Saturday, November 27, 2010
छात्र संघ की बहाली लोकतान्त्रिक अधिकार
अरविन्द विद्रोही
भारतीय राजनीति आज समाजसेवा का माध्यम न रहकर सत्ता प्राप्ति और सुनियोजित तरीके से जनता की मेहनत की कमाई को लूटने का जरिया बन गई है।लोकसभा चुनावों में,विधानसभा चुनावों में,पंचायती चुनावों में प्रत्याशियों के द्वारा चुनाव में विजयी होने के लिए अपनाये जाने वाले अनैतिक एवं असंवैधानिक कृत्यों को सभी जानते भी हैं और स्वीकारते भी हैं।समस्त राजनैतिक दल पूरे जोशो-खरोश से युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए नाना प्रकार के लोक-लुभावन वायदे करते नजर आते हैं।अधेड़ हो चुके अपने अनुभव हीन पुत्रों को तमाम राजनेता युवा नेता के रूप् में प्रस्तुत करके किसी साज-सज्जा की,उपभोग की वस्तु की तरह प्रचारित-प्रसारित करने में करोड़ों रूपया खर्च कर चुके हैं।आज 18वर्ष की उम्र का कोई भी युवा अपना मत चुनावों में अपना जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने में दे सकता है।
लोकतंत्र का दुर्भाग्य कहें या वंशानुगत राजनीति का प्रभाव कहें कि भारत में प्रधान से लेकर सांसद तक के निर्वाचन में अपना मत देने वाला युवा वर्ग अपने शिक्षण संस्थान में अपना छात्र-संघ का प्रतिनिधि नहीं निर्वाचित कर सकता है।कारण है छात्र संघों का निर्वाचन बन्द होना।छात्र राजनीति लोकतांत्रिक राजनीति की प्रयोगात्मक,शिक्षात्मक व प्राथमिक पाठशाला होती है और इस राजनीति पर प्रतिबन्ध लगाकर अपने क्षमता के बूते छात्र-छात्राओं के हितों के लिए संघर्ष करके राजनीति में आये गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि के होनहारों को राजनीति में अपना स्थान बनाने से रोकने के लिए यह दुष्चक्र रचा गया है।यह दुष्चक्र युवा वर्ग ही तोडेगा,इसमें तनिक भी सन्देह की गुंजाइश नही है।क्या सिर्फ इस दौरान आम युवा वर्ग को राजनीति में आने से रोकने का दुष्चक्र रचा गया है?नहीं.....छात्र-संघ पर प्रतिबन्ध लगाना,युवा वर्ग राजनीति में प्रवेश न करे इसका प्रयास पूर्व में भी किया गया है।लेकिन घ्यान रखना चाहिए कि भारत ही नहीं समूचे विश्व के इतिहास में जब भी तरूणाई ने अव्यवस्था के खिलाफ अंगड़ाई मात्र ही ली तो परिणामस्वरूप बड़ी-बड़ी सल्तनतें धूल चाटने लगी।क्रांति व युद्ध का सेहरा सदैव नौजवानों के ही माथे रहा है।छात्र-संघ बहाली की लड़ाई ने अब जोर पकड़ना प्रारम्भ कर दिया है।केन्द्र सरकार की सर्वेसर्वा सोनिया गॉंधी को इलाहाबाद यात्रा के दौरान छात्रों विशेषकर समाजवादी पार्टी के युवाओं ने भ्रष्टाचार-महॅंगाई आदि मुद्दों पर अपने विरोध प्रदर्शन से लोहिया के अन्याय के खिलाफ संघर्ष के सिद्धान्त को कर्म में उतार कर खुद को साबित किया है।अब छात्र-छात्राओं,युवा वर्ग को अपने जनतांत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़कर अधिकार हासिल करके खामोश नहीं बैठना है वरन् सतत् संघर्ष का रास्ता अख्तियार करके वंशानुगत राजनीति की यह जो विष बेल बड़ी तेजी से भारतीय लोकतंत्र में फैल रही है,इसकी जड़ में मठ्ठा डालने का काम भी करना है।छात्र-संघों का चुनाव न कराना एक बड़ा ही सुनियोजित षड़यंत्र है-आम जन के युवाओं को राजनीति में संघर्ष के रास्ते से आने की।
इसी प्रकार से जंग-ए-आजादी के दौरान तमाम् नेता विद्यार्थियों को राजनीति में,क्रंाति के कामों में हिस्सा न लेने की सलाहें देते थे,जिसके जवाब में क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिेह ने किरती के जुलाई,1928 के अंक में सम्पादकीय विचार में एक लेख लिखा था।इस लेख में भगत सिंह ने लिखा था,-‘‘दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है?महात्मा गॉंधी,जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति,पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ?क्या वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं?सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं?कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज?फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ।क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए?हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करने वाले वफादार नहीं,बल्कि गद्दार हैं,इन्सान नहीं,पशु हैं,पेट के गुलाम हैं।तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।‘‘
आज भगत सिंह के इस लेख के 82 वर्ष एवं भारत की ब्रितानिया दासता से मुक्ति के 63वर्ष बाद भी युवा वर्ग को मानसिक गुलामी का पाठ पढ़ाने का,वंशानुगत राजनैतिक चाकरी करवाने का दुष्चक्र रचा गया है।छात्र-संघ को बहाल न करना तथा अपने दल में छात्र व युवा संगठन रखना राजनैतिक दास बनाने के समान नहीं तो ओर क्या है?क्रंातिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह ने अपने इसी लेख में आगे लिखा,-‘‘सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत है,जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दें।लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे?क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फॅंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे?यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फॅंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो।‘‘
आज आजाद भारत में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हरण किया जा रहा है।सत्ताधारी दलों की निरंकुशता का चाबुक छात्र हितों व छात्र राजनीति पर बारम्बार प्रहार करके राजनीति के प्राथमिक स्तर को नष्ट करने पर आमादा है।इन छात्र-युवा जन विरोधी सरकारों को छात्र-संघ बहाली का ज्ञापन देना,इनसे अपने अधिकारों की बहाली की मांग करना अन्धे के आगे रोना,अपना दीदा खेाना के समान है।सन् 1960-62 में डा0राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था-देश गरमाओं।जिसका अर्थ है,-‘‘आदमी को अन्याय और अत्याचार पूर्ण रूतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार करना।दरअसल अन्याय का विरोघ करने की अीदत बन जानी चाहिए।आज ऐसा नहीं है।आदमी लम्बे अर्से तक गद्दी की गुलामी और बहुत थोडें अर्से के लिए उससे नाराजगी के बीच एक अन्तर करता रहता है।‘‘वर्तमान समय में छात्र संघ की बहाली व छात्र हितों की आवाज उठाने वाले लोगों को शासन-सत्ता व भाड़े के गुलामों के दम पर कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।छात्र संघ बहाली के लिए आंदोलित सभी छात्र-युवा संगठनों को एक साथ आकर अनवरत् सत्याग्रह व हर सम्भव संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना चाहिए।
