Sunday, January 29, 2012
३१ जनवरी को देवा शरीफ में होगी अखिलेश यादव की जन सभा -अरविन्द विद्रोही
बाराबंकी विधान सभा से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्म राज यादव उर्फ़ सुरेश यादव ने अब अपनी पूरी ताकत लगा दी है व्यक्तिगत जन संपर्क में | देवा में ३१ जनवरी को आयोजित होने वाली जन सभा को संबोधित करने समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अखिलेश यादव-सांसद के आने की खबर से बाराबंकी विधान सभा में युवा वर्ग में जगा एक नया जोश व उत्साह | बाराबंकी विधान सभा २६८ के प्रत्याशी धर्म राज यादव उर्फ़ सुरेश यादव ग्रामीण अंचलो में घूम घूम कर जनता से कर रहे है अखिलेश यादव की जन सभा में पहुचने की अपील ,कह रहे है कि युवा समाजवादी नेता अखिलेश यादव के विचारो को सुनने के लिए जरुर निकले वक़्त ,विधान सभा चुनाव में मांग रहे है आशीर्वाद रूपी मत व समर्थन | वही दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के नेता धीरज गुलाशिया अपने साथियो सचिन अग्रवाल ,अरशद -सभासद,पाउवा यादव -सभासद ,अफजाल अंसारी आदि के साथ नवाबगंज नगर पालिका ,बडेल ,ओबरी और बंकी में जारी रखे है जन संपर्क अभियान ,बाराबंकी विधान सभा के प्रत्याशी धर्म राज यादव उर्फ़ सुरेश यादव के लिए कर रहे है साइकिल निशान पर बटन दबाने की लोगो से अपील | ३१ को देवा की जन सभा के प्रचार के साथ साथ उम्मीदों की साइकिल को विधान सभा पहुचाने की कर रहे है जुगत |प्रचार के साथ साथ जोड़ तोड़ में भी जुटे सपाई ,भीतर घातियो पर है पैनी नज़र |
बाराबंकी २६८ में चुनावी सरगर्मी चरम पर- जाति बल पर धन बल के हावी होने की सम्भावना ,अनिश्चिंतता बरक़रार
अरविन्द विद्रोही ............ बाराबंकी विधान सभा २६८ में मतदाताओ की ख़ामोशी ने सभी प्रत्याशियो को बेक़रार कर रखा है , जाति को आधार बना कर राजनीति का तकाजा ही है कि अपने अपने जाति को अपने पक्ष में पक्का मान रहे प्रत्याशी आत्म मुग्धता में पड़े हुये है | समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्म राज यादव उर्फ़ सुरेश यादव को अपने स्वजातिए मतदाताओ पर मुलायम सिंह यादव के नाम पर पूरा भरोसा है,मुस्लिम मतों,कुर्मी मतों और अपने पिता स्व रामचंद्र बख्श सिंह के नाम के भरोसे पीस पार्टी के प्रत्याशी अजय वर्मा उर्फ़ बबलू अपनी जीत पक्की मान रहे है|वर्तमान विधायक संग्राम सिंह वर्मा बहुजन समाज पार्टी के हाथी पर सवार होकर अपने व अपने परिजनों के कार्यकाल में कराये गये विकास कार्यो ,बसपा के आधार मतदाताओ और अपने व्यक्तिगत जनाधार के आधार और व्यवहार पर एक बार पुनः विधान सभा में बाराबंकी २६८ का प्रतिनिधितित्व करने को तैयार है |समाजवादी पार्टी के पुराने नेता रहे छोटे लाल यादव इस चुनाव में बेनी प्रसाद वर्मा-केंद्रीय इस्पात मंत्री के साथ उनके दिलाये पंजा निशान के साथ चुनावी समर में अपनी दावेदारी साबित करने में मुस्तैदी से जुटे है | अपने स्वजतिये यादव बिरादरी के मतदाताओ के साथ साथ मुस्लिम और बेनी प्रसाद वर्मा के प्रभाव के बलबूते विधान सभा पहुचने के लिए कांग्रेस प्रत्याशी धुर समाजवादी छोटेलाल यादव समाजवादी पार्टी के तमाम पुराने साथियो से संपर्क बनाये हुये है जो समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी सुरेश यादव के लिए घातक हो सकता है | यादव मतों में