Wednesday, March 21, 2012
समाजवादी पार्टी
समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पिछले साल मार्च में तीन दिवसीय जन आन्दोलन किया था , यह वह निर्णायक मोड़ था जिसके बाद पुरे प्रदेश में बसपा से नाराज़ जनता का मन सपा की तरफ बन गया | समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ के संघर्ष से बने जन समर्थन को भांप के तमाम नेता तत्काल सपा में शामिल हो गये और कई तो विधान सभा का टिकेट भी पा के निर्वाचित हो गये | समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को मंथन करना चाहिए और जिन कार्यकर्ताओ -नेताओ ने अपनी निष्ठा कभी ना बदली और संघर्ष में जेल गये ,लाठी खायी , यहाँ तक कि संगठन के पदों पे भी नहीं रहे ,अब प्राथमिकता के आधार पर उनको संगठन व सत्ता में जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए | जनपदों में तमाम नेता ऐसे है जो संगठन के जिम्मेदार पदों पर वर्षो से अहमियत पा रहे है और अब सत्ता में भी लाल बत्ती की जुगत लगाने में रात दिन एक किये है , इनकी मंशा संगठन विस्तार की ना होकर अपने व्यक्तिगत लाभ अर्जन की साफ़ तौर पर दिखती है | विधान सभा चुनावो के दौरान तमाम नेता दल बदल के सपा में शामिल हुये और ये दलबदल के आये सभी नेता सत्ता में मलाई काटने , विधान परिषद् सदस्य बनने या किसी आयोग का अध्यक्ष बनने , सदस्य बनने में अपनी लामबंदी कर रहे है | सपा नेतृत्व को मार्च आन्दोलन-२०११ के पश्चात् शामिल किसी भी नेता को लोकसभा २०१४ के पहले कोई भी लाभ का पद नहीं देना चाहिए | समाजवादी पार्टी के पुराने नेताओ-कार्यकर्ताओ को संगठन-सत्ता में जिम्मेदारी देने से समर्पित लोगो में विश्वास जागेगा | मार्च २०१४ के पश्चात् शामिल लोगो को संगठन के कामों में जुटाना चाहिए और २०१४ के लोकसभा चुनावो के पश्चात् जिन लोगो ने मेहनत से काम किया उनको तवज्जो देनी चाहिए | समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्य दलों से एन चुनावो के पहले शामिल लोग कही सत्ता का बेजा लाभ उठाने और दलाली करने में तो नहीं लगे हुये है | जनपदों में जिम्मेदार पदों पर नियुक्त लोगो,खासकर जिला अध्यक्ष , जिला महा सचिव , कोष अध्यक्ष को अभी लोकसभा २०१४ तक सत्ता में किसी जिम्मेदारी के पद को देने से बचना चाहिए | जनपदों में एक व्यक्ति-एक पद का नियम निर्धारित होना जरुरी है |
Friday, March 16, 2012
स्मृति शेष -- जंग ए आज़ादी के गुमनाम सेनानी बलवंत सिंह का बलिदान दिवस १७ मार्च
अरविन्द विद्रोही ....................... श्री बलवंत सिंह का जन्म सरदार बुद्ध सिंह के घर पहली आश्विन संवत १९३९ दिन शुक्रवार को गाँव खुर्द पुर जिला जालंधर में हुआ था | आदम पुर के मिडिल स्कूल में आपका दाखिला कराया गया | कम उम्र में ही आपका विवाह भी हुआ , शीघ्र ही पत्नी की मौत भी हो गयी | स्कूल त्याग कर बलवंत सिंह फौज में भर्ती हुये | वहां संत कर्म सिंह जी की संगति से आप ईश्वर भजन करने लगे | आपका दूसरा विवाह हुआ | दस वर्षो बाद नौकरी छोड़ कर गाँव के पास स्थित एक गुफा में ग्यारह माह तक तपस्या की | सन १९०५ में कनाडा चले गये | आपके ही अथक प्रयासों से वैंकोवर में अमेरिका का पहला गुरु द्वारा स्थापित हुआ , इस कार्य में आपके साथी थे श्री भाग सिंह | बाद में भाग सिंह की एक देश द्रोही ने गोली मार कर हत्या कर दी | उस समय वहां के प्रवासी हिन्दुओ तथा सिक्खों को मृतक संस्कार करने में बड़ी विपत्ति होती थी | मुर्दे जलाने की उन्हें आज्ञा ना थी | श्री बलवंत सिंह ने कुछ जमीने खरीदी तथा दाह संस्कार की अनुमति ले ली | भारतीय मजदूरों को संगठित किया | उनमे सच्चरित्रता तथा ईश्वरोपासना का प्रचार किया | आपने गुरुद्वारा का ग्रंथी बनना स्वीकार किया | इमिग्रेसन विभाग ने भारतीओं को कैनेडा से हटाने का षड्यंत्र रचा | भारतीय मजदूरों को हांडूरास नामक द्वीप में चले जाने को राजी करने का प्रयास किया | बलवंत सिंह श्री नागर सिंह को द्वीप देखने भेजा | वहा इमिग्रेसन विभाग वालो ने उन्हें भारत में पाँच मुरब्बे जमीन और पाँच हज़ार डालर देने का लोभ देकर भारतीओं को इस द्वीप पर भेजने को कहा | नागर सिंह ने घुस ठुकरा कर बलवंत सिंह को वास्तविकता बता दी | प्रवासी भारतीओं की इच्छा थी कि हमारा पूरा परिवार साथ आकर रहे | श्री बलवंत सिंह , श्री भाग सिंह , भाई सुन्दर सिंह जी को भारत लौट कर अपने परिवार को लाने के लिए भेजा गया | १९११ में ये तीनो सपरिवार हांगकांग पहुचे | वैंकोवर आने के लिए काफी मुसीबतें उठाई | परिवार वालो को जमानत की तयं अवधि तक ही रहने की अनुमति मिली | अवधि बीतते ही इमिग्रेसन विभाग के लोग आ धमके | भारतीय झगडे के लिए तैयार हो गये | अफसर लोग जरा गरम हुये