Wednesday, November 24, 2010
संघर्ष के रास्ते से समाजवादी राज्य की स्थापना
संघर्ष के रास्ते से समाजवादी राज्य की स्थापना
अरविन्द विद्रोहीसमाजवाद और समाजवादी आन्दोलन ही किसानों,मजदूरों,छात्र-छात्राओं,महिलाओं एवं आम जनों के अधिकार बहाली का एकमात्र रास्ता है।पूँजीवाद का राक्षस समाज के प्रत्येक अंग को निगल चुका है। भ्रष्टाचारियों का काकस समाज व देश का रक्त चूसता ही चला जा रहा है।पूँजीवाद के राक्षस और भ्रष्टाचार के दानव का मुकाबला आम जन में सदाचरण, नैतिकता, सामूहिकता, सामाजिक एकता व देश-प्रेम के बीज रोपित,अंकुरित,पोषित व पल्लवित करके ही किये जा सकते हैं।शासन सत्ता के जिम्मेदार लोग भ्रष्टाचार में सराबोर होकर बेशर्मी का लबादा पहने हुए भारत के लोकतन्त्र को भीड़तन्त्र में तब्दील करके एक कुशल चरवाहे की तरह भारतीय जनमानस को जानवरों की मानिन्द हांक रहें हैं।
जनता के प्रतिनिधि आज अव्वल दर्जे के स्वार्थी हो गये हैं।राजनीति में सत्ता प्राप्ति और सत्ता प्राप्ति के पश्चात् जनता के द्वारा दिये गये विभिन्न राजस्व करों से अर्जित धन से बने विकास कार्यों के प्रचुर धन की लूट व बन्दर-बाँट ही इनकी राजनीति का प्रमुख उद्देश्य बन चुका है।आज महामानव महात्मा गाँधी के ग्राम्य स्वराज्य की कल्पना अनियंत्रित व अनियोजित औद्योगीकरण के चलते दम तोड़ चुकी है।क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता भगत सिंह के अनुसार-क्रांति की वास्तविक सेनायें किसान व मजदूर हैं,और आज भी भारत का किसान अपनी कृषि गत् समसयाओं से परेशान है,किसान अपनी कृषि योग्य बेशकीमती भूमि के मनमाने अधिग्रहण से भयाक्रांत है।किसान को खाद,बीज,सिंचाई,बिजली,शिक्षा,स्वास्थ्य परक सुविधा कुछ भी समय पर पूर्णतःमयस्सर नहीं है।मजदूर कल-कारखानों के मालिकान की शोषक नीति के शिकार हो कर दयनीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
डा0राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि लोग मेरी बात सुनेंगें जरूर,लेकिन मेरे मरने के बात।डा0लोहिया की बातें मात्र 12वर्ष की उम्र में ही आत्मसात् कर चुके,आज 72वर्ष की उम्र के मुलायम सिंह यादव ने डा0लोहिया के विचारों व समाजवाद की अग्नि को प्रज्जवलित करे रहने का बहुत ही बड़ा, नेक,सराहनीय व अनुकरणीय काम किया है।संघर्षों की ज्वाला में तपकर व समाजवादी मूल्यों की बदौलत मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनैतिक जीवन में अपना लोहा समस्त राजनैतिक दलों व नेताओं को मनवाया।मुलायम सिंह यादव की राजनैतिक-मानसिक दृढ़ता का कारण उनकी महात्मा गाँधी,भगत सिंह,डा0लोहिया,चैधरी चरण सिंह जैसी महीन विभूतियों के आदर्शों,विचारों पर पकड़ और अनवरत् चलते रहने का संकल्प ही है,एैसा मेरा अपना मानना है।अब समाजवादी आन्दोलन,लोहिया के लोगों,समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं,मुलायम सिंह यादव के अनुयायियों को समाजवाद के मायने व समाजवादी आन्दोलन व कार्यक्रम पुनःपढ़ना चाहिए।डा0लोहिया के द्वारा प्रदत्त कार्यक्रम समाजवादी विचारधारा व आन्दोलन के प्राण हैं।डा0लोहिया के कार्यक्रमों पर चले बगैर,जनता को साथ लिए बगैर,सामाजिक चेतना का काम किए बगैर कोई भी पक्का समाजवादी कार्यकर्ता नहीं हो सकता है।अपने को समाजवादी कहने मात्र से,किसी समाजवादी संगठन में पदाधिकारी हो जाने मात्र से कोई समाजवादी नही हो जाता है।समाजवादी तो वही है जिसने समाजवाद के सिद्धान्तों को आत्मसात् किया हो,उन सिद्धान्तों पर चला हो,अड़िग रहा हो,जिसके लिए राजनीति सत्ता साधन मात्र हो-साध्य नही।समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव समाजवाद की कसौटियों पर खरे साबित हो चुके हैं।13मार्च,2003 को समाजवादी पार्टी के विशेष राष्टीय सम्मेलन में मुलायम सिंह यादव ने कहा,‘‘क्या याद है,4-5नवम्बर1992 को जिस बेगम हजरत महल पार्क के ऐतिहासिक मैदान में फैसला लिया था,संकल्प किया था,क्या वह संकल्प याद है?क्या आप उस संकल्प पर चलने के लिए तैयार हैं?इसीलिए हम कहते हैं कि किस खेत की मूली है यह सरकार,चाहे वह दिल्ली की हो,चाहे उत्तर-प्रदेश की हो।हम लोग वे लोग हैं जो देश के गरीब लोगों के लिए इस देश के नौजवान विद्यार्थियों के लिए,इस देश के किसानों के लिए,झुग्गी-झोपड़ी वाले लोगों के लिए जिन्होंने 56साल की आजादी के बाद भी पक्की छत नहीं देखी,उनको छत दिलाने के लिए,नौजवानों को रोजगार दिलाने के लिए,किसानों की लूट बचाने के लिए,वैट द्वारा व्यापारियों को आतंकित करके उनका पूरा धंधा बर्बाद करने के खिलाफ,मँहगाई बढ़ाने के खिलाफ,इस देश के विकास के लिए,उत्तर प्रदेश के विकास के लिए,सारे हिन्दुस्तान के विकास के लिए,चाहे हम लोगों को खून नहीं,जीवन की आहुति भी देनी पड़ेगी तो देंगें,हम इस व्यवस्था को बदलेंगे।’’