विभाजन सपा प्रत्याशी को चुनावी जंग में पीछे धकेल देगा इसमें कोई शक नहीं है यही कारण है कि सपा प्रत्याशी अपनी पूरी ताकत व उर्जा यादव मतदाताओ को अपने पाले में करे रहने में लगा रहे है | इन सभी प्रत्याशी से अलग अंदाज़ में निर्दालिये प्रत्याशी मुकेश सिंह वर्मा अपने किसान यूनियन के साथियो के द्वारा किये गये समाज सेवा के बदले मेवा रूपी मत मांग रहे है |भारतीय जनता पार्टी के युवा प्रत्याशी संतोष सिंह अपने समर्थको के साथ घर घर जन संपर्क को अपना मूल आधार बनाकर विचार धार पर आम जनता से मत मांग रहे है | सौम्य व ईमानदार छवि के संतोष सिंह बाराबंकी २६८ की जाति व धन बल युक्त चुनावी राजनीति के दलदल में भाजपा का कमल खिला पाते है की नहीं यह आने वाला वक़्त ही बताएगा लेकिन प्रत्यशियो के राजनीतिक सामाजिक आकलन में संतोष सिंह बाराबंकी विधान सभा के सभी घोषित प्रत्याशियो से बेहतर ही है यह सभी मानते व जानते है | बाराबंकी की जनता ने अगर जाति और धन बल को तवज्जो नहीं दिया तो बाराबंकी में चुनाव सिर्फ संतोष सिंह और मुकेश सिंह वर्मा के बीच होना निश्चित है ,यही दो प्रत्याशी है जो आम जनता के लिए सदैव कार्यरत रहते है |बाकी प्रत्याशी अपने अपने राजनीतिक दल,अपने जाति बल व धन बल के भरोसे जनता को लुभाने में लगे है ,जनता के लिए संघर्ष का कोई इतिहास इन दोनों के अलावा किसी का नहीं रहा है |
Saturday, January 28, 2012
दरियाबाद विधान सभा में साइकिल की तेज़ रफ़्तार बरक़रार - बेनी की बैचैनी बरक़रार
अरविन्द विद्रोही .................................. जनपद बाराबंकी सर्वाधिक चर्चित विधान सभा दरियाबाद में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी राजीव प्रताप सिंह -विधायक अपने सरल स्वभाव व सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के आशीर्वाद के बल बूते विधान सभा २०१२ के होने वाले आम चुनाव में भी अपने साइकिल की रफ़्तार को दिन प्रति दिन तेज़ करते जा रहे है | दरिया बाद में साइकिल की तेज़ रफ़्तार ने बाराबंकी के विकास पुरुष कहे जाने वाले बेनी प्रसाद वर्मा - केंद्रीय इस्पात मंत्री को गहन परेशानी में डाल दिया है | दरियाबाद से ही बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र राकेश वर्मा -पूर्व कारगर मंत्री उत्तर प्रदेश कांग्रेस के टिकेट पर अपना भाग्य आजमा रहे है | कांग्रेस प्रत्याशी राकेश वर्मा का चुनाव जीतना बेनी प्रसाद वर्मा की कांग्रेस में प्रतिष्ठा बरक़रार रहने के लिए आवश्यक माना जा रहा है | बसपा की हाथी पर विवेकानंद पांडे दुबारा सवार होकर विधान सभा जाने की कोशिश में लगे है वही सुन्दर लाल दीछित- पूर्व विधायक भाजपा की सूखी-बंजर जमीन पे कमल खिलाने में लगे है | दरियाबाद में कांग्रेस प्रत्याशी राकेश वर्मा की जीत सुनिश्चित करने के लिए बेनी प्रसाद वर्मा -केंद्रीय इस्पात मंत्री ने अब शुरु किया ब्राह्मणों को अपने पाले में करने का शतरंजी दांव , फैका है धन और प्रतिष्ठा का सियासी जाल | दरियाबाद के ही एक दमदार विधान सभा प्रत्याशी से ही दिल्ली में करी है बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलाकात ,अपने बेटे राकेश वर्मा को दरियाबाद से जिताने की एवज़ में माँगा प्रत्याशी से ही अंदरूनी सहयोग ,मचा सियासी हडकंप | सपा प्रत्याशी राजीव प्रताप सिंह -विधायक भी मिले मुलायम सिंह यादव से ,करी एकांत में वार्ता |