परन्तु वीर योद्धाओं की लाल आँखे देख कर खिसिया कर लौट गये | वे परिवार तो वही रहे परन्तु शेष भारतीओं के परिवार लाने की समस्या बनी हुई थी | तीन सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल बनाया गया जिसमे बलवंत सिंह शामिल थे | प्रतिनिधिमंडल इंग्लॅण्ड गया , वहा कहा गया की मामला भारत सरकार द्वारा यहाँ पहुचना चाहिए | निराश होकर सभी भारत आये | संपर्क व आन्दोलन शुरु किया | उस समय लाला लाजपत राय ने भी एक सडा स उत्तर देकर प्रतिनिधिमंडल से अपना पीछा छुड़ा लिया | फिर क्या था ? ये लोग लगे रहे , सहायता भी मिली और सभाएं भी हुई | घोर निराशा , विवशता , क्रोध से घिरे बलवंत सिंह को सहारा था तो सिर्फ राष्ट्रीय भाव का और कर्त्तव्य निर्वाहन का | बलवंत सिंह ने सभाओं में ह्रदय के अन्दर के लावे को उगला | सर माईकल ओडायर ने अपने ग्रन्थ इंडिया एस आई नो में इस बारे में लिखा है | वे बलवंत सिंह की सफाई , शांति , वीरता , गंभीरता और निर्भीकता को देख कर कहा करते थे कि - बलवंत सिंह सिक्खों के पादरी है अथवा सेनापति , यह निश्चय करना बड़ा कठिन है | बलवंत सिंह ने निश्चय कर लिया था कि भारत को हर सम्भव उपाय से स्वतंत्र करवाना ही प्रत्येक भारत वासी का कर्त्तव्य है और सब रोगों कि एक मात्र औषधि भारत कि स्वतंत्रता है | प्रतिनिधि मंडल २०१४ के प्रारंभ में वापस लौटा | इस समय बरकत उल्लाह तथा श्री भगवान सिंह अमेरिका में थे | बलवंत सिंह और प्रतिनिधि मंडल का अभी इनसे संपर्क नहीं हुआ था | इसी प्रकार कि गतिविधिओ में महीनो बीत गये | सन १९१४ के अंतिम में आप शंघाई पहुचे | वहा आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई | परिवार को श्री कर्तार सिंह के साथ वापस भारत भेज दिया | सन १९१५ में बैंकाक आ गये | २१ जनवरी , १९१५ के विद्रोह के आयोजन में जुटे रहे | दुर्भाग्य वश विद्रोह असफल हुआ उसके बाद आप बीमार भी हो गये | डाक्टर ने बिना क्लोरोफोर्म सुंघाए आप्रेशन कर डाला | बीमारी में ही अस्पताल से डिस्चार्ज भी कर दिये गये बलवंत सिंह | स्यान - थाईलैंड कि सरकार ने बलवंत सिंह और उनके साथियो को गिरफ्तार करके भारत की अंग्रेज सरकार के हवाले कर दिया | बलवंत सिंह को सिंगापुर लाया गया | मौन साध गये बलवंत सिंह | आखिर कर १९१६ में लाहौर षड़यंत्र-कारियो में आपको भी शामिल किया गया | २४ दिन के नाटक के बाद आपको फांसी की सजा सुनाई गयी | क्रान्तिकारियो के बौद्धिक नेता भगत सिंह लिखते है -- काल कोठरी में बंद हैं , सिक्ख होने पर टोपी नहीं पहन सकते | कम्बल ही सिर पर लपेट लिया है | बदनाम करने के लिए किसी ने शरारत की - कम्बल के किसी कोने में अफीम बांध दी और कहा गया कि आप आत्म हत्या करना चाहते है | अपने अत्यंत शांति से उत्तर दिया -- मृत्यु सामने खड़ी है | उसके आलिंगन के लिए तैयार हो चुका हूँ | आत्म हत्या कर के मैं मृत्यु सुंदरी को कुरूपा नहीं बनाऊंगा | विद्रोह के अपराध में मृत्यु दंड पाने में गर्व अनुभव करता हूँ | फांसी के तख्ते पर ही वीरता पूर्वक प्राण त्याग दूंगा | पूछ ताछ करने पर भेद खुल गया | कुछ नंबर दार कैदियो तथा वार्डर को कुछ सजाएं हुई | सभी ने आपकी देश भक्ति तथा निर्भीकता की दाद दी | १७ मार्च , १९१६ को बलवंत सिंह और उनके साथ छह साथी वीर नहाने के बाद भारत का स्वतंत्रता गान गाते हुये मुक्ति मार्ग पर चल पड़े | छोड़ गये अपने पीढियो के लिए त्याग , तपस्या और देश प्रेम की अनोखी मिसाल | बलवंत सिंह के जीवन संघर्ष को विस्तार से फ़रवरी १९२८ में चाँद के फांसी अंक में भगत सिंह ने लिखा था | भगत सिंह ने लिखा --- वे बड़े ईश्वर भक्त थे | धर्म निष्ठा के कारण उन्हें सिक्खों में पुरोहित बना दिया गया था | शांति के परम उपासक बलवंत का स्वाभाव बड़ा मृदुल था | वे सुमधुर भाषी थे | पहले पहल वे ईश्वरोपासना की ओर लगे | फिर लोगो को उस ओर लाने की चेष्टा की | बाद में लोगो के कष्ट दूर करने के प्रयास में धीरे धीरे गौरांग महाप्रभुओ से मुठभेड़ होती गयी और अंत में फांसी पर मुस्कुराते हुये आपने प्राण त्याग दिये | भगत सिंह ने फांसी के समय को कुछ इस प्रकार से वर्णित किया --- बलवंत सिंह ने प्रातः काल स्नान किया तथा अपने छह और साथियो के साथ भारत माता को अंतिम नमस्कार किया | भारत स्वतंत्रता का गान गाया | हँसते हँसते फांसी के तख्ते पर जा खड़े हुये | फिर क्या हुआ ? क्या पूछते हो ? वही जल्लत , वही रस्सी ! ओह ! वही फांसी और वही प्राण त्याग ! आज बलवंत सिंह इस संसार में नहीं है , उनका नाम है , उनका देश है , उनका विप्लव है |
Monday, March 12, 2012
भूमि अधिग्रहण