और आज नवम्बर,2010 में,वर्तमान परिस्थितियों में समाजवादी आन्दोलन से जुड़े लोगों विशेषकर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं,पदाधिकारियों को आम जनता के मुद्दों पर संघर्ष की तैयारी करके संगठन करना चाहिए।मुलायम सिंह यादव में यह क्षमता विद्यमान है कि वे जनता के हित के मुद्दों पर आन्दोलन खड़ा कर देते हैं।समाजवादी आन्दोलन को अब कर्म प्रधान कार्यकर्ताओं की पुनःआवश्यकता आन पड़ी है।देश की समस्याओं,जनता के बुनियादी अधिकार व समाज के प्रति कत्र्तव्यों पर मुखरित होकर ही समाजवादी आन्दोलन अपना विकास कर सकता है।राजनीति का व्यवसायीकरण व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की राजनीति में प्रभावी कब्जेदारी के खिलाफ मोर्चा समाजवादियों को ही सम्भालना होगा।डा0लोहिया के कार्यक्रम क्रमशःसमान शिक्षा नीति,विशेष अवसर व समता के सिद्धान्त,चैखम्भा राज,पंचायती राज का अनुपालन,अल्पसंख्यकों की समस्याओं,न्यूनतम मजदूरी,कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण का विरोध,भारतीय संस्कृति का सर्व-धर्म समभाव प्रधान रूप,हिन्दी का प्रसार आदि वैचारिक क्रांति के रूप में हैं।इन कार्यक्रमों के जमीनी संचालन से एक लहर उत्पन्न होगी जो देश के समस्त समाजवादियों को जागृत करके देश को सशक्त-समृद्ध बनायेगी।प्रसिद्ध समाजवादी लेखक लक्ष्मीकांत वर्मा के कथनानुसार-कर्म और ज्ञान,बुद्धि और हाथ,चिन्तन और वाणी एक सजग प्रहरी के रूप में यदि समाजवादी आन्दोलन को दिशा देंगें और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में निरन्तर धार पैदा होती रहेगी तो निश्चय ही समाजवादी आन्दोलन का भविष्य उज्जवल होगा।
समाजवादी आन्दोलन,डा0लोहिया की सोच,मुलायम सिंह यादव का समाजवादी राज्य स्थापना का प्रयास व संकल्प तभी साकार हो सकते हैं,जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता व पदाधिकारी कर्म के क्षेत्र में समाजवादी विचारों को आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करें।
Sunday, November 21, 2010
समाजवादी आन्दोलन,संघर्ष और मुलायम सिंह यादव
समाजवादी आन्दोलन,संघर्ष और मुलायम सिंह यादव
अरविन्द विद्रोही
समाजवादी आन्दोलन की विरासत को संजोंये हुए धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री उ0प्र0शासन के पद पर रहते हुए 1995 में कहा था,-डा0लोहिया जरूर चले गये हैं दुनिया से लेकिन उनके विचारों को कोई मिटा नहीं सकता।उनके विचारों पर चलना पडे़गा।आज उसी पर चलने की हम लोग कोशिश कर रहें हैं।चाहे विशेष अवसर की नीति हो,चाहे भूमि सेना का गठन हो,चाहे अंग्रेजी हटाओ का आन्दोलन हो,उसका समर्थन हम आज कर रहे हैं,सरकार में रहकर भी कर रहे हैं।
भारत में समाजवाद की सोच,विचारधारा का जन्म भारत की ब्रितानिया हुकूमत से जंग-ए-आजादी के दौरान जेल के सींखचों,काल कोठरी में हुआ था।राजनैतिक आजादी व मूल्यों के साथ-साथ भारत में समाजवाद मूलतःनैतिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है।समाजवादी आन्दोलन के पुरोधा आचार्य नरेन्द्र देव ने महात्मा गाँधी के जीवन दर्शन,व्यक्तित्व व जंग-ए-आजादी के आन्दोलन की जानकारी हासिल करके ही समाजवादी आन्दोलन को समझने पर जोर दिया था।लोकनायक जयप्रकाश नारायण अपने जीवन की अंतिम सांस तक समाजवाद,गाँधीवाद,सर्वोदय ओर सम्पूर्ण क्रंाति की अवधारणाओं के लिए जूझते रहे।जे0पी0 का भी सारा आन्दोलन गाँधी जी के सिद्धान्तों और समाजवाद के समीकरणों पर ही आधारित है।समाजवादी संगठन और समाजवादी नेता पूर्णरूपेण महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित थे।दरअसल वास्तविकता ही है कि डा0लोहिया के देहावसान के पश्चात् समाजवादी आन्दोलन में बिखराव आ गया।जे0पी0 का व्यवस्था परिवर्तन के लिए खड़ा किया गया जनान्दोलन मात्र सत्ता परिवर्तन बन के रह गया।डा0लोहिया के बाद,1967 से लेकर 1992 तक के बीच समाजवादी आन्दोलन निरन्तर बिखरता और टूटता ही रहा।निरन्तर टूटन के बावजूद आज समाजवादी आन्दोलन की प्रासंगिकता बनी रहने के पीछे मुख्य बात यह है कि 1992 से जब से मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की पुर्नस्थापना की और 4-5नवम्बर,1992 को बेगम हजरत महल पार्क लखनउ में सम्पन्न हुए समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन में भारत के लगभग सभी प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।इस सम्मेलन से मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर डा0लोहिया के कार्यक्रम अन्याय के विरूद्ध सिविल नाफरमानी,सत्याग्रह,मारेंगें नहीं लेकिन मानेंगें नहीं,अहिंसा,लघु उद्योग,कुटीर उद्योग आदि मुद्दों को जीवित करने का सराहनीय कार्य किया।इस वक्त की चुनौतियों को स्वीकार करके मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी चरित्र के वास्तविक रूप को उभारा।डा0लोहिया के दामन को जिस इच्छा शक्ति के सहारे मुलायम सिंह यादव ने पकड़ा था,उसी इच्छा शक्ति को लोगों ने जिद्दीपन भी करार दिया।भारतीय राजनैतिक पार्टियों की कार्यशैली और संगठनात्मक प्रक्रिया में निरन्तर गिरावट जारी थी और आज भी जारी है।भीड़ का पैमाना ही राजनीति की सफलता आंकी जाती रही है।समाजवादी पार्टी के इस स्थापना सम्मेलन में सबसे अच्छी बात थी कि इसमें भीड़ की जगह तपे तपाये समाजवादी विचारों के वाहक गण थे।यह समाजवादी विचारों के लोग लोहिया के विचारों और समाजवाद की स्थापना के ध्येय से एकत्र हुए थे।इस समय तक समाजवादी डा0लोहिया द्वारा दिये गये सटीक मुहावरों व नारों को लगभग विस्मृत कर चुका था।डा0लोहिया के मुहावरे वैचारिक सोच को तीव्र करने के साथ-साथ कर्म करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।अंग्रेजी हटाओ, जाति तोड़ो,दाम बांधो,हिमालय बचाओ इन सब आन्दोलनों में कर्म की प्रधानता के साथ-साथ प्रेरक शक्ति भी है।डा0लोहिया के विचारों और अनुशासन की छत्रछाया में मुलायम सिंह यादव ने कर्म और भाषा को एक साथ मिलाकर सकारात्मक रूप प्रदान करने की कार्यशैली को पुर्नजीवित किया।गाँव को आत्मनिर्भरता के प्रश्न पर मुलायम सिंह ने कहा था,‘‘हम चाहते है। कि हमारे गाँवों का विकास हो,प्राथमिकता गाँव के विकास की हो’’व्यवस्था के सवाल पर मुलायम सिंह ने कहा था,‘‘व्यवस्था परिवर्तन का मतलब है सामाजिक परिवर्तन,सामाजिक परिवर्तन का मतलब सामाजिक न्याय नहीं है। सामाजिक न्याय तो केवल एक अंग है सामाजिक परिवर्तन का।जहाँ पर पिछड़ों का बहुमत है,वे दबंग हैं और अगड़ी जाति के लोग कमजोर हैं,तो अगड़ी जाति के लोगों को भी वहाँ परेशान किया जाता है।