Thursday, January 26, 2012
बाराबंकी विधान सभा २६८ में मतदाता खामोश ,प्रत्याशी व समर्थक हलकान
बाराबंकी विधान सभा २६८ में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी वर्तमान विधायक संग्राम सिंह वर्मा - राज्य मंत्री उत्तर प्रदेश शासन के पक्ष में बनता माहौल , समाजवादी पार्टी के धर्म राज यादव उर्फ़ सुरेश यादव , कांग्रेस के छोटे लाल यादव , पीस पार्टी के अजय वर्मा , भाजपा के संतोष सिंह,निर्दलिए मुकेश सिंह मुख्य मुकाबले में आने के लिए रात दिन किये है एक | मतदाताओ की ख़ामोशी से प्रत्याशी - समर्थक हलकान , दलित हुये बसपा के पक्ष में मुखरित,किसान संगठन का साथ मिल रहा है मुकेश को , बसपा के अलावा सभी दलों में कई प्रभावी नेता-कार्यकर्ता टिकेट वितरण से असंतुष्ट | समाजवादी पार्टी की उम्मीदों की साइकिल को पंचर करने में जुटे है टिकेट ना मिलने से नाराज़ एक दावेदार , अखिलेश यादव को पहनाते है भारी-भरकम माला व करते है स्वागत लेकिन बाराबंकी के प्रत्याशी सुरेश यादव का नहीं दे रहे साथ और ना ही मांग रहे है बाराबंकी २६८ में साइकिल के लिए वोट ,दे रहे है बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी संग्राम सिंह वर्मा का साथ- कर रहे समाजवादी पार्टी से भीतर घात ,पिछले विधान सभा चुनाव में भी ये नहीं थे सपा के साथ -चले गये थे बेनी प्रसाद वर्मा के साथ,लड़े थे विधान सभा का चुनाव ,हुई थी जमानत जब्त |
Monday, January 23, 2012
चुनाव आयोग अपने निर्णय की समीक्षा करे , सूंड उठाये हाथी को ढकना गैर जरुरी कृत्य
अरविन्द विद्रोही ......... सूंड उठाये हाथी को परदे के पीछे ढकने का चुनाव आयोग का फैसला पक्षपात पूर्ण ही है |बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान तो सूंड नीचे किये हुये हाथी है |सरकारी धन से बने और खरीद कर वितरित किये गये सभी चुनाव चिन्हों पर एक साथ एक तरह का निर्णय होना चाहिए था ,मसलन साइकिल को भी सरकारी धन से खरीद कर पुरे प्रदेश में वितरित किया गया ,सभी सरकारी भवनों में पंखा लगा है ,बाल्टी खरीदी गयी है ,हैण्ड पम्प लगा है जिसको आम जनता उपयोग भी कर रही है और देख भी रही है |सिर्फ और सिर्फ सनातन धर्म में समृधि के सूचक सूंड उठाये हुये हाथी जो कि बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान भी नहीं है को परदे में ढकने का आदेश देना चुनाव आयोग के एकतरफा -मनमाने और गैर व्यावहारिक फैसले की बानगी मात्र है | उत्तर प्रदेश में चुनावी जंग में बहुजन समाज पार्टी जब नेपथ्य में जाने लगी थी तभी चुनाव आयोग ने एकदम से अपना यह फैसला दे दिया और चारो तरफ चुनाव आयोग के इसी निर्णय के कारण बसपा सरकार की सभी की गयी गलतियो की चर्चा होनी बंद हो गयी तथा सिर्फ हाथी और उस पर पर्दा यह चर्चा आम हो गयी | हाथी को चुनाव आयोग ने स्वतः संज्ञान में लिया और उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति को अपने एक ही फैसले से बदल दिया |बहुजन समाज पार्टी का अपना काडर वोट ,कट्टर समर्थक तक मायूस था ,चुनाव आयोग के इस निर्णय ने उनको एकदम से संजीविनी दे दी है |दलित बस्तिओ में एक जगह चुप-चाप एक साथ बैठ कर प्रति दिन हाथी पे पर्दा डाल कर क्यूँ ढका गया इस पर मंथन किया जाना जारी है |सूंड उठाये हाथी को बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान बता कर उस पर पर्दा डालने को अपने स्वाभिमान से सीधा जोड़ रहा है दलित समाज |बसपा के वे लोग भी जो किसी कारण वश स्थानीय बसपा विधायक से नाराज़ थे, इस प्रकरण के बाद जी जान से पार्टी के प्रचार में जुट गये है |चुनावी राजनीति में समाजवादी पार्टी से पिछड़ रही बहुजन समाज पार्टी को चुनाव आयोग ने जाने -अनजाने पुनः मजबूती देने का अद्भुत काम किया है |भारत-भूमि के सनातन समाज के दलित वर्ग को चुनाव आयोग का यह निर्णय अपनी भावनाओ पे कुठाराघात सरीखा प्रतीत हो रहा है ,बाकी दलों के चुनाव चिन्हों की तरफ चुनाव आयोग की ख़ामोशी उनके घावो को बरक़रार रखे है | चुनाव आयोग का यह फैसला गलत है , जिस हाथी को ढका गया वो बसपा का चुनाव चिन्ह नहीं है ,और सूंड उठाये हुये हाथी सनातन धर्म में समृधि का सूचक है उसको ढकना भावनाओ पे कुठाराघात है ,यह बात तेजी से आम जन मानस में घर करती जा रही है |मतदान की तारीख तक अगर हाथी पर पर्दा प्रकरण इसी प्रकार हावी रहा तो इसमें कोई संदेह नहीं कि बहुजन समाज पार्टी को विधान सभा २०१२ के आम चुनावो में बढ़त मिल जाये और वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे | उत्तर प्रदेश जी राजधानी में जब बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ था और मायावती ने प्राथमिकता के आधार पर राजधानी लखनऊ में विभिन्न पार्को व पार्को में जगह जगह हाथी की प्रतिमा की स्थापना का काम शुरु करवाया तब भी बहुत कोहराम मचा था | राजनीतिक बयानबाजी और आरोप प्रत्यारोप के साथ साथ माननीये न्यायलय में भी मायावती सरकार द्वारा करवाए जा रहे पार्को के निर्माण कार्य व हाथी की प्रतिमा की स्थापना पर रोक की याचिका दायर हुई | माननीये न्यायलय के ही फैसले के बाद ही पार्क का निर्माण कार्य - सौंदर्यी करण हुआ और हाथी की प्रतिमा भी लगी रही | माननीये न्यायलय ने इस बात को माना कि पार्को में लगाया जा रहा सूंड उठाये हाथी की ये प्रतिमाएं बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान नहीं है ,और सूंड उठाये हुये हाथी की प्रतिमा को लगाने में कोई दिक्कत नहीं है | और अब चुनावी बेला में अचानक चुनाव आयोग ने लखनऊ में लगी इन्ही सूंड उठाये हाथी की प्रतिमाओ को परदे में ढ़कने का निर्णय दे दिया कि इससे बहुजन समाज पार्टी के चुनाव निशान हाथी का प्रचार -प्रसार हो रहा है |इन हाथियो को बनाने और लगाने से लेकर ढकने तक में आम जनता का ही धन लगा है |आम जनता के धन से बनी चीजो को देखने से ,उपयोग करने से रोकना किस लिहाज़ से उचित है ? क्या माननीये न्यायलय का पार्को में सूंड उठाये हाथी की प्रतिमा लगने देने का निर्णय गलत था ? समाजवादी विचारक -नेता डॉ राम मनोहर लोहिया तात्कालिक अन्याय का विरोध करने में यकीन रखते थे और समाजवादियो से ,अपने अनुयायिओ से तात्कालिक अन्याय का विरोध करने को कहते थे | शरद यादव -अध्यक्ष जनता दल यू ने इस मामले में चुनाव आयोग के निर्णय को गलत करार देकर सही ही किया और एक सच्चे समाजवादी नेता के चरित्र को निभाया | भारत की सभी संवैधानिक संस्थानों को निष्पक्ष भाव से काम करना चाहिए लेकिन चुनाव आयोग के इस निर्णय पर सवालिया निशान लगने और बसपा सुप्रीमो व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश द्वारा चुनाव आयोग को दलित विरोधी करार देने से चुनाव आयोग के जिम्मेदारो को मंथन करके अपने निर्णय पर गंभीरता पूर्वक पुनर्विचार करना चाहिए | स्वागत के लिए लगाए जाने वाले समृद्धि सूचक सूंड उठाये हाथी को परदे से ढकना न्याय संगत नहीं है यह बात दलित समाज ही नहीं सभी निष्पक्ष जनों को समझ में आ चुकी है |