उत्तर प्रदेश में किसानों की जो कृषि योग्य बेश कीमती भूमि पिछली सरकारों के द्वारा जबरन व मनमाने तरीके से अधिग्रहित कर ली गयी थी , उन तमाम अधिग्रहित भूमि जहा के किसान अपनी जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ रहे है ,जिन्होंने मुआवजा लेने से इंकार कर दिया था और अधिग्रहित भूमि पर अधिग्रहण के वर्षो बाद भी कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ है वो सभी भूमि अधिग्रहण चिन्हित करके रद्द किया जाना चाहिए | इस प्रकार की सभी अधिग्रहित कृषि भूमि किसानों के नाम तत्काल की जानी चाहिए ,किसानों के नाम राजश्व अभिलेखों में दर्ज करने का शासनादेश निर्गत किया जाना समाजवादी सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए |
समाजवादी पार्टी में जारी अनुशासन हीनता
समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश व प्रवक्ता सम्बन्धी जारी विज्ञप्ति कि राजेंद्र चौधरी के अलावा कोई भी प्रवक्ता नहीं है का उल्लंघन बदस्तूर जारी , बगलगीर - खासम खास माने जा रहे हालिया नियुक्त एक और सचिव लिख रहे है अपने को समाजवादी पार्टी का प्रवक्ता | अनुशासन हीनता- राजनीतिक अनुभव हीनता का प्रदर्शन जारी ,देखते है क्या होता है अंजाम ?
Friday, March 9, 2012
उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक अखिलेश यादव

अरविन्द विद्रोही .......................... उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो चुका है | विधान सभा उत्तर प्रदेश के आम चुनाव २०१२ में आम जनता के विश्वास रूपी मतों के सहारे , तमाम राजनीतिक पूर्वानुमानो को धता बताते हुये समाजवादी पार्टी ने विजय पताका फहरा ली है | बहुमत के जादुई अंक को पार करते हुये समाजवादी पार्टी ने अपने स्थापना से लेकर अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल की है | बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश में सत्ता से विदाई के साथ ही साथ परिपक्व हो रहे लोकतंत्र की झलक भी उत्तर प्रदेश के मतदाताओ ने दिखा ही दिया है | माया के मायावी , कांग्रेस के दिखावी , भाजपा के भ्रमित प्रचार युद्ध की जगह समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ के अनवरत संघर्ष को तरजीह देते हुये आम जनता ने अपनी पहली पसंद के रूप में उम्मीदों की साइकिल का बटन दबा के उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक अखिलेश यादव के माथे पर विजयी तिलक लगा दिया है | बहुजन समाज पार्टी सरकार के जनविरोधी नीतिओ के खिलाफ जनता की आवाज बनने का महती काम करने वाले युवा समाजवादी अखिलेश यादव-सांसद ,प्रदेश अध्यक्ष सपा ने जनता के लिए सड़क पे उतर के संघर्ष करने में तनिक भी संकोच या देर नहीं किया | समाजवादी पार्टी के संगठन में जिम्मेदारी स्वरुप मिले उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद के दायित्व निर्वाहन को बखूबी निभाते हुये अखिलेश यादव ने धुर समाजवादी राजेंद्र चौधरी-प्रवक्ता ,समाजवादी पार्टी को अहमियत देते हुये संगठन से जुड़े प्रत्येक निर्णय में उनकी सलाह को अहमियत देते हुये समाजवादी विचारधारा पर अपनी दृठता निरंतर बढ़ाते रहने पर , कर्मठ युवाओ को अपने से , समाजवादी विचारधारा से , जनता के संघर्ष से जोड़ते रहने पर विशेष ध्यान दिया | आज उत्तर प्रदेश में डॉ राम मनोहर लोहिया के विचारो पर बनी समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत में आ चुकी है | आज से लगभग १९ वर्ष , ४ महीना पूर्व ४-५ नवम्बर , १९९२ को लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में संपन्न हुये समाजवादी पार्टी के स्थापना सम्मेलन में देश के लगभग सभी प्रान्तों के तपे-तपाये समाजवादी नेता शामिल हुये थे | इस दौर में मुलायम सिंह यादव ने ना तो शौकिया राजनीति की थी और ना पेशेवर राजनीति की थी | डॉ लोहिया के शिष्य मुलायम सिंह यादव ने उस समय छोटे लोहिया पंडित जनेश्वर मिश्र के निर्देश पे जोखिम की राजनीति की थी | मुलायम सिंह यादव ने डॉ लोहिया के कार्यक्रमों को पुनः जीवित करने का महती काम उस दौर में किया था | सपा की स्थापना के समय समाजवादी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुये मुलायम सिंह यादव ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष का एलान किया था | अन्याय के खिलाफ संघर्ष की विरासत - यह वह विरासत है जो डॉ लोहिया - जे पी के बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने बूते हासिल की थी | समाजवाद की इसी संघर्ष की विरासत को उत्तर प्रदेश में युवा समाजवादियो ने बखूबी निभाया और उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट - मनमानी बसपा सरकार के जुल्म के खिलाफ इस संघर्ष के अगुआ के तौर पे समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव - सांसद