गाँव में उनका पानी रोका जाता है,नाला रोका जाता है,ट्यूबवेल पर पानी नहीं लगाने देते।यह भी स्थिति आज है।इसलिए हम सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं,व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं,सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं जिसमें शोषण व अत्याचार समाज में किसी का भी न हो।चाहे गरीब हो,चाहे अमीर हो,चाहे अगड़ा हो,चाहे पिछड़ा हो।इस तरह का समाज हम चाहते हैं।हम समता चाहते हैं,सम्पन्नता चाहते हैं,परिवर्तन चाहते हैं,बख्शीश की राजनीति खत्म करना चाहते हैं,ताकि समाज में कोई किसी की कृपा पर न रहे।ऐसा समाज बनाने का हमारा सपना है।इसीलिए हम चाहते हैं कि हमारा देश स्वावलम्बी बने।देश स्वावलम्बी बनेगा तो हमारा स्वाभिमान जागेगा,हमारे देश का स्वाभिमान जाग जायेगा।हम अपने गौरव को,स्वाभिमान को कायम रखना चाहते है। और आगे बढ़ाना चाहते है।।यही हमारी नीति है।’’इस वचन पर मुलायम सिेह यादव ने कभी समझौता नही किया।
आज भी बहुत से पेशेवर और शौकिया राजनीति करने वाले यह समझते हैं कि समाजवादी आन्दोलन और समाजवादी पार्टी का गठन चुनाव और सत्ता पर काबिज होने के उद्देश्य मात्र के लिए मुलायम सिेह यादव ने किया है।डा0 लोहिया के व्यक्तित्व को आत्मसात् कर चुके मुलायम सिेह यादव जब डा0 लोहिया के ही अंदाज में मैं अकेले ही चलूगा का उद्घोष करते हैं तो लोग परेशान हो जाते हैं।मात्र 12वर्ष की उम्र में ही डा0राम मनोहर लोहिया के नहर आन्दोलन में जेल जाने वाले मुलायम सिंह यादव का राजनैतिक जीवन संघर्षों व त्याग-समर्पण की देन है।मुलायम सिंह यादव ने कई बार अपने भाषणों में कहा है कि,-देश की एकता और अखण्डता,आर्थिक शोषण से मुक्ति तथा दलितों और पिछडे वर्गों के हितों की रक्षा और अल्पसंख्यक मुसलमानों और हर प्रकार से पीड़ित नारी जाति की मुक्ति के लिए उन्होंने समाजवादी पार्टी का पुर्नगठन किया है।सत्ता साधन है,साध्य नहीं हो सकती है,उनकी समाजवादी पार्टी सत्ता में आये या न आये किन्तु उनकी नीतियों में परिवर्तन नहीं हो आयेगा।आज की तारीख में भी समाजवादी विचारधारा के लोग,आम जन को अगर किसी राजनैतिज्ञ से जनता के हित के लिए संघर्ष की आशा रखता है तो वह सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी के अगुआ मुलायम सिंह यादव ही हैं।उ0प्र0 सहित समूचे देश में किसान बेहाल है,भूमि अधिग्रहण के मामलो ने किसानों को संकट में डाल दिया है।मंहगाई के दानव ने आम नागरिकों की दो वक्त की रोटी को भी निगल लिया है।मंहगाई के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन ने समाजवादी नेतृत्व के प्रति जनता में विश्वास जगाया है।
मुलायम सिंह यादव अपने संघर्ष व नेतृत्व क्षमता की बदौलत आज समाजवादी आन्दोलन के सबसे बड़े अगुआ व संगठनकर्ता हैं।मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को समाजवादी आन्दोलन का पुनः अध्ययन करना चाहिए।तात्कालिक अन्याय का प्रतिरोध जिस बेबाकी से और बिना राजनैतिक नुकसान की परवाह किये मुलायम सिंह यादव करते हैं वह एक नजीर के रूप में सभी के सामने है।डा0 लोहिया के शिष्य मुलायम सिंह यादव ने तो अपने जीवन में अपने नेता लोहिया के सिद्धान्त व विचारों को आत्मसात् किया और उनको बखूबी निभाया भी।लेकिन अफसोस जनक बाद यह है कि समाजवादी पार्टी के लोग अपने नेता मुलायम सिंह यादव के संघर्ष-कत्र्तव्य पथ पर चलने की जगह सिर्फ सियासी गोष्ठियों और चुनावी तिकड़म में लगे रहते हैं।समाजवादी आन्दोलन व पार्टी की स्थापना सत्ता पाना ही नहीं है-यह तथ्य जब तक समाजवादी पार्टी के लोगों के द्वारा आत्मसात् नहीं किया जायेगा,तब तक कोई भी बड़ा संघर्ष व आन्दोलन नही खडा हो पायेगा।डा0 लोहिया के कार्यक्रम जो कि मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन के लक्ष्य बना लिए,उन लक्ष्यों को पूरा करने का जज्बा अब समाजवादियों में दिखाई पड़ना चाहिए।छात्रसंघ बहाली का आन्दोलन,मंहगाई के खिलाफ संघर्ष,भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा,नौकरशाही व भ्रष्टाचार के खिलाफ जन जागरण अभियान,हिन्दी आन्दोलन,बिजली की समस्या पर लगातार आन्दोलन,जन समस्याओं पर जेल भरो आन्दोलन लगातार चलाते रहना समाजवादी आनदोलन की मूल प्रवृत्ति है।जनता के लिए,जनता के मुद्दों पर संघर्ष तैयार करना समाजवादी आन्दोलन की पहचान है और इस पहचान को बनाये रखने में मुलायम सिंह यादव सदैव सफल रहे हैं।अब खुद को डा0 लोहिया,मुलायम सिंह यादव और समाजवादी आन्दोलन का सिपाही साबित करने की बारी समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की है।
Wednesday, November 17, 2010
बाघा यतीन्द्र नाथ मुखर्जी
बाघा यतीन्द्र नाथ मुखर्जी
8दिसम्बर,1879को काया ग्राम,जनपद नदिया-कुष्टिया,पश्चिम बंगााल में एक प्रतिभाशाली विद्वान श्री उमेश चन्द्र मुखर्जी के एवं उच्च कोटि की कवियत्री मांॅ शरत शशि देवी के पुत्र रत्न रूप में यतीन्द्र नाथ मुखर्जी का जन्म हुआ।मात्र 5वर्ष की उम्र में पिता का साया यतीन्द्र के सिर से उठ गया।1899 में फैले प्लेग की बीमारी के दौरान मरीजों की सेवा करते हुए यतीन्द्र की समाज सेवी माॅं शरत शशि देवी की रोग ग्रस्त हो जाने के कारण मृत्यु हो गयी।माॅं की मृत्यु के पश्चात् यतीन्द्र को अपनी बडी बहन श्रीमती विनोद बाला का ममत्व भरा संरक्षण मिला।बहन की देख-रेख में यतीन्द्र ने इण्टर-मीडियट तक की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् शार्ट हैण्ड और टाइपिंग सीखी।यतीन्द्र ने जीविकोपार्जन हेतु बंगाल सचिवालय में स्टेनोग्राफर के पद पर नौकरी की।सचिवालय के गुलामी भरे वातावरण में यतीन्द्र के ह्दय में कोने में दबा हुआ क्रंातिकारी जाग गया।यतीन्द्र का एक बार रेल यात्रा के दौरान फौज के अंग्रेज सिपाहियों से झगड़ा हो गया।उन चार फौजियों को यतीन्द्र ने अकेले ही पीट डाला।उन्होंने यतीन्द्र के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी तथा अभियोग भी चला,परन्तु यह मुकद्मा ही वापस लेना क्योंकि अदालत को यह विश्वास दिलाना उनके लिए असंभव हो गया कि एक व्यक्ति ने अकेले ही चार फौजियों को पीटा।लेकिन इस घटना के कारण यतीन्द्र नौकरी से निकाल दिये गये।माॅं समान बडी बहन विनोद बाला ने गृहस्थी का बोझ डालते हुए यतीन्द्र का विवाह अप्रैल,1900 में इन्दुबाला नामक युवती से करा दिया।यतीन्द्र को तीन संताने क्रमशःतेजेन,वीरेन और आशालता की प्राप्ति हुई।