उत्तर प्रदेश में चुनावी दंगल ,राहुल -अखिलेश का युवा नेतृत्व ,चुनौतियाँ और संभावनाएं
अरविन्द विद्रोही ................. उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति का पारा दिन प्रति दिन तेज़ी से बढ़ता ही जा रहा है | विधान सभा के आम चुनावो में हर हाल में चुनाव जीतने की ललक में राजनीतिक दलों ने तमाम स्वार्थी ,दल बदलुओं ,सिधान्त हीन व आपराधिक प्रवृति के लोगो को बगलगीर करने में ,गले लगाने में तनिक भी परहेज़ नहीं किया है | निश्चित रूप से प्रत्येक चुनाव प्रत्याशी व राजनीतिक दलों के लिए जीत हासिल करने के दृष्टिकोण से महत्व पूर्ण होता है | उत्तर प्रदेश का यह विधान सभा २०१२ का आम चुनाव तो राजनीतिक दलों के नेतृत्व की छमता के आकलन व युवा नेतृत्व की स्वीकारिता ,आम जन मानस में उनकी छवि के आकलन व असर के मद्देनज़र भी राजनीतिक विचारको-समीक्षकों के लिए रुचिकर व महत्व-पूर्ण हो गया है | उत्तर प्रदेश ही नहीं वरन भारत - भूमि की स्याह -संकीर्ण हो चुकी राजनीति में आम जनमानस भी तमाम मोह्पाशों में जकड़ा किंकर्तव्य विमूढ़ अवस्था में पहुँच चुका है | सामाजिक-राजनीतिक-विकास परक स्थानीय मुद्दों पर राजनीतिक दलों के उदासीन व मनमाने रवैये के कारण ही जाति-धर्म आधारित राजनीति ने अपनी हनक जनता के बीच जन प्रतिनिधि निर्वाचन में इस बार भी बदस्तूर जारी रखी है | भ्रष्ट व स्याह हो चुकी अवसरवादी-सिद्धांत हीन राजनीति के गलियारे में एक उम्मीद की करण राजनतिक दलों में युवा नेतृत्व ने जगा रखी है | लेकिन कश्मीर से कन्या-कुमारी तक राजनितिक दलों के आकाओं के पुत्र-पुत्री के युवा नेतृत्व के रूप में उभार को क्या सही मायनो में लोकतंत्र में युवा नेतृत्व माना जाना चाहिए ,यह एक यक्ष प्रश्न है | इस प्रश्न का जवाब इन्ही युवा नेताओ को अपने कर्मो व कार्य छमता से स्वयं को साबित करने के लिए स्वयं ही देना होगा | उत्तर प्रदेश की विधान सभा २०१२ की चुनावी रणभूमि में समूचे उत्तर प्रदेश में दो युवा चेहरे क्रमशः अखिलेश यादव -प्रदेश अध्यक्ष ,समाजवादी पार्टी और राहुल गाँधी - राष्ट्रीय महासचिव ,कांग्रेस अपने अपने राजनीतिक दलों की चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाये हुये है | दोनों युवा नेताओ की सभाओ में जनता जम कर जमा हो रही है | अपने तेवरों व बयानों के कारण दोनों लगातार चर्चा में बने रहते है | जनता की भीड़ चर्चित चेहरों को देखने - सुनने में बहुत दिलचस्पी रखती है फिर चुनावो के समय प्रत्याशी जनता को आने जाने का सुविधा साधन भी उपलब्ध करते ही है ,सो जनता खूब जुटती है | जन सभाओ में जुटाए जाने वाले मजमे से मतदाताओ का रुझान व राजनीतिक लोकप्रियता का आकलन अक्सर गलत ही साबित होता है | कांग्रेस के महासचिव राहुल गाँधी के द्वारा बिहार प्रदेश के संपन्न हुये विधान सभा में की गयी मेहनत व उनकी जन सभाओ में उमड़ती भीड़ के बाद आये चुनाव नतीजो तथा सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव की लोकसभा चुनाव में शिकस्त को कौन भुला सकता है ? राजनीति के व्यवसायी-करण की ही देन है कि आज राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के व्यक्तित्व को विभिन्न प्रचार माध्यम से निखारने , तराशने व उभरने का काम एक सुनियोजित -चरण बद्ध योजना के तहत कांग्रेस-समाजवादी पार्टी कर रही है | अब इसे चाहे कोई सत्ता की वंशानुगत राजनीति कहे या संघर्ष की वंशानुगत राजनीति ,है तो ये वंशानुगत राजनीति ही ,इसे कोई नहीं नकार सकता है | राजनीतिक दलों के आकाओं ने अपने पुत्र,पुत्रिओं ,परिजनों को कमान सौंप कर अपने संगठन में मुख्य केंद्रीय निर्णायक भूमिका देकर संगठन में उनके दबदबे व महत्व को स्थापित करने का काम किया है | कांग्रेस व सपा दोनों के नेता ,चाहे वो वरिष्ठ नेता ही या युवा ,सभी अपने अपने दल के राजनीतिक आका के पुत्र-परिजन का यश -गुणगान करते ही है | कांग्रेस की पूरी मशीनिरी व प्रत्याशी राहुल गाँधी के कार्यक्रमों - दौरों को सफल बनाने में जुटी हुई है और समाजवादी पार्टी के सभी प्रत्याशी-नेतागण अखिलेश यादव को ,अखिलेश यादन के क्रांति रथ को अपने विधान सभा में पा कर स्वागत कर के अपने को धन्य मानते है | राहुल गाँधी और अखिलेश यादव दोनों के ही इर्द गिर्द राजनीति का ताना-बना बुनने की कोशिश कांग्रेस-सपा का शीर्ष नेतृत्व चाह रहा है | राहुल गाँधी के सम्मुख कांग्रेस के भीतर कोई भी चुनौती नहीं है ,बहन प्रियंका भी साथ देने वक़्त आने पर मुस्तैदी से आ ही जाती है वही दूसरी तरफ सपा के अन्दर समाजवादियो के आशाओं के केंद्र बिंदु बनकर उभरे अखिलेश यादव के सम्मुख पारिवारिक चुनौती भी मौजूद है | चाचा शिवपाल यादव -नेता प्रतिपक्ष के अलावा अब प्रतीक यादव की राजनीतिक हसरते हिलोरे मारती दिख रही है | राहुल गाँधी को जहा सिर्फ दुसरे दलों पर प्रहार करके कांग्रेस की रहे बनाते हुये अपनी उपयोगिता साबित करनी है वही अखिलेश यादव सपा के भीतर भी वर्चस्व की लडाई लड़ने को विवश है | स्वयं निर्भीक निर्णय लेने की छमता में अखिलेश यादव ने राहुल गाँधी को शिकस्त देकर अपनी वैचारिक दृठता व संगठन पर पकड़ मजबूत होने का आभास करा दिया है | अंत में सत्य यह है आम जनता दोनों को सिर्फ देखने सुनने के लिए ही जुट रही है | इनके विचारो-बयानों का भरपूर रसास्वादन व समीक्षा आम जनता कर रही है | प्रत्याशी व स्थानीय -जातीय आधार को प्रमुखता से ध्यान में रखकर इस बार मतदाता मतदान करेगा ,यह आसार साफ़ तौर पर प्रतीत हो रहा है | परंपरागत मतदाताओ को अपने पक्ष में करने में अखिलेश यादव कामयाब दिख रहे है वही राहुल गाँधी को कई जगह विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है | उत्तर प्रदेश के विधान सभा के २०१२ के आम चुनाव इन दोनों युवा नेताओ के व्यक्तिगत राजनीतिक आभा-मण्डल को प्रभावित करेंगे | उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के सम्मुख जहाँ चुनौती अधिक है वही उनसे उम्मीद भी बहुत है
| अपनी युवा बिग्रेड के सहारे अखिलेश यादव पार्टी के अन्दर बाहर की हर जंग लड़ने व जीतने के लिए कमर कसे दीखते हैं , वही राहुल गाँधी को सिर्फ पार्टी के लिए ,प्रत्याशियो के लिए सिर्फ प्रचार करना और भाषण करना है |
| अपनी युवा बिग्रेड के सहारे अखिलेश यादव पार्टी के अन्दर बाहर की हर जंग लड़ने व जीतने के लिए कमर कसे दीखते हैं , वही राहुल गाँधी को सिर्फ पार्टी के लिए ,प्रत्याशियो के लिए सिर्फ प्रचार करना और भाषण करना है |