ने अपनी महती भूमिका को बखूबी अंजाम दिया | उत्तर प्रदेश के विधान सभा के चुनाव में यह सफलता किसी चमत्कार के बदौलत नहीं हासिल हुई है समाजवादी पार्टी को , इस जन विश्वास के पीछे बसपा सरकार के खिलाफ जनता की आवाज बनकर संघर्ष कर रहे समाजवादियो की मेहनत रही है | जनता के मुद्दों पर आन्दोलनरत युवा सपाइयो के शरीर पर पड़ी एक एक लाठी , पुलिसिया बूटो से रौंदे गये युवाओ के जिस्म के दर्द को आम जनता ने अपने दिलो दिमाग में बैठा लिया था | हटाना ही था बसपा की सरकार को , बसपा सरकार के खिलाफ खिलाफ अपने कार्यकर्ताओ के संघर्ष ,अखिलेश यादव के सौम्य -निर्भीक नेतृत्व की बदौलत समाजवादी पार्टी आम जन की पहली पसंद बन चुकी थी और यह अब चुनाव परिणामो से साबित भी हो चुका है | यह निष्ठावान समाजवादियो का संघर्ष ही था कि साल भर पहले से दुसरे दलों से नेता एक के बाद एक समाजवादी पार्टी में अपना भविष्य तलाशने व सुरक्षित करने आने लगे थे | संघर्ष का एक कारवां बनाया अखिलेश यादव ने जिसमे संघर्ष शील नेता-कार्यकर्ता जुड़ते गये | दुर्भाग्य वश चुनावो के दौरान लगभग सभी दलों के जनाधार विहीन- संकुचित सोच के नेताओ ने आम जनता की रोज मर्रा की परेशानियो पर छिड़े संघर्ष की जगह हिन्दू-मुस्लिम और नेपथ्य में जा चुके धार्मिक मुद्दों को अनावश्यक तूल देने का प्रयास किया | यह वही नेता गण थे जिनका कोई जन सरोकार नहीं ,जिनकी पूरी राजनीति सिर्फ कोरी बयान बाजी , जातीय-धार्मिक उन्माद पर टिकी रहती है | नकारे गये ऐसे नेता ,नहीं चलने पाई इनकी सतही व भ्रमित करने वाली स्याह - संकीर्ण राजनीति इस बार यह एक विशेष उपलब्धि रही है चुनाव की | निरंकुश व भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ संघर्ष ही समाजवादियो की पहचान व पूंजी होती है | डॉ लोहिया और जय प्रकाश के बाद समाजवादी संघर्ष को सहेजने - सवारने का काम मुलायम सिंह यादव ने बखूबी अंजाम दिया था | समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने ग्रामीण जनता , छात्रों-युवाओ पर अपनी मजबूत पकड़ की बदौलत ही मुलायम सिंह यादव धरती पुत्र के संबोधन से नवाजे गये | गाँधी-लोहिया - जयप्रकाश के सिद्धांतो के अनुपालन में तनिक भी विचलित ना होने के कारण ,तात्कालिक अन्याय का विरोध करने के कारण , भ्रष्ट सरकारों के खिलाफ हल्ला बोलने के कारण मुलायम सिंह यादव को जिद्दी भी कहा गया | समाजवादी आन्दोलन में भटकाव व कामियो के बावजूद जन संघर्ष की जो विरासत मुलायम सिंह यादव ने जो अर्जित की थी , उस पर उनके साथ साथ सपा कार्यकर्ता भी खरे साबित हुये है | आज पंडित जनेश्वर मिश्र नहीं है लेकिन उनकी कही हुई बात स्मृति पटल पर अंकित है | कन्नौज की लोकसभा सीट से १९९९ में प्रत्याशी के रूप में अखिलेश यादव का नामांकन करने पहुचे छोटे लोहिया ने पत्रकारों के सवालो के जवाब में कहा था कि - यह संघर्ष का परिवारवाद है , सत्ता का नहीं | इसके पहले शिक्षा ग्रहण कर रहे अखिलेश यादव से एक मुलाकात के दौरान जनेश्वर मिश्र ने अखिलेश यादव से कहा था --- युवाओ को सार्थक व सकारात्मक राजनीति करनी चाहिए और तुमको भी पढाई के बाद करनी है | छोटे लोहिया के मार्ग धर्षण में युवा अखिलेश यादव ने लोक सभा चुनाव जीतने के बाद क्रांति रथ के माध्यम से पुरे प्रदेश का भ्रमण किया था | यह अखिलेश यादव की संघर्ष और जनता से जुड़ने की शुरुआत थी | जनता से जुड़ने की ललक ने ही अखिलेश यादव को नव आशा का केंद्र बिंदु बना दिया है | वर्तमान पीढ़ी में विरलों के ही मन में सीखने की इच्छा होती है ,विरलों को ही धुर समाजवादियो का सानिद्ध्य मिलता है | जनेश्वर मिश्र के शिष्य रूप में अखिलेश यादव ने जनता से जुड़े सवालो को बखूबी समझा , अध्धयन किया , मानसिक दृठता अर्जित करने के साथ साथ कर्मठ युवाओ के समाजवादी संगठन के रूप में समाजवादी पार्टी को एक नयी पहचान दिया | वरिष्ठ समाजवादियो का मार्गदर्शन व युवाओ कि उर्जा के एकीकरण की बदौलत डॉ लोहिया की आर्थिक नीतिओ ,किसानों .मजदूरों,युवाओ,महिलाओ ,आम जन के मुद्दों को सड़क से संसद तक उठाने में अखिलेश यादव किसी भी समकालीन युवा संसद से पीछे नहीं है | सरल स्वभाव के धनी अखिलेश यादव ने वैचारिक दृठता के बूते संघर्ष की राजनीति के सहारे सत्ता तक का सफ़र तय किया है | उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की वर्तमान सफलता के पीछे आम जनमानस के नज़रिए से उत्तर प्रदेश में संघर्ष से सत्ता तक के समाजवादी नायक समाजवादियो की उम्मीदों के केंद्र बिंदु बनके उभरे अखिलेश यादव ही है |
Thursday, March 8, 2012
वर्तमान भारतीय परिवेश में परिवार-रिश्तो को अहमियत देती महिलाओं का जीवन
अरविन्द विद्रोही .............................