यतीन्द्र गृहस्थ होकर भी गृहस्थ जीवन में लिप्त न हो पाये।हरिद्वार के प्रसिद्ध सन्त भोलानाथ गिरि के परम् शिष्य यतीन्द्र ने अपने विद्वान व देशभक्त गुरू भोलानाथ गिरि की प्रेरणा से गीता का पाठ कर गीता-प्रेमी बन गये।आत्मा की अमरता का सिद्धान्त गीता से आत्मसात् करके यतीन्द्र अब देश के प्रति कत्र्तव्य पथ के पथिक बन गये।पारिवारिक जीविका व क्रांतिकारी संगठन चलाने हेतु यतीन्द्र ठेकेदारी करने लगे।ठेकेदारी के काम में यतीप्द्र को भरपूर लाभ होने लगा।यतीन्द्र ने अपने साथ उत्साही एवं आस्थावान नवयुवकों को जोड़ना प्रारम्भ कर दिया।प्रत्येक नवयुवक का ख्याल रखते थे-यतीन्द्र एवं यदि किसी को आर्थिक मदद की जरूरत पडती तो आर्थिक मदद भी करते थे।उम्र एवं अनुभव में बडे होने के कारण ये सभी नवयुवक यतीन्द्र को जतीन दा कहते थे।चारूचन्द्र बोस,वीरेन्द्रनाथ दत्त,चित्तप्रिय रे ,भोलानाथ चटर्जी,मनोरंजन सेन गुप्त,वीरेन्द्र नाथ दास गुप्त,ज्योतिष चन्द्र पाल आदि नवयुवक अपने जतीन दा के इशारे पर किसी की भी जान ले सकते थे तथा उनके लिए कभी भी जन दे भी सकते थे।यतीन्द्र कोमलता,मानवता,देशप्रेम और क्रांति की प्रतिमूर्ति थे।सुन्दर और बलशाली यतीन्द्र ने 26वर्ष की उम्र में एक शाही बाघ से लड कर और उसको मारकर बाघा की उपाधि प्राप्त की थी।तभी से यतीन्द्र बाघा जतीन के नाम से प्रसिद्ध हुए थे।जतीन के व्यक्तित्व से रवीन्द्र नाथ टैगोर,योगी श्री अरविन्द घोष,स्वामी विवेकानन्द,श्राी जगदीश चन्द्र बसु,बहन निवेदिता आदि महान विभूतियां जतीन से बहुत प्रभावित थी।जतीन के शौर्य,देशभक्ति से अंग्रेज भयाक्रांत हो गये थे।
बाघा जतीन ने अपने साथियों के साथ मिल कर बंगाल में दर्जनों राजनैतिक डकैतियां डाली।अंग्रेजों के संस्थानों में दिन-दहाडे़ डकैतियां डाली गईं तथा अनेकों कत्ल किये गये।अंग्रेज बाघा जतीन से बहुत भयभीत होकर शहर बहुत कम निकलते थे।क्रांतिकारी मौत बनकर अंग्रेजों के मनो-मस्तिष्क में छा गये थे।बाघा जतीन को पुलिस ने हावडा षड़यंत्र केस में सन्1910-11 में दो बार हिरासत में लिए गये,किन्तु कुछ माह कारागार में रहने के पश्चात् सबूतों के अभाव में यतीन्द्र रिहा हो गये।बलिया घाट तथा गार्डन रीच की डकैतियां भी बाघा जतीन के द्वारा की गई थी।जेल से रिहा होने के बाद अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य बने बाघा जतीन ने युगान्तर का भी कार्य संभाला।बाघा जतीन ने एक लेख में लिखाः-पॅंूजीवाद समाप्त कर श्रेणी हीन समाज की स्थापना क्रांतिकारियों का लक्ष्य है।देशी-विदेशी शोषण से मुक्त कराना और आत्म-निर्णय द्वारा जीवन यापन का अवसर देना हमारी मांग है।अदालत से बरी बाघा जतीन पर पुलिस की पैनी नजर थी।2फरवरी,1915 को एक मकान में जतीन व साथी बैठ कर कोई योजना बना रहे थे,तभी वहां सी0आई0डी0 पुलिस इंस्पेक्टर निरोध हलधर आ धमका।मजबूरन हलधर को मौत के घाट उतार कर इन क्रांतिकारियों को मकान छोड़कर फरार होना पडा।
सन्1914 में विश्व युद्ध छिडने पर गदर पार्टी ने भारत में आजादी का जंग छेडने की योजना बनाई थी।इस योजना के सूत्रधार रासबिहारी बोस,करतार सिंह सराभा,शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रयास विफल रहा था।लेकिन इसके बावजूद भारत में बाघा जतीन अपने साथियों के साथ क्रांति की अलख जगाने में जुटे रहे।सितम्बर,1915 में मेवरिक नामक जर्मन जहाज को कैप्टीपोदा,बालासोर-उड़ीसा युद्ध की सामग्री लेकर पहुॅंचना था।इस जहाज से हथियार उतारने की जिम्मेदारी बाघा जतीन की थी।अपने साथियों के साथ बाघा जतीन मार्च,1915 में ही बालासोर आ गये।जतीन साधु तथा मनोरंजन और चित्तप्रिय उनके शिष्य बनकर मालदीव मौजा में रहने लगे।आश्रम से कुछ ही दूरी पर तालडीह गाॅंव में नीरेन्द्रनाथ दास गुप्त और ज्योतिष चन्द्र पाल खेती-बाड़ी करने वाले किसान बनकर रहने लगे।यूनिवर्सल इम्पोरियम नामक साईकिल व घड़ी की दुकान बालासोर में खोलकर अन्य साथी गण वहां जम गये।बालासोर एक एकांत व शान्त क्षेत्र था।जतीन व साथियों के आ जाने के कारण स्थानीय लोगों में उत्सुकता बढ़ी।इन लोगों के पास नये-नये चेहरे बालासोर आते थे।स्थानीय लोगों ने बालासोर पुलिस को सूचना दे दी।बालासोर की पुलिस को भी इन बंगाली नवयुवकों पर शक हो गया।बालासोर पुलिस ने इस बात की खबर कलकत्ता पुलिस को कर दी कि बालासोर में कुछ अपरिचित बंगााली युवक आकर रह रहे हैं।कलकत्ता की पुलिस निरोध हलधर की हत्या के बाद से जतीन व उनके साथियों की तलाश में थी,एक सूत्र उसके हाथ लग गया।
कलकत्ता के कई उच्च पुलिस अधिकारियों का एक दल बालासोर आ धमका,स्थानीय पुलिस को साथ लेकर इन लोगों 5सितम्बर,1915 को यूनिवर्सल इम्पोरियम की तलाशी लेकर दो लोगों को हिरासत में ले लिया।वहां एक कागज मिला जिस पर कैप्टीपौदा गाॅंव का नाम लिखा था।6सितम्बर की शाम को ही पुलिस बल हाथियों पर सवार होकर कैप्टीपौदा गाॅंव आ पहुॅंचा।गाॅंव में हलचल मच गई।एक भक्त ने जतीन को पुलिस आगमन की सूचना दी।रातों-रात जतीन ने आश्रम खाली कर दिया और जतीन,मनोरंजन और चित्तप्रिय मालदीव गाॅंव आ गये।यहाॅं पर भी सारा सामान नष्ट करके पांचों साथी बालासोर रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े।8सितम्बर,1915 को जब पुलिस ने मालदीव वाले घर की भी तलाशी ली और कुछ न मिला तब पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि साधु कोई और नहीं यतीन्द्र नाथ मुखर्जी ही हैं और चेले उसके क्रांतिकारी साथी।पुलिस ने सारे इलाके की नाके बन्दी कर ली।पुलिस ने खबर फैला दी कि कुछ बंगाली डाकू बालासोर क्षेत्र में घुस आयें हैं,जो कोई उनको पकड़वाने में मदद करेगा उसको उचित ईनाम दिया जायेगा।
