Tuesday, April 3, 2012

भ्रस्टाचार

मजदूर तो हर जगह का मजबूर है ही , किसान भी बेजार है | युवाओ को राहत और बख्शीश की दरकार है , महिलाओ का कौन पुरसाहाल है ? तंत्र है भ्रष्ट लेकिन जन के मन में लगा है जंग | शिराओ में भ्रस्टाचार रक्त बनके हो रहा प्रवाहित लेकिन दुसरो पे ऊँगली उठाने में हम है माहिर | खुद में सुधार की बात को मानते है बेमानी दुसरो पे लगाम लगाने की इक्छा भारी | बलिदानी पैदा हो पड़ोस में और मेरे घर अनिल अम्बानी येही सोच बन चुकी है| बुरा ना मानो तो होगी मेहरबानी | --- अरविन्द विद्रोही

1 comment:

  1. सराहनीय पोस्ट, आभार.

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