भारतीय सभ्यता और संस्कृति में मातृ शक्ति अर्थात महिला वर्ग का स्थान सदैव सर्वोपरि माना गया है।इस देवभूमि में समस्त आराधना पद्धतियों में नारी शक्ति का पूजन किया जाता है।नारी के बगैर पुरूष के द्वारा की गई ईश आराधना अधूरी ही होती है।सृष्टि के दो अनिवार्य व पूरक अंग के रूप में महिला व पुरूष ही हैं,इस शाश्वत सत्य को कौन नकार सकता है?क्या कोई स्त्री-पुरूष के सहअस्तित्व को नकार सकता है?अधिकारों की बात करें तो भारतीय सभ्यता-संस्कृति व पारिवारिक मूल्य तो परिवार ही नही वरन् समाज के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो नर हो या नारी,बालक हो या वृद्ध सभी के संरक्षण व अधिकारों की बेमिसाल धरोहर है।भारतीय समाज सदैव सहिष्णु व मानवता वादी सोच का रहा है।मुगलों तथा ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की लडाई में महिला शक्ति किसी भी नजरिए से पुरूषों से पीछे नहीं रही हैं।वास्तविकता तो यह है कि वीर पुरूषों की जननी मातृशक्ति ही वीरोचित कर्म व धर्म की प्रेरक रही हैं।
अतीत की गौरव-शाली,बलिदानी,त्यागमयी गाथायें समेटे भारत-भूमि में आज पारिवारिक मूल्य व आपसी विश्वास दम तोड चुका है।जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूॅजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।
पूंजीवाद के प्रभाव में भारत में भी महिलाओं को एक उत्पाद के रूप में,एक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुतिकरण का नतीजा है कि आज अर्धनग्नता फिल्मी परदों से निकल कर महानगरों से गुजरती हुई शहरों-कस्बों में पांव पसार चुकी है।परिवारों में आपसी सामंजस्य की कमी,विलासिता व उपभोगवादी संस्कृति के प्रति आर्कषण तथा अन्धानुकरण ने युवा वर्ग को गर्त में धकेलने का काम किया है।फिल्म,टेलीविजन,पत्र-पत्रिकायें यहां तक कि विद्यार्थियों की पाठ्य व लेखन पुस्तिका के आवरण पृष्ठ भी अश्लील,अर्धनग्न,कामुक,नायक-नायिकाओं,खिलाडियों,कार्टून चरित्रों से परिपूर्ण हैं।जिनका शिक्षा जगत से,नैतिकता से कोई लेना-देना नही है उनका दर्शन प्रतिक्षण करने को विद्यार्थियों को अनवरत् प्रेरित किया जा रहा है।दरअसल वर्तमान दौर में आधुनिकता व अधिकारों के नाम पर स्वच्छंदता व भौण्डेपन को अपनाया जा रहा है।आज भी भारत की बहुसंख्यक ग्राम्य आधारित जीवन जीने वाली मेहनतकश आम जनता अपने मनोरंजन के लिए तो इन तडक-भडक वाली जीवन शैली युक्त फिल्मों को देखता है परन्तु निजी तौर पर उस शैली को,उस जीवन पद्धति को अपनाने का विचार भी उसके जेहन में नही आता है।भारत में पारिवारिक विखण्डन व नैतिक अवमूल्यन के पश्चात् भी अभी सामाजिक-धार्मिक ताने बाने के कारण,लोक-लाज के कारण छोटे शहरों,कस्बों व ग्रामीण अंचलों में महिलायें कामकाज पर,नौकरी पर निकल तो रही हैं परन्तु महानगरों सी स्वछंदता यहां देखने को नही मिलती है।
कृषि आधारित भारतीय परिवारों का जीवन सरल व सुव्यवस्थित था।इसमें परिवार के सभी सदस्यों के काम बंटे होते थे और हित-अधिकार सुरक्षित।आज के आर्थिक युग में नौकरी कर रहीं महिलायें आर्थिक कमाई तो निश्चित रूप से कर ले रही हैं परन्तु शारीरिक,मानसिक व भावनात्मक रूप से कमजोर होती जा रही हैं।अपनी नौकरी के,व्यवसाय के दायित्वों का निर्वाहन के साथ-साथ पत्नी धर्म का पालन,संतानों की परवरिश,सास-श्वसुर की देखभाल के साथ-साथ मायके में वृद्ध मॉं-बाप के स्वास्थ्य की चिन्ता कामकाजी महिलाओं को हलकान कर देती हैं।आज महिला वर्ग नौकरी पाने पर अत्यधिक प्रसन्नता की अनुभूति करती हैं।दरअसल अब महिला वर्ग का दोहरा शोषण हो रहा है।रिश्तों को,परिवार को सहेजने के साथ-साथ महिला को परिवार के लिए धर्नाजन के लिए श्रम करना क्या महिला सशक्तिकरण है?यह बात उन महिलाओं पर कदापि लागू नही होती है जो परिवार व रिश्तों से ज्यादा अहमियत दूसरी बातों को देती हैं।मेरा यह विचार सिर्फ उन महिलाओं की आंतरिक पीडा पर है जो पारिवारिक सुख व सम्पन्नता को प्राथमिकता पर रखते हुए जीवन जी रही हैं और अपनी कमाई परिवार पर ही खर्च करती हैं।