बाघा जतीन और उसने साथियों के पीछे बालासोर रेलवे स्टेशन जाते समय कुछ ग्रामीण लग गये।ईनाम के लालच में इन ग्रामीणों ने इन देशभक्त क्रांतिकारियों को पकड़ना चाहा जिससे विवश होकर इन लोगों को गोली चलानी पड़ी फलतःएक ग्रामीण मौके पर ही मारा गया।कुछ ग्रामीणों ने भागकर बालासोर पुलिस को सूचना दे दी,तैयार बैठी पुलिस ग्रामीणों के साथ मौके पर आ गई।बुरी तरह से थके हुए पांचों क्रांतिकारी धान के एक खेत में विश्राम कर रहे थे तभी बालासोर के जिला मजिस्टेट किल्वी ने पुलिस बल के साथ ग्रामीणों की मुखबिरी व निशानदेही के आधार पर उसी धान के खेत को चारों तरफ से घेर कर गोलियां बरसाना चालू कर दिया।क्रांतिकारियों ने 20मिनट तक डटकर मुकाबला किया।चित्तप्रिय मौके पर शहीद हो गये।जतीन बुरी तीह घायल हो गये।ज्योतिष पाल भी घायल हो गये।क्रंातिकारियों के पास गोलियां खत्म हो जाने के कारण बाघा जतीन ने लड़ाई बन्द करने का संकेत दिया।पुलिस ने सभी को हिरासत में ले लिया।जतीन और पाल को कटक-उड़ीसा के अस्पताल,चित्तप्रिय के शव को मुर्दाघर तथा नीरेन्द्र व मनोरंजन को बालासोर की हवालात में पहुॅंचाया गया।दूसरे ही दिन 10सितम्बर,1915 को प्रातः5बजे यतीन्द्र नाथ मुखर्जी चिर निद्रा में लीन हो गये।कुछ समय बाद ज्योतिष चन्द्र पाल स्वस्थ हो गये।इन बचे तीनों लोगों पर बगावत का मुकदमा चलाकर,नीरेन्द्र और मनोरंजन को 22नवम्बर,1915 को प्रातः6बजे बालासोर की जेल में फांसी पर लटका दिया गया तथा ज्योतिष चन्द्र पाल को 14वर्ष की काले पानी की सजा सुनाकर अण्डमान भेज दिया गया।
इस प्रकार बाघा जतीन के साथ एक क्रांति युग का समापन हो गया।
अहिंसा-सत्याग्रह के राही थे क्रान्तिकारी
अहिंसा-सत्याग्रह के राही थे क्रान्तिकारी
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं। महात्मा गाँधी के आदर्श, सोच हमारे लिए मार्गदर्शक बनकर विद्यमान हैं। ‘‘अहिंसा परमों धर्मः‘‘ के मूर्त रूप में अपने जीवन में उतार चुके महात्मा गाँधी के अनुयायियों की लम्बी फेहरिस्त है। यहाँ चर्चा महात्मा गाँधी के उन दो अनुयायियों की कर रहा हूँ जो ‘‘सत्याग्रह‘‘ और ‘‘अहिंसा‘‘ को अपने जीवन में अंगीकार कर क्रान्ति मार्ग के सेनानी ही नहीं वरन् अमिट हस्ताक्षर बने। यह चन्द्रशेखर आजाद ही थे जिन्होंने मात्र 14वर्ष की उम्र में महात्मा गाँधी के द्वारा प्रेरित असहयोग आन्दोलन में शिरकत की। यह वह समय था, जब सम्पूर्ण भारत में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जा रहा था और उनकी होली जलाई जा रही थी। इसी दौरान ब्रिटेन के युवराज ड्यूक ऑफ विण्डसर का भारत आगमन हुआ, युवराज की यात्रा का पूरे भारत में जबरदस्त विरोध हुआ। सर्वत्र हड़ताल की गई। महात्मा गाँधी को 6माह का कारावास हुआ। चन्द्रशेखर आजाद ने बनारस के सरकारी विद्यालय पर धरना दिया। पकड़े जाने पर न्यायाधीश खारेघाट के सवालों के जवाब में- नामःआजाद, पिताःस्वतन्त्र, निवासःजेलखाना देने पर आजाद को पन्द्रह कोड़ों की सजा मिली।आजादी का दीवाना यह वीर बालक सेनानी, महात्मा गाँधी का अनुयायी वन्देमातरम और महात्मा गाँधी की जय बोलते-बोलते कोड़ों को सहते-सहते मातृभूमि की गोद में मूर्छित हो कर गिर पड़ा था।कालान्तर में चौरी चौरा काण्ड़ के पश्चात् शचीन्द्रनाथ सान्याल के दल ‘‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन‘‘ से आजाद जुड़ गये। सत्याग्रह और अहिंसा का यह सिपाही भारत की जंग-ए-आजादी में क्रान्ति का संगठक बना। इतिहास साक्षी है कि आजाद तो पैदा ही भारत की आजादी की लड़ाई में सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए हुए थे। अब बात करते हैं- नेताजी सुभाष चन्द्र बोस कीं। सशस्त्र क्रान्ति के सेनानायक सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के जो सूत्र महान क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से पकड़े व फौज का पुर्नगठन कर आजादी का संघर्ष छेड़ा, वह अविस्मरणीय है। आजाद हिन्द फौज के इस महानायक के दिल में महात्मा गाँधी के प्रति, उनके विचारों के प्रति अपार श्रद्धा व विश्वास था। नेताजी ने ही सर्वप्रथम रंगून रेडियो से महात्मा गाँधी को राष्टपिता कहकर सम्बोधित किया था। सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था कि एक बार भारत स्वतन्त्र हो जाये, तो इसे मैं गाँधी जी को सौप दूंगा और कहूँगा कि अब इसे आपकी अहिंसा की सबसे ज्यादा जरूरत है।‘‘
ध्यान देने की बात यह है कि क्या वजह रही कि गाँधी को मानने वालों ने, सत्याग्रह और अहिंसा का पालन करने वालों ने सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाया। क्या ये सशस्त्र क्रान्ति के सेनानी सत्याग्रही नहीं रहे, क्या इन क्रान्ति के वाहकों ने अहिंसा का मार्ग त्याग दिया और ये हिंसक हो गये थे? सत्याग्रह और अहिंसा को स्पष्ट करते हुए भगवती चरण वोहरा ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की ओर से ‘‘बम का दर्शन‘‘ लेख लिखा, जिसका शीर्षक ‘‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन का घोषणा-पत्र‘‘ रखा गया। क्रान्तिकारियों के बौद्धिक नेता सरदार भगत सिंह ने जेल में इसे अंतिम रूप दिया। 26जनवरी,1930 को यह पर्चा पूरे देश में वितरित किया गया। इसमें लिखा गया कि- ‘‘पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है- अन्याय करने के लिए किया गया बल प्रयोग, परन्तु क्रान्तिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है। दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्टीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपने आप को कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का ह्दय-परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। आगे लिखा कि,- ‘‘एक क्रान्तिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी मांग करता है, अपनी उस मांग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है, इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल भी प्रयोग करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इन्हें हिंसा के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना कोष में दिये इस शब्द के साथ अन्याय होगा। ‘‘सत्याग्रह के अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा गया कि,- ‘‘सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यो।? इसके साथ-साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी क्यों न किया जाये? क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है, परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल प्रयोग को निषिद्ध मानते हैं। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या अहिंसा, बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपनी उद्देश्य प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का? ‘‘इस प्रकार हम पाते है कि क्रान्तिकारी सत्याग्रही तो थे ही, क्योंकि उनका उद्देश्य ब्रितानिया हुकूमत से भारत की आजादी था, साथ ही साथ वे अहिंसा के भी पुजारी थे। वे हिंसक कदापि नहीं थे, वे तो अत्याचारियों के सर्वनाश करने की राम-कृष्ण-शिव की परम्परा के पालनकर्ता मात्र थे।
जब-जब महात्मा गाँधी के बताये रास्तों, अनुनय विनय, भूख हड़ताल, सत्याग्रह, धरना आदि से भारत के नागरिकों की बात नहीं सुनी गई तब-तब इन्हीं गाँधी को मानने वाले सत्याग्रहियों ने क्रान्तिकारियों का सशस्त्र मार्ग अपनाया है। राम द्वारा तीन दिनों तक निवेदन के पश्चात् भी समुद्र द्वारा रास्ता न दिये जाने पर जब राम ने प्रत्यंचा चढ़ाई तो समुद्र ने तत्काल उपस्थित होकर समुद्र पर पुल निर्माण का रास्ता बताया। क्रान्तिकारी तो सिर्फ अपने पूर्वजों के उच्च आदर्शों का अनुसरण करते हैं।कृष्ण ने अपने अत्याचारी मामा का वध किया, हक की लड़ाई लड़ रहे पांड़वों के सारथी बने। इस प्रकार क्रान्तिकारियों ने न तो सत्याग्रह छोड़ा था और न ही अहिंसा का मार्ग। हाँ, वीरोचित धर्म का वरण कर कायरता का त्याग कर अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए, अपने हक के लिए प्राण लेने व देने में कोई संकोच नहीं किया।
भारत माँ का लाल भगत सिंह
भारत माँ का लाल भगत सिंह
भगतसिंह का जन्म 27-28सितम्बर,1907 को बंगा गांव,लायलपुर जिला में हुआ।पिता सरदार किशनसिंह और चाचा अजीत सिंह स्वतंत्रता आन्दोलन में जेल में बन्द थे।भगतसिंह के जन्म के ही बाद ये लोग जेल से रिहा हुए थे।गुलामी से नफरत और देशभक्ति इनके खून में समाई थी।विरासत में मिली थी गुलामी से लड़ने की हिम्मत।शिक्षा देशभक्तों के केन्द्र नेशनल कालेज-लाहौर में ग्रहण की।सुखदेव,यशपाल,भगवतीचरण वोहरा इनके कालेज के मित्र थे।भगतसिंह पढ़ने लिखने में ज्यादा ध्यान देते थे।विक्टर ह्यूगो,हाॅल केन,टाॅल्सटाॅय,गोर्की,बर्नोर्ड शाॅ,डिकेन्स आदि उनके पसंदीदा लेखक थे।भगतसिंह ने कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र प्रताप में काम किया था।कानपुर में ही इनकी मुलाकात चन्द्रशेखर आजाद,बटुकेश्वर दत्त,शिव वर्मा,जयदेव कपूर,कुन्दनलाल आदि क्रांतिकारियों से हुई।भगतसिंह और सुखदेव रूसी अराजकतावादी बाकुनिन से प्रभावित थे।भगतसिंह को अराजकता से समाजवाद की ओर लाने का श्रेय कामरेड सोहन सिंह जोश और लाला छबील दास को है।
क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता के रूप में भगतसिंह स्थापित हो चुके थे।असेम्बली बम काण्ड़ में सुखदेव ने इसी कारण से भगतसिंह को बम फोडने जाने के लिए केन्द्रीय समिति का निर्णय बदलवाने पर जोर दिया था।सन 1926 में भगतसिंह,भगवती चरण वोहरा और यशपाल ने लाहौर नैजवान भारत सभा की स्थापना की।भगतसिंह इसके प्रथम महामंत्री व भगवती चरण वोहरा प्रथम प्रचार मंत्री चुने गये।सुखदेव,धन्वंतरी,यशपाल और एहसान इलाही प्रमुख सक्रिय सदस्य नियुक्त किये गये।सभा का उद्देश्य क्रान्तिकारी आन्दोलन के तन्त्र को पुनःजीवित करना था और कार्य था-क्रान्ति के विचारों और उद्देश्यों का प्रचार करने के लिए आम सभायें करना,बयान देना,इश्तहार बांटना आदि।शोषण,गरीबी,विषमता जैसी विश्वव्यापी समस्याओं से निपटने के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता चाहिए।क्रान्तिकारियों का विचार था कि आर्थिक स्वतन्त्रता के बिना पूर्ण स्वतंत्रता सम्भव नही है।स्वतंत्रता के बाद के शासन की रूपरेखा पर भी क्रांतिकारी विचार-विमर्श करते थे।हुतात्माओं के चित्रों की प्रदर्शनी लगाकर,उनके बारे में जानकारी दी जाती थी।जनता के सामने क्रातिकारी अपना इतिहास बताते थे।सशस्त्र क्रांति के गुप्त संगठन के लिए कार्यक्षेत्र तैयार करना और लोगों में साम्राज्यवाद के विरोध में राष्टीयता की प्रबल भावना को जागृत करना-यही उद्देश्य था भगतसिेह का।
भगतसिंह श्रेष्ठ प्रचारक थे।कुशल वक्ता तो वे थे ही,लेखनी और विचारों में पैनापन और पकड़ भी थी।हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी व पंजाबी भाषाओं पर उनका अधिकार था।अमृतसर से निकलने वाले उर्दू अखबारों में वे नियमित लेख लिखते थे।छद्म नामों से उन्होंने कीर्ति में लिखा।हिन्दी प्रताप,प्रभा,महारथी,चांद में भगतसिंह ने लिखा।क्रान्तिकारियों के विषय में अध्ययन करने से मन अशान्त हो जाता है।कैसे थे ये मतवाले?आजाद भारत में लोग जीवन जीने के लिए रोज मर रहें हैं और ये मतवाले आने वाली नस्लों को जीवित करने के उद्देश्य से हॅंसते-हॅंसते मर गये।फिर भी आज आजाद भारत में बेकारी,बेरोजगारी,शोषण,विषमता,भुखमरी,भ्रष्टाचार,कुशासन,अपने चरम पर है।क्या क्रान्तिकारियों का आजाद भारत बन गया है ?देश की आजादी की लड़ाई लडते हुए भगतसिंह अपने साथियों राजगुरू व सुखदेव के साथ 23मार्च,1931 को फांसी पर चढ़ गये।रह गये शेष भगतसिंह और उनके साथियों के सपने,आदर्श,उनके सोच को परिलक्षित करते लेख व देश-समाज के लिए मर मिटने की प्रेरणा।
भगतसिंह के सखा-समर्पण की प्रतिमूर्ति सुखदेव
भगतसिंह के सखा-समर्पण की प्रतिमूर्ति सुखदेव
