रहते है। उनके शरीरों को भूख से मर जाने से बचाने के लिए कुछ क्यों नहीं करते?……………आप लोग सारे भारत में जाकर गिरजे बनवाते हैं, पर पूर्व का प्रधान अभाव धर्म नहीं है, उनके पास धर्म पर्याप्त है ।’’ 26सितम्बर को ‘‘बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म की निष्पत्ति’’ विषय पर व्याख्यान में स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू धर्म को बौद्ध धर्म की जननी बताया तथा बौद्ध धर्म की मौलिकताओं को भी बताया । स्वामी ने कहा,-‘‘हिन्दू धर्म बौद्ध धर्म के बिना नहीं रह सकता और न बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के बिना ही । हिन्दू धर्म का पाण्डित्यपूर्ण दर्शन और बौद्ध धर्म का विशाल ह्दय दोनों जब तक पृथक पृथक रहेंगें, भारत का पतन अवश्यंभावी है, दोनो के सम्मिलन से ही भारत का कल्याण सम्भव है । ’’विश्व धर्म महासभा के अन्तिम दिन 27 सितम्बर को स्वामी विवेकानन्द ने अपने विचार रखते हुए कहा,-‘‘इस महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है, तो वह यह है-इसने यह सिद्ध कर दिया है कि शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकान्तिक सम्पत्ति नहीं है एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत चरित्र स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है । ……….शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के रहते हुए प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा होगा-‘‘सहायता करो, लड़ो मत । पर भाव ग्रहण, न कि पर भाव विनाश, समन्वय और शान्ति न कि मतभेद और कलह ।’’
शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यानों ने अज्ञात, अपरिचित गेरूआ वस्त्रधारी भारत के इस सन्यासी की प्रसिद्धी बढ़ा दी। जगह-जगह बड़ी-बड़ी आदमकद तस्वीरें लगाकर आदर प्रकट किया गया । न्यूयार्क हेराल्ड ने लिखा,-‘‘धर्म महासभा में वे निःसन्देह सर्वश्रेश्ठ व्यक्ति हैं । उन्हे सुनने के बाद लगता है कि उनके देश में हम धर्म प्रचारकों को भेजकर कैसा मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं । ’’विभिन्न समाचार पत्रों ने भारत के इस युवा सन्यासी के प्रशंसा में लेख लिखे । धर्मसभा में स्वामी विवेकानन्द को मिली सफलता एवं यश के समाचार भारत में भी पहूँचा । देश में एक आत्मगौरव की लहर तेजी से व्याप्त हो गई । आत्महीनता का स्थान आत्मगौरव ने ले लिया। तप और वैराग्य की घनीभूत शक्ति, गुरूदेव, माँ जगदम्बा, माता तथा माँ सरस्वती के आषीर्वाद से स्वामी विवेकानन्द ने देश के जनमानस को आत्मविभोर कर, आत्मगौरव का अहसास करा दिया। शिकागो के इस धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने अपने कथन,- ‘‘जब भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तब यह सिद्ध होगा कि धर्म के विषय में और ललित कलाओं में भारत सारे विश्व का प्रथम गुरू है ’’को अक्षरशः सिद्ध कर दिखाया था ।iv>
Saturday, September 8, 2012
कांग्रेस हराओ-देश बचाओ --- अरविन्द विद्रोही
Wednesday, September 5, 2012
विद्यार्थी की मनोकामना - ईश्वर से प्रार्थना ------------- अरविन्द विद्रोही
Subscribe to:
Posts (Atom)