अपने परिवार को अहमियत देते हुये कई बार काम काजी महिला अपनी जमी जमी नौकरी भी त्याग देती है - वह नौकरी जिसके लिए उसने रात दिन एक करके पढाई की होती है ,तमाम जगह प्रयत्नों के बाद मेहनत-मसक्कत करके जो नौकरी हासिल की होती है |भारी तादात में ऐसी भी महिला है जो अपने परिवार की माली हालात को और बेहतर बनाने के लिए ,घर के खर्चे में अपना भी योगदान देने के लिए घर से बाहर या घर में ही रहकर अपनी आय के जरिये बना लेती है |दोहरी जिम्मेदारी के निर्वाहन के बावजूद इन महिलाओ का स्पष्ट मानना है कि स्वावलंबन और आमदनी के जरिये उनके अन्दर आत्म विश्वास जगा है और ये महिला वर्ग का सशक्तिकरण है | अविवाहित युवतियो का घर से दूर नौकरी करने के लिए प्रतिदिन घंटो का सफ़र तयें करना ही कितना थकाऊ व उबाऊ होता है इसका तो भली भांति अहसास पुरुष वर्ग को है ही |लेकिन इस अहसास के होने के बावजूद कितने पुरुष , पुरुष को भी रहने दीजिये घर में ही रहने सिर्फ घरेलु काम करने वाली महिला अपने ही घर की उस काम काजी युवती को नौकरी से घर वापसी को बिना उसके मांगे कितने बार पीने का पानी या चाय-नाश्ता देती है,ये काबिले गौर तथ्य है |अगर देती भी है तो गाहे बगाहे सुना जरुर देती है ,ये परिवारों के अन्दर की बहुत उलझी हुई ,बिगड़ी हुई ,अभी बहुत हद तक ढकी-छिपी तस्वीर है | कामकाजी महिलाओ का जाहे वो नौकरी पेशा हो,स्व रोजगार से जुडी हो,श्रमिक वर्ग से हो या खेती-किसानी से जुडी हो ,निश्चित रूप से एक आतंरिक बैचैनी ,पीड़ा को अंगीकार किये ख़ामोशी से परिवार-समाज के लिए अपने व्यग्तिगत लाभों को कमोबेश दरकिनार करने में तनिक परहेज़ नहीं करती है | घर से दूर रहकर शिक्षा अर्जन हो अथवा उसके पश्चात् घर से दूर नौकरी मिलने पर घर से अलग रहकर नितांत अकेले परवारिक माहौल से दूर नौकरी करने की विवशता जब किसी युवती के सामने आती है तो उसके सामने अपने सुनहरे भविष्य के सपनो को साकार करने के अवसर के साथ ही साथ एकाकी पन का असीम कष्ट भी होता है | किसी भी युवती के जीवन का यह वो निर्णायक काल होता है जिसमे उसको अपने दायित्व निर्वाहन के साथ साथ अपने एकाकी पन को काटने के लिए चन्द साथियो की जरुरत महसूस होती है |शिक्षा अर्जन के समय सहपाठी और नौकरी के समय सहकर्मी ही सभी के लिए सबसे निकट के व्यक्ति होते है | घर से दूर ,पढाई का काम का भरपूर दबाव जिस चरित्र का मित्र इस समय किसी का भी बन गया उसके निजी जीवन में उस तरह के चरित्र से घटित होने वाली अच्छी बुरी घटना घटित होनी स्वाभाविक ही है | किसी भी अकेली रह रही युवती के विषय में अधिकांश पुरुष वर्ग की सोच किसी से छिपी नहीं है ,सोच के पीछे मानसिकता हो या तमाम उदाहरण ,इसमें ना जा कर मेरा सवाल उस युवती के घर के ही पुरुषो से ही करने को कहता है कि क्या वो अपने साथ पढ़ रही या काम कर रही या कही भी अकेली रह रही युवती-महिला के विषय में क्या सोचते है ? और जो भी सोचते है क्या उनके परिवार की महिला के विषय में वही बात लागु नहीं होती है ? और सबसे बड़ी बात परिवार की एक युवती-महिला अगर परिवार की तरक्की में अपना योगदान देती है तो परिवार के लोगो का उसका समुचित ध्यान देना चाहिए लेकिन अभी बहुतायत में परिवार के बारे में सोचने वाली महिला परिवार के ही अन्य लोगो के द्वारा उपेक्षित है जबकि अपना निजी हित सर्वोपरि रखने वाली महिला देखने में तो स्वयं में मस्त व प्रसन्न रहती ही है |
भारतीय सभ्यता और संस्कृति में मातृ शक्ति अर्थात महिला वर्ग का स्थान सदैव सर्वोपरि माना गया है।इस देवभूमि में समस्त आराधना पद्धतियों में नारी शक्ति का पूजन किया जाता है।नारी के बगैर पुरूष के द्वारा की गई ईश आराधना अधूरी ही होती है।सृष्टि के दो अनिवार्य व पूरक अंग के रूप में महिला व पुरूष ही हैं,इस शाश्वत सत्य को कौन नकार सकता है?क्या कोई स्त्री-पुरूष के सहअस्तित्व को नकार सकता है?अधिकारों की बात करें तो भारतीय सभ्यता-संस्कृति व पारिवारिक मूल्य तो परिवार ही नही वरन् समाज के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो नर हो या नारी,बालक हो या वृद्ध सभी के संरक्षण व अधिकारों की बेमिसाल धरोहर है।भारतीय समाज सदैव सहिष्णु व मानवता वादी सोच का रहा है।मुगलों तथा ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति की लडाई में महिला शक्ति किसी भी नजरिए से पुरूषों से पीछे नहीं रही हैं।वास्तविकता तो यह है कि वीर पुरूषों की जननी मातृशक्ति ही वीरोचित कर्म व धर्म की प्रेरक रही हैं।
अतीत की गौरव-शाली,बलिदानी,त्यागमयी गाथायें समेटे भारत-भूमि में आज पारिवारिक मूल्य व आपसी विश्वास दम तोड चुका है।जिस प्रकार दीमक अच्छे भले फलदायक वृक्ष को नष्ट कर देता है उसी प्रकार पूॅजीवादी व भौतिकतावादी विचारधारा भारतीय जीवन पद्धति व सोच को नष्ट करने में प्रति पल जुटा है।जिस प्रकार एक शिक्षित पुरूष स्वयं शिक्षित होता है लेकिन एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित व सांस्कारिक करती है,उसी प्रकार ठीक इसके उलट यह भी है कि एक दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन पुरूष अपने आचरण से स्वयं का अत्यधिक नुकसान करता है,परिवार व समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडता है लेकिन अगर कोई महिला दिग्भ्रमित,भ्रष्ट व चरित्रहीन हो जाये तो वह स्वयं के अहित के साथ-साथ अपने परिवार के साथ ही दूसरे के परिवार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।एक कटु सत्य यह भी है कि एक पथभ्रष्ट पुरूष के परिवार को उस परिवार की महिला तो संभाल सकती है,अपनी संतानों को हर दुःख सहन करके जीविकोपार्जन लायक बना सकती है लेकिन एक पथभ्रष्ट महिला को संभालना किसी के वश में नहीं होता है और उस महिला के परिवार व संतानों को अगर कोई महिला का सहारा व ममत्व न मिले तो उस परिवार के अवनति व अधोपतन को रोकना नामुमकिन है।