Sunday, January 22, 2012
सत्ता के लिए समाजवादी सिद्धांतो का त्याग सर्वथा अनुचित है --- अरविन्द विद्रोही
दुर्भाग्य ही है कि आज कांग्रेस सरकार की मदद अपने को डॉ लोहिया के लोग मानने वाले समाजवादी लोग ही कर रहे है डॉ लोहिया की गैरकांग्रेस वाद की अवधारणा को दरकिनार कर कांग्रेस की सरकार को समर्थन जारी है | राहुल गाँधी को काले झंडे दिखाने वाले युवा को समाजवादी पार्टी से निकालना क्या साबित करता है? कांग्रेस के साथ रिश्ते ख़त्म होने चाहिए चाहे सरकार बने या ना बने |सत्ता के लिए सिद्धांतो का त्याग सर्वथा अनुचित है ,अनुचित कार्यो का साथ हम समाजवादी नहीं दे सकते है |उत्तर प्रदेश में चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की मिली जुली सरकार की संभावनाओ से ही समाजवादी पार्टी को बसपा -कांग्रेस की सरकारों से नाराज़ मतदाताओ का उपहार स्वरुप मिलने वाला मत अब नहीं मिलता दिख रहा है |चुनाव में मतदान की तारीख निकट आते आते ये समाजवादी पार्टी के नेता गण जाने क्यूँ आम जनता की बात त्याग कर मुस्लिम और बाबरी मस्जिद की चर्चा करने लगे है |उत्तर प्रदेश में आम जनमानस में समाजवादी पार्टी बिना किसी बाबरी मस्जिद के सवाल को उठाये अपने कार्यकर्ताओ के संघर्ष की बदौलत बसपा के मुकाबिल अपना स्थान बना चुकी थी लेकिन जब से बाबरी मस्जिद की चर्चा सपा नेतृत्व ने शुरु की है परिस्थिति बदल गयी है | अगर हिन्दू और मुस्लिम की बात होगी ,अगर बाबरी मस्जिद की चर्चा होगी तो अपने आप हिन्दू एक साथ उस जगह जायेगा जहा हिंदुत्व की ही बात होगी ,हिन्दू को भी अपने प्रभु श्री राम के जन्मभूमि पर जबरन काबिज़ होकर बनाये गये ढांचे और मुग़ल आक्रंताओ के द्वारा ढहाए गये जुल्म की याद दिलाने वाले नेताओ की बात समझ में आने लगेगी | राजनीति में प्रत्येक समुदाय की भावना का सम्मान समान रूप से करने की सोच होनी चाहिए ,समाजवादियो को धार्मिक राजनीति में ना पड़कर समाज के सभी लोगो के लिए एक समान भाव रखना चाहिए |सिर्फ मुस्लिम मतों को अपने पाले में करने के फेर में भारी संख्या में हिन्दू मतदाता समाजवादी पार्टी से दूर जा सकता है इसका अंदाज़ा शायद समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को नहीं है | अगर बात मुस्लिम मतदाताओ की ही की जाये तो इस बार के उत्तर प्रदेश के आम चुनावो में मुस्लिम मतदाता डॉ अय्यूब के नेतृत्व में पीस पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है और वहा पे कोई भी अलगाव की बात ना होकर एकता और देश की तरक्की में हिन्दू-मुस्लिम साथ चलने की बात हो रही है ,जिसको हिन्दू मतदाता भी पसंद कर रहा है |समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को अभी भी यह समझ लेना चाहिए कि बसपा के खिलाफ जो संघर्ष बोते वर्षो में उसके समर्पित कार्यकर्ताओ ने किया है उसकी ही बदौलत उसका जनाधार बढ़ा है और जनता ने उसको पसंद करना ,उसके नेताओ के भाषण को सुनने आना शुरु किया था ,अनर्गल बयानबाज़ी और सिर्फ एक समुदाय के प्रति अतिरेक लगाव से दुसरे समुदाय के लोग भी नाराज़ हो कर अपना फैसला बदल सकते है | जाती-धर्म आधारित राजनीति को त्याग कर समाज-जमात की राजनीति की समाजवादी सोच को आगे बढ़ाना ज्यादा बेहतर है |
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