स्वभावगत जिद्दी,सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति,मासूम व्यक्तित्व,कुशल संगठनकर्ता,अपनत्व के धनी-एैसे थे सुखदेव।सुखदेव का जन्म 15मई,1907 को रामलाल थापर के पुत्र रूप में नौधरा,लुधियाना में हुआ था ।बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया।लालन पालन माता रल्लीदेई और ताउ चिंताराम थापर जो कि देशभक्त थे तथा जेल की सजा भुगत चुके थे,ने किया ।
क्रांतिकारी दल के नायक चंद्रशेखर आजाद के बाद दल के समस्त साथियों की आवश्यकताओं की तरफ अगर कोई ध्यान देता था तो वह दल में ‘विलेजर‘ नाम प्राप्त सुखदेव ही थे ।सुखदेव जिद्दी थे ।सुखदेव ने कभी अपने साथियों से कोई स्पर्धा नहीं रखी,कोई शिकायत नहीं की और न ही कोई स्पष्टीकरण दिया ।एक तरफ राजगुरू भगतसिंह को शौके शहादत में अपना रकीब मानते थे तो सुखदेव के मन में भगतसिंह के प्रति सबसे ज्यादा प्रेम और अपनापन था ।जब भी सुखदेव और भगतसिंह की मुलाकात होती,तो क्रांति दल के साथियों को भूलकर ये दोनों रात-रात भर बाते करते रहते थे ।भगतसिंह और सुखदेव समाजवाद के पक्के समर्थक थे ।भगतसिंह की स्मरण शक्ति तीव्र व विलक्षण थी ।किसी भी पुस्तक को जल्दी खत्म करने की जैसे उन्हें सनक सवार रहती थी ।
ध्यान दीजिए,यह सुखदेव ही हैं जिनके मित्र के और आदर्शों के प्रति हठ ने क्रांतिकारी आदर्शों के प्रचार के लिए,न्यायालय का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए,अपने भगतसिंह की नाराजगी झेलकर,उसे भलाबुरा कहकर असेम्बली बम काण्ड का दायित्व केन्द्रीय समिति से सौंपवाया ।दुर्गा भाभी गवाह थीं कि इस निर्णय को करवाने के पश्चात् सुखदेव की आंखें रोने के कारण सूजी हुईं थी ।सुखदेव ने केन्द्रीय समिति से पहले कहा था कि असेम्बली में बम फोड़ने का काम भगतसिंह को करना चाहिए ।इसका कारण बम फोड़ने का उद्देश्य,दल के आदर्श,महत्व व उद्देश्यों को जनता के सामने लाना था और इस काम के लिए भगतसिेह ही सबसे सक्षम व योग्य थे ।जब भगतसिंह केन्द्रीय समिति के सदस्यों को इस विषय में राजी न कर सके,तब सुखदेव ने भगतसिंह को ललकारा-‘‘जब तुम्हे मालूम है कि दूसरा कोई भी व्यक्ति दल के उद्देश्यों की जवाबदारी पूर्ण करने में तुमसे समर्थ नहीं है,तब तुमने केन्द्रीय समिति के सदस्यों को यह निर्णय करने क्यों दिया कि तुम्हारी जगह कोई और असेम्बली में बम डालने जायेगा ।‘‘ सुखदेव ने भगतसिंह को कायर,डरपोक,अहंकारी जाने क्या-कया कह डाला ।उन्होंने कहा-जिस प्रकार लाहौर हाईकोर्ट ने भाई परमानन्द के विरूद्ध निर्णय देते हुए कहा था कि वे दल के सूत्रभार व मस्तिष्क होते हुए भी डरपोक हैं,इसलिए संकट के समय दूसरों को आगे करते हैं ।इसी तरह की बातें तुम्हारे लिए भी कही जाएगी ।इस विषय में भगतसिंह ने सुखदेव को समझाने की असफल कोशिश की और सुखदेव के व्यंग्य बाणों का शिकार होते रहे ।भगतसिंह का मन मस्तिष्क जब सुखदेव के प्रहारों से घायल हो गया तब उन्होंने सुखदेव से कहा-तुम मेरा अपमान कर रहे हो ।चुप रहो मैं अपने मित्र के प्रति अपना कत्र्तव्य निभा रहा हूॅं-गरजे सुखदेव ।
आखिरकार केन्द्रीय समिति की दोबारा बैठक हुई ।बैठक में सुखदेव चुप रहे ।भगतसिंह ने तर्कपूर्ण आग्रह किया, फैसला हुआ-विजय कुमार सिन्हा के स्थान पर भगतसिंह के साथ बटुकेश्वरदत्त असेम्बली में बम फोड़ेंगें ।
बाद में सुखदेव सहित अन्य पर लाहौर षड़यंत्र का मुकद्मा चला ।सुखदेव का ध्यान बचाव में न था ।वे न्यायालय को ही क्रान्ति का प्रचार माध्यम मानते थे ।अंत में 7अतूबर,1930 को मुकदमें का निर्णय सुनाया गया ।सुखदेव इस षड़यंत्र के प्रमुख तथा भगतसिेह उनके दाहिने हाथ घोषित किये गये ।सुखदेव को क्रांतिकारियों के उद्देश्यों की सफलता पर कितना अडिग विश्वास था,इसका प्रमाण फाॅंसी से कुछ ही पहले महात्मा गाॅंधी के नाम लिखा उनका पत्र है जिसमें उन्होंने लिखा-‘‘क्रांतिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातन्त्र प्रणाली स्थापित करना है।इस ध्येय में संशोधन की जरा भी गुंजाइश नहीं है।‘‘ वे गाॅंधी जी से प्रश्न पूछते हैं कि आपकी भी धारणा होगी कि क्रांतिकारी तर्कहीन होते हैं और उन्हें केवल विनाशकारी कार्यों में आनन्द आता है।सुखदेव आगे लिखते हैं-‘‘हम आपको बतला देना चाहते हैं कि यथार्थ में बात इसके बिल्कुल विपरीत है।वे प्रत्येक कदम आगे बढ़ाने के पहले अपने चारों तरफ की परिस्थितियों पर विचार कर लेते हैं।उन्हें अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान हर समय बना रहता है।वे अपने क्रांतिकारी विधान में रचनात्मक अंश की उपयोगिता को मुख्य स्थान देते हैं यद्यपि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें केवल विनाशात्मक अंश की ओर ध्यान देना पड़ता है।वह दिन दूर नही जबकि क्रांतिकारियों के नेतृत्व में और उनके झण्डे के नीचे जन समुदाय उनके समाजवादी प्रजातंत्र के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखायी पड़ेगा ।महात्मा गाॅंधी को लिखे इस पत्र में सुखदेव ने लिखा,-‘‘फाॅंसी देने का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश देश में बहुत ख्याति प्राप्त कर ली है,क्रांतिकारी दल के सब कुछ नही हैं।वास्तव में इनकी सजाओं को बदल देने देश का उतना कल्याण न होगा,जितना इन्हें फाॅंसी पर चढ़ा देने से होगा ।‘‘
सुखदेव फूल की तरह कोमल परन्तु पाषाण से कठोर अपनी कोमल भावनाओं को,प्यार और ममता को निजी चीज समझ कर अपने अन्दर समेटे रहने वाले सुखदेव के व्यक्तित्व की सबसे खतरनाक चीज थी-उनकी मुस्कुराहट,जिसके पीछे शरारत के साथ साथ हर गलत चीज पर नफरत भरा व्यंग्य साफ साफ उभर आता था ।समाज की कुरीतियों,रूढ़ियों,राजनैतिक मतभेदों के प्रति गहरी उपेक्षा और विद्रोह का प्रतीक थी सुखदेव की मुस्कुराहट ।यहां तक कि बड़ी-बड़ी असफलताओं के आघात को भी वे अपनी मुस्कुराहट की उपेक्षा में डुबो देते थे ।यही र्निविकार भाव समेटे क्रांति का यह पुरोधा आजादी के सपने सजोये अपने हम सफरों भगतसिेह तथा राजगुरू के साथ फाॅंसी के तख्ते पर चढ़कर 23मार्च,1931 को क्रांति मार्ग आलोकित कर गया ।