पूंजीवाद के प्रभाव में भारत में भी महिलाओं को एक उत्पाद के रूप में,एक उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुतिकरण का नतीजा है कि आज अर्धनग्नता फिल्मी परदों से निकल कर महानगरों से गुजरती हुई शहरों-कस्बों में पांव पसार चुकी है।परिवारों में आपसी सामंजस्य की कमी,विलासिता व उपभोगवादी संस्कृति के प्रति आर्कषण तथा अन्धानुकरण ने युवा वर्ग को गर्त में धकेलने का काम किया है।फिल्म,टेलीविजन,पत्र-पत्रिकायें यहां तक कि विद्यार्थियों की पाठ्य व लेखन पुस्तिका के आवरण पृष्ठ भी अश्लील,अर्धनग्न,कामुक,नायक-नायिकाओं,खिलाडियों,कार्टून चरित्रों से परिपूर्ण हैं।जिनका शिक्षा जगत से,नैतिकता से कोई लेना-देना नही है उनका दर्शन प्रतिक्षण करने को विद्यार्थियों को अनवरत् प्रेरित किया जा रहा है।दरअसल वर्तमान दौर में आधुनिकता व अधिकारों के नाम पर स्वच्छंदता व भौण्डेपन को अपनाया जा रहा है।आज भी भारत की बहुसंख्यक ग्राम्य आधारित जीवन जीने वाली मेहनतकश आम जनता अपने मनोरंजन के लिए तो इन तडक-भडक वाली जीवन शैली युक्त फिल्मों को देखता है परन्तु निजी तौर पर उस शैली को,उस जीवन पद्धति को अपनाने का विचार भी उसके जेहन में नही आता है।भारत में पारिवारिक विखण्डन व नैतिक अवमूल्यन के पश्चात् भी अभी सामाजिक-धार्मिक ताने बाने के कारण,लोक-लाज के कारण छोटे शहरों,कस्बों व ग्रामीण अंचलों में महिलायें कामकाज पर,नौकरी पर निकल तो रही हैं परन्तु महानगरों सी स्वछंदता यहां देखने को नही मिलती है।
कृषि आधारित भारतीय परिवारों का जीवन सरल व सुव्यवस्थित था।इसमें परिवार के सभी सदस्यों के काम बंटे होते थे और हित-अधिकार सुरक्षित।आज के आर्थिक युग में नौकरी कर रहीं महिलायें आर्थिक कमाई तो निश्चित रूप से कर ले रही हैं परन्तु शारीरिक,मानसिक व भावनात्मक रूप से कमजोर होती जा रही हैं।अपनी नौकरी के,व्यवसाय के दायित्वों का निर्वाहन के साथ-साथ पत्नी धर्म का पालन,संतानों की परवरिश,सास-श्वसुर की देखभाल के साथ-साथ मायके में वृद्ध मॉं-बाप के स्वास्थ्य की चिन्ता कामकाजी महिलाओं को हलकान कर देती हैं।आज महिला वर्ग नौकरी पाने पर अत्यधिक प्रसन्नता की अनुभूति करती हैं।दरअसल अब महिला वर्ग का दोहरा शोषण हो रहा है।रिश्तों को,परिवार को सहेजने के साथ-साथ महिला को परिवार के लिए धर्नाजन के लिए श्रम करना क्या महिला सशक्तिकरण है?यह बात उन महिलाओं पर कदापि लागू नही होती है जो परिवार व रिश्तों से ज्यादा अहमियत दूसरी बातों को देती हैं।मेरा यह विचार सिर्फ उन महिलाओं की आंतरिक पीडा पर है जो पारिवारिक सुख व सम्पन्नता को प्राथमिकता पर रखते हुए जीवन जी रही हैं और अपनी कमाई परिवार पर ही खर्च करती हैं।अपने परिवार को अहमियत देते हुये कई बार काम काजी महिला अपनी जमी जमी नौकरी भी त्याग देती है - वह नौकरी जिसके लिए उसने रात दिन एक करके पढाई की होती है ,तमाम जगह प्रयत्नों के बाद मेहनत-मसक्कत करके जो नौकरी हासिल की होती है |भारी तादात में ऐसी भी महिला है जो अपने परिवार की माली हालात को और बेहतर बनाने के लिए ,घर के खर्चे में अपना भी योगदान देने के लिए घर से बाहर या घर में ही रहकर अपनी आय के जरिये बना लेती है |दोहरी जिम्मेदारी के निर्वाहन के बावजूद इन महिलाओ का स्पष्ट मानना है कि स्वावलंबन और आमदनी के जरिये उनके अन्दर आत्म विश्वास जगा है और ये महिला वर्ग का सशक्तिकरण है | अविवाहित युवतियो का घर से दूर नौकरी करने के लिए प्रतिदिन घंटो का सफ़र तयें करना ही कितना थकाऊ व उबाऊ होता है इसका तो भली भांति अहसास पुरुष वर्ग को है ही |लेकिन इस अहसास के होने के बावजूद कितने पुरुष , पुरुष को भी रहने दीजिये घर में ही रहने सिर्फ घरेलु काम करने वाली महिला अपने ही घर की उस काम काजी युवती को नौकरी से घर वापसी को बिना उसके मांगे कितने बार पीने का पानी या चाय-नाश्ता देती है,ये काबिले गौर तथ्य है |अगर देती भी है तो गाहे बगाहे सुना जरुर देती है ,ये परिवारों के अन्दर की बहुत उलझी हुई ,बिगड़ी हुई ,अभी बहुत हद तक ढकी-छिपी तस्वीर है | कामकाजी महिलाओ का जाहे वो नौकरी पेशा हो,स्व रोजगार से जुडी हो,श्रमिक वर्ग से हो या खेती-किसानी से जुडी हो ,निश्चित रूप से एक आतंरिक बैचैनी ,पीड़ा को अंगीकार किये ख़ामोशी से परिवार-समाज के लिए अपने व्यग्तिगत लाभों को कमोबेश दरकिनार करने में तनिक परहेज़ नहीं करती है | घर से दूर रहकर शिक्षा अर्जन हो अथवा उसके पश्चात् घर से दूर नौकरी मिलने पर घर से अलग रहकर नितांत अकेले परवारिक माहौल से दूर नौकरी करने की विवशता जब किसी युवती के सामने आती है तो उसके सामने अपने सुनहरे भविष्य के सपनो को साकार करने के अवसर के साथ ही साथ एकाकी पन का असीम कष्ट भी होता है | किसी भी युवती के जीवन का यह वो निर्णायक काल होता है जिसमे उसको अपने दायित्व निर्वाहन के साथ साथ अपने एकाकी पन को काटने के लिए चन्द साथियो की जरुरत महसूस होती है |शिक्षा अर्जन के समय सहपाठी और नौकरी के समय सहकर्मी ही सभी के लिए सबसे निकट के व्यक्ति होते है | घर से दूर ,पढाई का काम का भरपूर दबाव जिस चरित्र का मित्र इस समय किसी का भी बन गया उसके निजी जीवन में उस तरह के चरित्र से घटित होने वाली अच्छी बुरी घटना घटित होनी स्वाभाविक ही है | किसी भी अकेली रह रही युवती के विषय में अधिकांश पुरुष वर्ग की सोच किसी से छिपी नहीं है ,सोच के पीछे मानसिकता हो या तमाम उदाहरण ,इसमें ना जा कर मेरा सवाल उस युवती के घर के ही पुरुषो से ही करने को कहता है कि क्या वो अपने साथ पढ़ रही या काम कर रही या कही भी अकेली रह रही युवती-महिला के विषय में क्या सोचते है ? और जो भी सोचते है क्या उनके परिवार की महिला के विषय में वही बात लागु नहीं होती है ? और सबसे बड़ी बात परिवार की एक युवती-महिला अगर परिवार की तरक्की में अपना योगदान देती है तो परिवार के लोगो का उसका समुचित ध्यान देना चाहिए लेकिन अभी बहुतायत में परिवार के बारे में सोचने वाली महिला परिवार के ही अन्य लोगो के द्वारा उपेक्षित है जबकि अपना निजी हित सर्वोपरि रखने वाली महिला देखने में तो स्वयं में मस्त व प्रसन्न रहती ही है |
Sunday, March 4, 2012
आज समाजवादी पार्टी कार्यालय लखनऊ
आज समाजवादी पार्टी कार्यालय लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ,शिवपाल सिंह यादव -नेता प्रति पक्ष , प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी,मधुकर द्विवेदी मौजूद रहे | पार्टी कार्यालय में महामंत्री राम आसरे विश्व कर्मा , पूर्व मंत्री शत रूद्र प्रकाश ,दरियाबाद विधायक राजीव कुमार सिंह , राजेश यादव उर्फ़ बबलू , कुलदीप वर्मा . पंकज सिंह आदि नेताओ सहित सैकड़ो कार्यकर्ता मौजूद थे | शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव दोनों लोगो ने पत्रकारों के द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर दिया | बेनी प्रसाद वर्मा - केंद्रीय इस्पात मंत्री के द्वारा कि गयी टिप्पणी के सन्दर्भ में पूछे जाने पर सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कोई टिप्पणी नहीं किया और एक मंझे हुये राजनीतिक होने का परिचय उनके इसी अंदाज़ से मिला |सपा कार्यालय में वरिष्ठ पत्रकार ए पी दीवान जी , दिलीप सिंह जी, प्रमोद श्रीवास्तव से मुलाकात हुई | आज सपा कार्यालय में कलाकार चरित्र व प्रवृति के एक नए नवेले नेता जी के तौर तरीको और भाव भंगिमा देख कर उनके ऊपर गुस्सा आया और साथ ही अफ़सोस भी हुआ कि समाजवादी पार्टी ने कैसे इस गैर राजनीतिक चरित्र के कलाकार को पार्टी में पदाधिकारी बना दिया | अभी से सरकारी कामों को करवाने का वायदा करते और अखिलेश यादव से दोस्ताना सम्बन्ध होने की बात करते मैंने खुद सुना | खैर किसी दिन ये भी खबर बन के सबके सामने आ ही जायेंगे ,हरकते तो ऐसी ही है कि लेन- देन की बात करते कोई भी फिल्मा लेवे | जब मुलायम सिंह यादव सपा कार्यालय से चले गये तब पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी जी से इत्मिनान से वार्ता हुई | राजेंद्र चौधरी जी के मित्र डी वी सिंह ने कल ही मुझसे कहा था कि मेरी बात करवा देना सो उनसे बात करवाई | जब राजेंद्र चौधरी जी के साथ उनके कमरे से निकला तभी बुंदेलखंड की युवा नेत्री कृष्णा यादव ने अपने द्वारा चुनाव में किये गये प्रचार की तमाम खबरे राजेंद्र चौधरी जी को दिखाई , साथ होने के कारण मैंने भी देखी | तत्पश्चात वहा से रवाना होकर इंकलाबी नज़र के ऑफिस में समन्वय संपादक राजेश श्री नेत्र जी से और लोकमत ऑफिस में उप संपादक प्रणय मोहन सिंह जी से मिला | उसके बाद अमीनाबाद में खरीददारी करी और बाराबंकी घर वापस |
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